मांझी का विभाग 80,00,000 करोड़ कर्ज में !

BiharNewsAuthor
7 Min Read

यह कोई विपक्ष का आरोप नहीं, बल्कि हाल ही में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने केंद्रीय बजट पर सीधा सवाल उठाते हुए यह आंकड़े गिनाए। और यह सवाल सीधे उस मंत्रालय की तरफ जाता है, जिसकी कमान बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और अब केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के हाथ में है — सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी MSME मंत्रालय।

एमएस एम ई से जुडी एक खबर हमने आज के हिंदुस्तान अख़बार मे देखा इसमे लिखा है की पाच वर्षो में एम एस एम ई की एक करोड़ इकाईयाया लगेगी लाखो लोगो को प्रशिक्ष्ण दिया जाएगा ये एक अछि शुरुवात है लेकिन 2024 से अब तक इस विभाग में क्या क्या हुआ है हमने सोचा जरा इसकी पड़ताल की जाए तो 10 जून 2024 को जब 80 साल की उम्र में मांझी जी को मोदी कैबिनेट में यह मंत्रालय मिला, तो सवाल उठा था क्या उन्हें कोई असरदार जिम्मेदारी मिलेगी, या सिर्फ रस्म अदायगी वाला विभाग? जवाब में मिला देश का वह मंत्रालय, जो रोजगार देने के मामले में कृषि के बाद दूसरे नंबर पर आता हैकरोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी सीधे इसी विभाग की योजनाओं से जुड़ी है।

अब लगभग दो साल बाद, जब बिहार सरकार खुद अपनी नई MSME नीति लेकर आई है पांच साल में एक करोड़ नई इकाइयां लगाने और हर साल एक लाख लोगों को प्रशिक्षण देने के लक्ष्य के साथ तो सवाल और तीखा हो जाता है: क्या मांझी जी का मंत्रालय पहले से इतना मजबूत जमीन तैयार कर पाया है कि राज्य के यह बड़े लक्ष्य हकीकत बन सकें? या फिर पुरानी कमियां वहीं की वहीं खड़ी हैं?

नीति आयोग की रिपोर्ट इस तस्वीर को और साफ करती है। रिपोर्ट के मुताबिक MSME क्षेत्र में कर्ज का बहुत बड़ा गैप अब भी बना हुआ है — करीब 80 लाख करोड़ रुपए की कर्ज मांग अब भी पूरी नहीं हो पाई है। इसी रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बिजली की अनियमित आपूर्ति, कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी और ऊंची लागत की वजह से कई MSME नई तकनीकें अपना ही नहीं पातीं। सबसे बड़ी बात राज्य स्तर पर तमाम योजनाएं होने के बावजूद बहुत से उद्यमियों को उनकी जानकारी तक नहीं होती, यानी योजनाएं कागजों में हैं, जमीन पर उनकी पहुंच अधूरी है।

इसी कमी को पाटने के लिए मांझी मंत्रालय ने इस वित्तीय वर्ष में देश भर में 350 उद्यमी जागरूकता कार्यक्रम चलाने का फैसला किया — लेकिन सवाल यही है कि जब मंत्रालय को खुद मानना पड़े कि जागरूकता फैलाने के लिए सैकड़ों अलग कार्यक्रम चलाने पड़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि पुरानी योजनाएं अब तक ठीक से लोगों तक पहुंची ही नहीं थीं।
बिहार में विपक्ष भी लगातार यह सवाल उठाता रहा है कि आखिर केंद्र से बिहार को मिला क्या। मांझी जी अक्सर इसके जवाब में बिहटा जैसे केंद्रों और अरबों की योजनाओं की गिनती गिनाते हैं, लेकिन आलोचकों का साफ कहना है कि जब तक जमीनी स्तर पर नए उद्यम खड़े होकर असल रोजगार नहीं देते, सिर्फ केंद्रों के उद्घाटन से तस्वीर पूरी नहीं बदलती।

इसका मतलब यह नहीं कि दो साल में कुछ हुआ ही नहीं। सबसे बड़ी और चर्चित उपलब्धि रही अप्रैल 2026 में पटना के बिहटा में बना MSME टेक्नोलॉजी सेंटर। लगभग 200 करोड़ रुपए की लागत से बना यह केंद्र, और इसके साथ मुजफ्फरपुर, दरभंगा, रोहतास और मुंगेर में बने एक्सटेंशन सेंटर, बिहार के लिए बड़ी सौगात बताए गए। अकेले बिहटा केंद्र पर 171 करोड़ रुपए खर्च हुए।

इसके अलावा पीएम विश्वकर्मा योजना और ग्रामोद्योग विकास योजना के तहत टूलकिट बांटे गए, PMEGP योजना के लाभार्थियों को चेक दिए गए, और SC-ST हब योजना के तहत प्रमाणपत्र बांटे गए। मांझी जी लद्दाख जाने वाले देश के पहले MSME मंत्री भी बने, जहां उन्होंने वहां चल रही योजनाओं की समीक्षा की।
पैसों के मोर्चे पर मंत्रालय के स्तर पर एक बड़ा आंकड़ा यह है कि साल 2023-24 में केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों ने छोटे उद्यमों से कुल 74,717 करोड़ रुपए की खरीद की — कुल सरकारी खरीद का करीब 44 प्रतिशत — जिसका सीधा फायदा करीब 2 लाख 58 हजार MSE इकाइयों को मिला। हाल में पेश बजट में सरकार ने MSME क्षेत्र के लिए 10,000 करोड़ रुपए का नया SME ग्रोथ फंड भी घोषित किया है, ताकि सिर्फ कर्ज नहीं बल्कि इक्विटी सहारा भी मिल सके।

अगर बिहार सरकार की नई MSME नीति और केंद्र के मांझी मंत्रालय की योजनाओं में तालमेल बैठे, तो संभावनाएं बड़ी हैं। बिहार में अभी MSME सेक्टर देश के औद्योगिक नक्शे में बहुत पीछे है, जबकि यहां सस्ता श्रम, बड़ी आबादी और अब बिहटा जैसे नए तकनीकी केंद्र भी मौजूद हैं।

लेकिन यह संभावना तभी हकीकत बनेगी, जब वही कमियां दूर हों जिनकी बात शुरुआत में हुई — कर्ज तक आसान पहुंच, बिजली-इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाएं, और योजनाओं की जानकारी हर छोटे उद्यमी तक पहुंचना। सिर्फ नए केंद्र खोल देने या नई नीति बना देने भर से बदलाव नहीं आएगा। तो तस्वीर साफ है एक तरफ बिहटा टेक्नोलॉजी सेंटर, एक्सटेंशन सेंटर और जागरूकता कार्यक्रमों जैसी उपलब्धियां हैं, तो दूसरी तरफ MSME बंद होने की दर, 80 लाख करोड़ का कर्ज गैप और योजनाओं की अधूरी पहुंच जैसी गंभीर चुनौतियां अब भी जस की तस खड़ी हैं। अब जब बिहार खुद पांच साल की नई MSME नीति लेकर मैदान में उतरा है, असली परीक्षा यही होगी कि क्या मांझी मंत्रालय इन पुरानी कमियों को पीछे छोड़ पाता है, या फिर बड़े लक्ष्य सिर्फ कागजों में ही रह जाते हैं।

आपकी क्या राय है क्या मांझी जी का मंत्रालय बिहार की तस्वीर बदल पाएगा, या सिर्फ दावे बड़े रह जाएंगे? कमेंट में जरूर बताइए। वीडियो पसंद आए तो लाइक और सब्सक्राइब करना न भूलें।

Share This Article