बिहार की शिक्षा व्यवस्था: नालंदा की विरासत से कोचिंग संस्कृति तक, आखिर कहां पिछड़ गया बिहार?

BiharNewsAuthor
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एक कहावत है  “जिस डाल पर बैठे, उसी को काट डाला।” यह कहावत बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर जितनी सटीक बैठती है, शायद ही किसी और राज्य पर बैठती हो।

सोचिए, यह वही धरती है जहां कभी नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय हुआ करते थे। दुनिया के कई देशों—चीन, कोरिया और मध्य एशिया—से छात्र यहां ज्ञान अर्जित करने आते थे। लेकिन आज स्थिति ऐसी है कि बिहार के लाखों छात्रों को बेहतर शिक्षा और अच्छी डिग्री के लिए दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोटा का रुख करना पड़ता है।

दिलचस्प बात यह भी है कि 8 मई 2026 को जब बिहार को नया शिक्षा मंत्री मिला, तो उन्होंने शंखनाद और मंत्रोच्चारण के बीच पदभार ग्रहण किया। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा कि बिहार को फिर से “ज्ञान की भूमि” बनाया जाएगा। यह बात इसलिए भी खास है क्योंकि खुद मिथिलेश तिवारी कभी पटना में कोचिंग सेंटर में पढ़ाकर अपना गुजारा करते थे। यानी जिस कोचिंग संस्कृति ने सरकारी स्कूलों की कमजोरियों को उजागर किया, उसी व्यवस्था से निकला एक शिक्षक आज पूरे शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहा है।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर बिहार की शिक्षा व्यवस्था की असली तस्वीर क्या है? क्या नए शिक्षा मंत्री हालात बदल पाएंगे?

स्कूलों की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक

बिहार में पिछले कई वर्षों के दौरान आधा दर्जन से अधिक शिक्षा मंत्री बदल चुके हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की तस्वीर आज भी चिंताजनक बनी हुई है।जन जागरण शक्ति संगठन के एक सर्वे के अनुसार बिहार में ऐसा एक भी प्राथमिक विद्यालय नहीं मिला, जहां बिजली, पेयजल और शौचालय तीनों सुविधाएं एक साथ उपलब्ध हों।

करीब 90 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में न खेल का मैदान है, न पुस्तकालय और न ही पर्याप्त चारदीवारी।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सर्वे के दौरान प्राथमिक विद्यालयों में केवल 23 प्रतिशत बच्चे ही उपस्थित मिले, जबकि तैनात शिक्षकों में से लगभग आधे स्कूल से अनुपस्थित पाए गए।

कंप्यूटर शिक्षा भी कागजों तक सीमित

डिजिटल शिक्षा की बात तो खूब होती है, लेकिन बिहार के अधिकांश सरकारी स्कूल आज भी तकनीकी सुविधाओं से दूर हैं।आंकड़ों के मुताबिक राज्य के केवल 18.9 प्रतिशत स्कूलों में ही कंप्यूटर उपलब्ध हैं। यानी लगभग 81 प्रतिशत स्कूलों में आज भी कंप्यूटर नहीं हैं। इस मामले में बिहार देश में 34वें स्थान पर है।

पढ़ाई का स्तर लगातार गिर रहा

ASER (Annual Status of Education Report) ने भी बिहार की शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर तस्वीर पेश की है।रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012 की तुलना में सरकारी स्कूलों के बच्चों की हिंदी, अंग्रेजी पढ़ने और गणित हल करने की क्षमता में गिरावट दर्ज की गई है।करीब 74.8 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा 2 के बच्चे कक्षा 1 या अन्य कक्षाओं के छात्रों के साथ एक ही कमरे में बैठकर पढ़ाई करते हैं, क्योंकि पर्याप्त कमरे और शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं।

