“बिहार में फिर चालू हो शराब, सूखे नशे ने युवाओं को बर्बाद किया।” अनंत सिंह ने नए मुख्यमंत्री के सामने उठाई शराब चालू करने की मांग

BiharNewsAuthor
5 Min Read

BNT Desk: बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण के बाद अब सबसे बड़ा सवाल ‘शराबबंदी कानून’ को लेकर खड़ा हो गया है। राज्य में मंत्रिमंडल विस्तार की सुगबुगाहट के बीच शराबबंदी की समीक्षा और इसमें संभावित संशोधनों की चर्चा ने सियासी गलियारे में हलचल पैदा कर दी है। सत्ता पक्ष के भीतर से ही उठती आवाजों और प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकारों के दावों ने नई सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है।

अनंत सिंह का बड़ा बयान: “खतरनाक हो गया है सूखा नशा”

मोकामा के पूर्व विधायक और बाहुबली नेता अनंत सिंह ने शराबबंदी को लेकर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि शराबबंदी कानून को अब खत्म कर देना चाहिए।

अनंत सिंह का तर्क है कि शराबबंदी के कारण बिहार में ‘निशा-पानी’ यानी सूखे नशे (जैसे स्मैक, गांजा और अन्य सिंथेटिक ड्रग्स) का चलन बहुत ज्यादा बढ़ गया है, जो शराब से कहीं अधिक खतरनाक है। उन्होंने कहा कि वे इस मुद्दे पर नए मुख्यमंत्री समरात चौधरी से मिलकर बात करेंगे और शराब को फिर से चालू करने की मांग करेंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि बिहार की राजनीति के असली ‘मालिक’ और मार्गदर्शक नीतीश कुमार ही बने रहेंगे।

निशांत कुमार को डिप्टी सीएम बनाने की मांग

इसी बातचीत के दौरान अनंत सिंह ने एक और चौंकाने वाली मांग रख दी। उन्होंने नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री बनाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि “जनता यही चाहती है और अगर निशांत कुमार डिप्टी सीएम बनते हैं, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहुत खुशी होगी।” यह बयान ऐसे समय में आया है जब जदयू के भीतर नेतृत्व के भविष्य को लेकर अक्सर चर्चा होती रहती है।

सत्ता पक्ष में उठते विरोधाभासी सुर

शराबबंदी कानून को लेकर एनडीए गठबंधन के भीतर एक राय नहीं दिख रही है:

  • जीतन राम मांझी: हम (HAM) संरक्षक और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी कई बार कह चुके हैं कि शराबबंदी के नाम पर गरीबों को प्रताड़ित किया जा रहा है और कानून में बदलाव जरूरी है।

  • देवेश चंद्र ठाकुर: जदयू के वरिष्ठ नेता और सांसद देवेश चंद्र ठाकुर भी इस कानून की व्यावहारिकता पर सवाल उठा चुके हैं।

  • जदयू का स्टैंड: इन तमाम दबावों के बावजूद जदयू के शीर्ष नेतृत्व ने अब तक यही कहा है कि शराबबंदी गांधीवादी विचारधारा का हिस्सा है और इसे समाप्त नहीं किया जाएगा।

प्रशांत किशोर का दावा: राजस्व के दबाव में झुकेगी सरकार?

जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि सरकार तीन से चार महीनों के भीतर शराबबंदी खत्म करने को मजबूर हो सकती है।

प्रशांत किशोर के अनुसार:

  1. राजस्व की हानि: बिहार को हर साल करीब 20,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है।

  2. आर्थिक दबाव: राज्य की वित्तीय स्थिति ऐसी नहीं है कि वह लंबे समय तक इस नुकसान को झेल सके।

  3. भ्रष्टाचार: पुलिस और शराब माफियाओं के बीच का गठबंधन सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है।

नई सरकार के सामने अग्निपरीक्षा

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए यह मुद्दा ‘कांटों भरा ताज’ साबित हो सकता है। एक तरफ भाजपा का वह धड़ा है जो राजस्व और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करता है, तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार का वह दृढ़ निश्चय है जिसने शराबबंदी को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है।

संभावित समाधान: जानकारों का मानना है कि सरकार पूरी तरह शराबबंदी खत्म करने के बजाय ‘गुजरात मॉडल’ की तर्ज पर इसमें कुछ ढील दे सकती है या शराबबंदी कानून की धाराओं को नरम कर सकती है ताकि जेलों में बंद लाखों गरीबों को राहत मिल सके।

Share This Article