बिहार सरकार लंबे समय से दावा करती रही है कि राज्य के हर प्रखंड तक उच्च शिक्षा पहुंचाई जाएगी। इसी लक्ष्य के तहत कॉलेज-विहीन प्रखंडों में नए सरकारी डिग्री कॉलेज खोले गए। कई जगह नए भवन तैयार हुए, नामांकन प्रक्रिया शुरू हुई और छात्रों ने उत्साह के साथ दाखिला भी ले लिया। लेकिन जमीनी तस्वीर सरकारी दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है।
हकीकत यह है कि जिन कॉलेजों में पढ़ाई शुरू होनी थी, वहां पढ़ाने वाले शिक्षक ही नहीं हैं। कहीं सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे पूरा कॉलेज चल रहा है, तो कहीं चतुर्थवर्गीय कर्मचारी या सीमित स्टाफ के सहारे प्रशासनिक कामकाज किया जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शिक्षक ही नहीं होंगे, तो पढ़ाई कैसे होगी और छात्रों का भविष्य किसके भरोसे रहेगा?
नामांकन पूरा, लेकिन पढ़ाने वाला कोई नहीं
राज्य के कई नए डिग्री कॉलेजों में छात्रों का नामांकन पूरा हो चुका है। फीस जमा हो चुकी है और सत्र भी शुरू हो चुका है। लेकिन अधिकांश कॉलेजों में विषयवार शिक्षकों की नियुक्ति अब तक नहीं हो सकी है।
छात्र कॉलेज तो पहुंच रहे हैं, लेकिन कक्षाओं में उन्हें पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक मौजूद नहीं हैं। कहीं एक शिक्षक सभी विषयों की जिम्मेदारी संभाल रहा है, तो कहीं संबद्ध कॉलेजों के शिक्षकों के भरोसे व्यवस्था चलाने की कोशिश की जा रही है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ भवन बनाकर और दाखिला लेकर शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। उच्च शिक्षा की असली पहचान योग्य शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला और नियमित शैक्षणिक माहौल से होती है।
उच्च शिक्षा में पहले से है शिक्षकों का भारी संकट
यह समस्या सिर्फ नए कॉलेजों तक सीमित नहीं है। बिहार के 13 विश्वविद्यालयों के अंतर्गत आने वाले कॉलेजों में पहले से ही शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों के लगभग 26 हजार पद खाली पड़े हैं।
ऐसे में नए कॉलेज खोल दिए गए, लेकिन उनके लिए अलग से शिक्षकों की व्यवस्था नहीं की गई। कई जिलों में प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन सत्र शुरू होने से ठीक पहले आदेश वापस लेने जैसी घटनाएं भी सामने आईं।
जिला-दर-जिला क्या है स्थिति?
गोपालगंज
बैकुंठपुर, बरौली, मांझा, सिधवलिया, कटैया, पंचदेवरी, फुलवरिया, उचकागांव और विजयीपुर में खुले 9 नए कॉलेजों में लगभग हर जगह सिर्फ एक-एक शिक्षक के भरोसे पढ़ाई चल रही है। प्रभारी प्राचार्य तो नियुक्त किए गए, लेकिन सभी ने अब तक योगदान भी नहीं दिया है।
सीवान
जिले में 10 नए कॉलेज शुरू हुए हैं। दारौंदा राजकीय डिग्री कॉलेज में 134 छात्रों का नामांकन हो चुका है, जबकि नौतन कॉलेज में 28 छात्रों ने प्रवेश लिया है। अधिकांश कॉलेजों में केवल प्राचार्य और बर्सर की नियुक्ति हुई है। शिक्षकों की कमी बनी हुई है।
नालंदा
रहुई, नूरसराय, नगरनौसा, बिंद, करतारीगंज, थरथरी, करायपरसुराय और सरमेरा के कॉलेजों में सिर्फ एक प्राचार्य, एक शिक्षक और एक क्लर्क के भरोसे पूरा संस्थान चल रहा है।
शेखपुरा
चेवाड़ा, घाटकुसुम्भा, अरियरी और शेखोपुरसराय के नए कॉलेजों में छात्रों का नामांकन तो हो गया है, लेकिन विषयवार शिक्षकों की नियुक्ति अब तक नहीं हुई। प्रशासनिक स्टाफ सीमित है और नियमित कक्षाएं शुरू नहीं हो पा रही हैं।
लखीसराय
चार नए कॉलेज शुरू किए गए हैं। प्राचार्य, बर्सर और लिपिक की व्यवस्था तो की गई है, लेकिन विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की नियुक्ति अब भी लंबित है।