सरकारी स्कूलों से बच्चों का लगातार पलायन

शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ 2025-26 रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो वर्षों में पूरे देश के सरकारी स्कूलों से लगभग 86 लाख बच्चों का नाम कट गया, जबकि इसी अवधि में निजी स्कूलों में करीब 88 लाख नए दाखिले हुए।यानी जितने बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ रहे हैं, लगभग उतने ही निजी स्कूलों में जा रहे हैं।अगर केवल बिहार की बात करें तो तस्वीर और भी चिंताजनक है।साल 2019-20 में बिहार के सरकारी स्कूलों में करीब 2.1 करोड़ छात्र नामांकित थे।वहीं 2023-24 तक यह संख्या घटकर लगभग 1.74 करोड़ रह गई।यानी चार वर्षों में करीब 36 लाख छात्रों की कमी दर्ज हुई।हालांकि आबादी अधिक होने के कारण बिहार में आज भी देश के सबसे अधिक सरकारी स्कूल छात्र हैं, लेकिन ड्रॉपआउट दर के मामले में बिहार सबसे आगे है। माध्यमिक स्तर पर करीब 25.6 प्रतिशत छात्र बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।

शिक्षक बढ़े, लेकिन बच्चे नहीं टिके

एक सकारात्मक तथ्य यह भी है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या बढ़ी है।साल 2019-20 में जहां करीब 5.22 लाख शिक्षक थे, वहीं 2023-24 तक यह संख्या बढ़कर 5.36 लाख हो गई।लेकिन सवाल वही है कि जब छात्र ही स्कूल छोड़ रहे हों, तो केवल शिक्षक बढ़ जाने से शिक्षा व्यवस्था कैसे सुधरेगी?

कोचिंग संस्कृति क्यों बनी मजबूरी?

जब सरकारी स्कूलों में पढ़ाई कमजोर हो, शिक्षक अनुपस्थित रहें और बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध न हों, तो अभिभावक मजबूरी में बच्चों को कोचिंग भेजते हैं।ASER रिपोर्ट बताती है कि निजी ट्यूशन लेने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है।आज बड़ी संख्या में छात्र केवल कागजों पर सरकारी स्कूल में नामांकित हैं। वास्तविक पढ़ाई शाम को कोचिंग संस्थानों में होती है, जहां अभिभावकों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।

अब सरकार भी बना रही है कोचिंग नीति

दिलचस्प बात यह है कि नए शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने अधिकारियों को कोटा और सीकर जैसे बड़े कोचिंग केंद्रों का अध्ययन कर बिहार के लिए अलग कोचिंग नीति तैयार करने का निर्देश दिया है।इससे साफ है कि सरकार भी स्वीकार कर रही है कि वर्तमान समय में पढ़ाई का असली केंद्र सरकारी स्कूल नहीं, बल्कि कोचिंग संस्थान बन चुके हैं।

TRE भर्ती के बाद भी खत्म नहीं हुई शिक्षकों की कमी

बिहार में पिछले वर्षों में TRE-1, TRE-2 और TRE-3 के माध्यम से बड़ी संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति हुई।इसके बावजूद विद्यालयों में शिक्षकों की कमी बनी हुई है।इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने करीब 2.60 लाख शिक्षकों की नियुक्ति पर सवाल खड़े कर दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए TET पास होना अनिवार्य है।इस फैसले ने वर्षों से चली आ रही भर्ती प्रक्रिया की खामियों को उजागर कर दिया।

नए शिक्षा मंत्री के बड़े फैसले

पदभार संभालने के बाद मिथिलेश तिवारी ने कई अहम घोषणाएं कीं।

उन्होंने कहा कि—

  • शिक्षकों की उपस्थिति अब पोर्टल के माध्यम से दर्ज होगी।
  • शिक्षकों का मूल्यांकन छात्रों की प्रगति के आधार पर होगा।
  • जिला कैडर व्यवस्था लागू होगी।
  • महिला शिक्षकों की पोस्टिंग उनके घर के नजदीक पंचायत में होगी।
  • पुरुष शिक्षकों की पोस्टिंग निकटतम प्रखंड में होगी।
  • हर प्रखंड में मॉडल स्कूल विकसित किए जाएंगे।
  • TRE-4 भर्ती प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी।

