इंसानों की बोली: बिहार में मानव तस्करी का काला सच

BiharNewsAuthor
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एक मां, उसकी दो मासूम बेटियां — 4 साल और 3 साल की — और कीमत सिर्फ इतनी कि एक अनजान शख्स ने उन्हें राजस्थान के कोटा में खरीद लिया। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि पटना के धनरूआ थाना क्षेत्र से 9 जुलाई 2026 को सामने आया सच है। और यह अकेला मामला नहीं है — कुछ ही हफ्ते पहले नालंदा में एक गिरोह पकड़ा गया था, जो नाबालिग लड़कियों को 1 से 3 लाख रुपए में बेच रहा था। मोतिहारी में चार नाबालिग लड़कियों को नेपाल में 5 लाख रुपए में बेचने की तैयारी थी।

यह आंकड़े बताते हैं कि बिहार में इंसानों की, खासकर महिलाओं और बच्चों की, सचमुच बोली लग रही है। हालांकि यह साफ कर देना जरूरी है — NCRB की ताज़ा क्राइम इन इंडिया 2024 रिपोर्ट के मुताबिक दर्ज मामलों की संख्या में तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्य बिहार से आगे हैं। लेकिन जब बात इस बात की हो कि तस्करी के शिकार लोग आते कहां से हैं, तो बिहार देश के सबसे बड़े “सोर्स स्टेट” यानी स्रोत राज्यों में गिना जाता है — जहां से गरीबी, पारिवारिक कलह और बेरोजगारी का फायदा उठाकर औरतों और बच्चों को दूसरे राज्यों में बेचा जाता है। आज हम इसी सच को करीब से समझेंगे।

कोटा वाला मामला  पूरी कहानी

धनरूआ की रहने वाली 21 साल की एक महिला का पति महाराष्ट्र में एक निजी कंपनी में काम करता है। शराब की लत की वजह से पति-पत्नी के रिश्ते ठीक नहीं थे, और घर की आर्थिक हालत कमजोर थी। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर पड़ोस की एक महिला ने 23 जून को उसे काम दिलाने के बहाने कोटा ले जाने के लिए बहला-फुसला लिया। साथ में उसकी तीनों बेटियां भी थीं — 4 साल, 3 साल और 2 साल की।

कोटा पहुंचने पर गिरोह ने मां और उसकी दो बड़ी बेटियों को एक अनजान शख्स को बेच दिया। सबसे मासूम बात यह रही कि सबसे छोटी, महज 2 साल की बेटी को यह कहकर पटना में ही एक अन्य महिला के पास छोड़ दिया गया कि “तीन बच्चियों के साथ काम करने में परेशानी होगी।” खरीदार ने पीड़िता का मोबाइल फोन तक छीन लिया था, लेकिन किसी तरह उसने एक स्थानीय व्यक्ति की मदद से अपनी सास को फोन कर पूरी आपबीती बताई। सास ने फौरन धनरूआ पुलिस को सूचना दी।

पुलिस ने आरोपी पड़ोसी महिला को हिरासत में लिया, जिसकी निशानदेही पर गया, भोजपुर और शिमली से कुल पांच आरोपी पकड़े गए — सुशीला देवी, सुषमा कुमारी, सुनीता देवी, उसका पति अनिल राम, और नीलू देवी। दिलचस्प और चिंताजनक बात यह रही कि ये सभी आरोपी पटना के राजाबाजार इलाके में रहकर किसी अस्पताल में काम करते थे — यानी दिन में अस्पताल कर्मी, और पर्दे के पीछे इंसानों के सौदागर। पुलिस ने इनसे 1.40 लाख रुपए भी बरामद किए। दबाव में आरोपियों ने मां और दो बेटियों को वापस पटना बुला लिया, जहां पुलिस ने उन्हें सुरक्षित बरामद कर लिया। हालांकि सबसे छोटी 2 साल की बच्ची अब भी लापता है, और पुलिस उसकी तलाश में जुटी है।