सासाराम
अन्य जिलों की तुलना में स्थिति थोड़ी बेहतर दिखाई देती है। कुछ कॉलेजों में तीन से छह तक शिक्षक उपलब्ध हैं, लेकिन यहां भी सभी विषयों के लिए पर्याप्त शिक्षकों की कमी बनी हुई है।
पूर्णिया
अमौर, केनगर, बैसा, जलालगढ़, रूपौली और श्रीनगर के कॉलेजों में फर्नीचर, कंप्यूटर और अन्य कुछ सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन पुस्तकालय, प्रयोगशाला, स्मार्ट क्लास, इंटरनेट और नियमित शिक्षकों का अभाव है।
सहरसा
छह नए कॉलेज शुरू हुए हैं। अधिकांश जगह केवल प्राचार्य की नियुक्ति हुई है। परतघट कॉलेज अकेला ऐसा संस्थान है, जहां पांच शिक्षकों की भी तैनाती की गई है।
जमुई
अलीगंज, लक्ष्मीपुर, खैरा और सोनो के कॉलेजों में सीमित स्टाफ के सहारे व्यवस्था चल रही है।
किशनगंज
दिघलबैंक और टेढ़ागाछ सहित नए कॉलेजों में अधिकांश जगह या तो केवल प्राचार्य हैं या केवल एक शिक्षक।
कटिहार
सात नए कॉलेजों में 772 विद्यार्थियों ने नामांकन कराया है। लेकिन लगभग हर कॉलेज में सिर्फ एक प्रभारी प्राचार्य, एक शिक्षक और एक कर्मचारी ही मौजूद हैं।
भागलपुर और बांका
भागलपुर में छह और बांका में चार कॉलेज शुरू हुए हैं। करीब 45 शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति की गई है, लेकिन अधिकांश संस्थानों में अभी भी संसाधन विकसित किए जा रहे हैं।
खगड़िया
मानसी, चौथम और बेलदौर के कॉलेजों में छात्रों का नामांकन तो हो गया है, लेकिन विषयवार शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला और अन्य मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है।
हर जिले की कहानी लगभग एक जैसी
पूरे बिहार की तस्वीर देखें तो लगभग हर जिले में समस्या एक जैसी दिखाई देती है।
- कहीं भवन तैयार है, लेकिन शिक्षक नहीं।
- कहीं शिक्षक हैं, लेकिन विषयवार व्यवस्था नहीं।
- कहीं छात्रों का नामांकन हो चुका है, लेकिन नियमित कक्षाएं शुरू नहीं हो सकी हैं।
- कहीं कंप्यूटर और फर्नीचर हैं, लेकिन पुस्तकालय और प्रयोगशाला नहीं।
- कहीं पूरा कॉलेज मुट्ठीभर कर्मचारियों के सहारे चल रहा है।
सबसे बड़ा सवाल – डिग्री की गुणवत्ता कौन सुनिश्चित करेगा?
सरकार का उद्देश्य उच्च शिक्षा को गांव और प्रखंड स्तर तक पहुंचाना है, जो निश्चित रूप से सराहनीय पहल है। लेकिन केवल भवन बनाकर कॉलेज खोल देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
यदि कॉलेजों में योग्य शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, इंटरनेट, प्रशासनिक स्टाफ और नियमित शैक्षणिक वातावरण नहीं होगा, तो छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिलेगी?
आज हजारों छात्र इन कॉलेजों में पढ़ने के लिए दाखिला ले चुके हैं। लेकिन यदि तीन या चार वर्ष तक यही स्थिति बनी रही, तो उनकी डिग्री की गुणवत्ता और रोजगार क्षमता दोनों पर सवाल उठ सकते हैं।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
बिहार सरकार नए कॉलेज खोलने की उपलब्धि जरूर गिना सकती है, लेकिन अब असली परीक्षा इन संस्थानों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केंद्र बनाने की है।
जब तक शिक्षकों के खाली पद नहीं भरे जाएंगे, विषयवार नियुक्तियां नहीं होंगी और बुनियादी शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाएंगे, तब तक ये कॉलेज केवल इमारत बनकर रह जाएंगे।
उच्च शिक्षा का विस्तार केवल नए भवन बनाने से नहीं, बल्कि योग्य शिक्षकों, बेहतर संसाधनों और मजबूत शैक्षणिक व्यवस्था से होता है। यही वह चुनौती है, जिसका समाधान बिहार की नई शिक्षा नीति और सरकार को जल्द करना होगा।