सरकार का दावा है कि मॉडल स्कूलों में अब तक करीब चार लाख छात्रों का नामांकन कराया जा चुका है।

TRE-4 अभ्यर्थियों का इंतजार जारी

हालांकि शिक्षा मंत्री ने मई में प्रदर्शन कर रहे TRE-4 अभ्यर्थियों से कहा था कि एक सप्ताह के भीतर समाधान निकाल लिया जाएगा।लेकिन दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अधिसूचना जारी नहीं हो सकी।यही कारण है कि अभ्यर्थियों में नाराजगी बनी हुई है।

विवादों में भी रहे शिक्षा मंत्री

पदभार संभालने के बाद मिथिलेश तिवारी कई बार विवादों में भी रहे।एक बार मीडिया से बातचीत के दौरान वे गलती से खुद को स्वास्थ्य मंत्री बता बैठे।वहीं छात्राओं के आंदोलन को लेकर दिए गए बयान पर भी विवाद हुआ। बाद में तथ्य स्पष्ट होने के बाद मामला शांत हुआ, लेकिन इन विवादों के बीच शिक्षा व्यवस्था से जुड़े असली मुद्दे पीछे छूटते नजर आए।

विश्वविद्यालयों में भी हजारों पद खाली

अगर उच्च शिक्षा की बात करें तो स्थिति यहां भी संतोषजनक नहीं है।बिहार के 13 विश्वविद्यालयों के अधीन आने वाले कॉलेजों में शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों के लगभग 26 हजार पद वर्षों से खाली पड़े हैं।राज्य सरकार ने इनमें भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की है, जिसमें करीब 6,600 लेक्चरर और 11 हजार से अधिक गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति प्रस्तावित है।

कॉलेजों में भी समय पर नहीं हो रही पढ़ाई

शिक्षकों की कमी का असर विश्वविद्यालयों पर भी दिखाई दे रहा है।पटना विश्वविद्यालय में पिछले वर्ष पहले सेमेस्टर का परिणाम समय पर जारी नहीं हो सका, जिससे दूसरे सेमेस्टर में प्रवेश प्रक्रिया प्रभावित हुई।छात्र संगठनों का कहना है कि सत्र नियमित न होने से छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा दोनों में पिछड़ रहे हैं।

नए कॉलेज खुल रहे, लेकिन शिक्षक नहीं

राज्य सरकार 211 नए डिग्री कॉलेज खोल रही है।लेकिन कई जिलों में नए कॉलेजों के लिए शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति अंतिम समय में रद्द होने की खबरें सामने आई हैं।यानी भवन तैयार हैं, लेकिन पढ़ाने वाले शिक्षक अभी भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हैं।

क्या बिहार फिर बन पाएगा ज्ञान की भूमि?

एक ओर बिहार अपनी ऐतिहासिक विरासत—नालंदा और विक्रमशिला—पर गर्व करता है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत कई गंभीर सवाल खड़े करती है।नए शिक्षा मंत्री ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं जरूर की हैं, लेकिन असली परीक्षा इन घोषणाओं को जमीन पर उतारने की होगी।जब तक स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई, पर्याप्त शिक्षक, आधुनिक संसाधन और नियमित शैक्षणिक व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक कोचिंग संस्कृति और निजी शिक्षा पर निर्भरता कम होना मुश्किल दिखाई देता है।बिहार की शिक्षा व्यवस्था को बदलने के लिए केवल नए मंत्री नहीं, बल्कि लंबे समय तक निरंतर और प्रभावी सुधारों की आवश्यकता होगी। तभी नालंदा की विरासत वाला बिहार एक बार फिर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी खोई हुई पहचान वापस पा सकेगा।

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