अकेला मामला नहीं पूरे राज्य का पैटर्न

यह घटना अकेली नहीं है। मई 2026 में नालंदा में एक अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ हुआ, जहां आरोपियों ने खुद कबूला कि वे एक नाबालिग लड़की को डेढ़ लाख रुपए तक में बेचते थे — तीन लड़कियों को राजस्थान के बीकानेर से बरामद किया गया, जिनमें से दो को तीन लाख रुपए में खरीदा गया था। मोतिहारी से भी हाल में एक मामला सामने आया जहां चार नाबालिग लड़कियों को नेपाल में पांच लाख रुपए में बेचने की तैयारी चल रही थी। इसी मोतिहारी में NIA ने एक ऐसे नेटवर्क पर छापा मारा, जो नौकरी का झांसा देकर लोगों को कंबोडिया तक भेज देता था। मुजफ्फरपुर से खबर आई कि तस्कर अब ट्रेनों के जनरल डिब्बे में बच्चों को बिठाकर, खुद AC कोच में सफर करते हुए तस्करी को अंजाम दे रहे हैं।

प्रभात खबर की एक पड़ताल के मुताबिक बिहार में हर साल औसतन 12 से 14 हजार बच्चे लापता होते हैं। NCRB के आंकड़े यह भी बताते हैं कि 2018 से 2022 के बीच बाल तस्करी के मामलों में चार्जशीट दाखिल करने के मामले में राजस्थान के बाद बिहार देश में दूसरे नंबर पर रहा — कुल 1,848 चार्जशीट। यही वजह है कि बिहार को अक्सर तस्करी का “सोर्स स्टेट” कहा जाता है — यहां से लड़कियों और महिलाओं को हैदराबाद, सिकंदराबाद, कोलकाता जैसे शहरों तक नौकरी और शादी का झांसा देकर ले जाया जाता है, और वहां जबरन घरेलू काम, बंधुआ मजदूरी या जबरन शादी में धकेल दिया जाता है।

अब तक क्या कार्रवाई हुई

अच्छी बात यह है कि पुलिस और प्रशासन इस मामले में हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे। फरवरी 2026 में बिहार सीआईडी के एडीजी डॉ. अमित जैन ने राज्य भर में 44 एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट यानी AHTU के गठन का ऐलान किया — एयरपोर्ट से लेकर हर जिले तक। इसके साथ ही एक अहम नियम भी लागू किया गया कि अगर कोई बच्चा चार महीने के भीतर बरामद नहीं होता, तो उसका केस अपने आप जिला स्तर की AHTU को सौंप दिया जाएगा, ताकि जांच में ढिलाई न हो।

अप्रैल 2026 में राज्य भर में चले “नया सवेरा 2.0” अभियान के तहत सिर्फ एक महीने में 94 पीड़ितों को मुक्त कराया गया, जिनमें 46 नाबालिग बच्चे शामिल थे — 20 बच्चियां और 26 बच्चे। इस दौरान दो तस्करों को भी गिरफ्तार किया गया, और राज्य भर के आर्केस्ट्रा डांस ग्रुपों पर भी निगरानी कड़ी की गई, क्योंकि कई मामलों में इनकी आड़ में नाबालिग लड़कियों से देह व्यापार कराया जा रहा था। सिर्फ छह दिन पहले ही पुलिस मुख्यालय में मानव तस्करी की जांच, समन्वय और पीड़ितों के पुनर्वास पर एक राज्यस्तरीय कार्यशाला भी आयोजित हुई, जिसमें घटना के पहले 48 घंटों को “गोल्डन आवर” बताते हुए हर जिले की AHTU को राज्य स्तरीय एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग ब्यूरो से लगातार तालमेल बनाए रखने का निर्देश दिया गया।

 उम्मीद अभी बाकी है

तो कहानी सिर्फ अंधेरे की नहीं है। हां, यह सच है कि बिहार से हर साल हजारों बच्चे और महिलाएं तस्करी का शिकार बनती हैं, और गरीबी व पारिवारिक कमजोरियों का फायदा उठाने वाले गिरोह अब भी सक्रिय हैं। लेकिन धनरूआ के इस मामले में जिस तरह एक पीड़ित मां ने हार नहीं मानी, चोरी-छिपे अपनी सास तक खबर पहुंचाई, और पुलिस ने महज़ कुछ घंटों में पांच आरोपियों तक पहुंचकर मां-बेटियों को सुरक्षित बरामद कर लिया — यह दिखाता है कि सही समय पर सही कदम उठाए जाएं, तो पीड़ितों को बचाया जा सकता है। अब सिर्फ एक ही मासूम, 2 साल की वह बच्ची, अब भी अपने घर लौटने का इंतजार कर रही है — और पुलिस का दावा है कि उसकी तलाश जारी है।

 

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