बिहार की राजनीति में 15 अप्रेल का दिन एक ऐतिहासिक मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कद्दावर नेता सम्राट चौधरी ने बिहार के 24th मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, जिससे राज्य में पहली बार विशुद्ध रूप से भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का गठन हुआ । लेकिन इस बड़े राजनीतिक बदलाव की सबसे दिलचस्प और विडंबनापूर्ण कहानी सम्राट चौधरी और उपेंद्र कुशवाहा के इर्द-गिर्द घूमती है। यह लेख विश्लेषण करेगा कि कैसे उपेंद्र कुशवाहा, जो सम्राट से राजनीति में काफी वरिष्ठ थे और लंबे समय से ‘CM Material’ माने जा रहे थे, अपनी ही मेहनत का फल चखने से महरूम रह गए और सम्राट चौधरी बाजी मार ले गए।
बिहार में कुशवाहा राजनीति: उपेंद्र कुशवाहा की मेहनत और सम्राट चौधरी का राजतिलक
बिहार के राजनीतिक इतिहास में कुशवाहा (कोइरी) समाज एक अत्यंत प्रभावशाली वोट बैंक रहा है, जो राज्य की जनसंख्या का लगभग 4.2% से 7% हिस्सा है। इस समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करने और उन्हें सत्ता की मुख्यधारा में लाने का सबसे बड़ा श्रेय उपेंद्र कुशवाहा को जाता है। उन्होंने दशकों तक ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) समीकरण के भीतर कोइरी समाज के सम्मान की लड़ाई लड़ी। लेकिन आज की हकीकत यह है कि जिस समाज की फसल उपेंद्र ने बोई और सींची, उसकी कटाई का सौभाग्य सम्राट चौधरी को मिला।
उपेंद्र कुशवाहा: एक वरिष्ठ नेता जो ‘किंगमेकर’ से आगे नहीं बढ़ पाए
उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक वरिष्ठता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2004 में, जब वे पहली बार विधायक बने थे, तभी उन्हें बिहार विधानसभा में ‘नेता प्रतिपक्ष’ (Leader of Opposition) की अहम जिम्मेदारी मिल गई थी। उनकी शैक्षणिक योग्यता (M.A. Political Science) और उनकी वाकपटुता ने उन्हें एक बौद्धिक पिछड़े नेता के रूप में स्थापित किया।
नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के रूप में अक्सर उनका नाम लिया जाता था और राजनीतिक हलकों में उन्हें ‘CM Material’ माना जाता था। उन्होंने कुशवाहा समाज को यह अहसास कराया कि वे केवल वोट देने के लिए नहीं, बल्कि सत्ता में शीर्ष हिस्सेदारी पाने के हकदार हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी बाधा बनी उनकी ‘राजनीतिक अस्थिरता’ । पिछले 2 decades में उपेंद्र कुशवाहा ने कई बार पार्टियां बनाईं, विलय किया और गठबंधन बदले। उनकी इसी अस्थिर छवि ने उनके विश्वसनीय जनाधार को धीरे-धीरे कमजोर किया।

सम्राट चौधरी का उदय: विवादों से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक
सम्राट चौधरी, जो उम्र और अनुभव दोनों में उपेंद्र कुशवाहा से कनिष्ठ (Junior) हैं, उनका राजनीतिक सफर संघर्षों और रणनीतिक स्थिरता का मिश्रण रहा है। सम्राट चौधरी का नाम पहली बार 1999 में सुर्खियों में आया था जब उन्हें राबड़ी देवी सरकार में कृषि मंत्री बनाया गया था, लेकिन कम उम्र (Underage) होने के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा था।
सम्राट चौधरी ने अपने करियर में कई पार्टियां बदलीं (RJD, JDU, HAM), लेकिन 2017 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक स्थिरता दिखाई। भाजपा ने उन्हें एक आक्रामक ओबीसी चेहरे के रूप में तैयार किया। सम्राट का “नीतीश को सत्ता से हटाने तक पगड़ी (मुरेठा) नहीं खोलूंगा” वाला संकल्प कुशवाहा युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसने उन्हें समाज के नए और शक्तिशाली विकल्प के रूप में स्थापित कर दिया।
कैसे सम्राट चौधरी निकले उपेंद्र कुशवाहा से आगे?
सम्राट चौधरी की सफलता और उपेंद्र कुशवाहा की विफलता के पीछे 4 प्रमुख कारण रहे हैं:
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संगठनात्मक वफादारी बनाम व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा: सम्राट चौधरी ने भाजपा के एक अनुशासित सिपाही के रूप में खुद को पेश किया। वहीं, उपेंद्र कुशवाहा ने बार-बार अपनी अलग पार्टी (RLSP, RLJD, RLM) बनाकर अपनी ताकत को बिखेर दिया ।
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भाजपा की सोची-समझी रणनीति: भाजपा नीतीश कुमार के ‘लव-कुश’ वोट बैंक में अपनी सीधी पहुंच चाहती थी। इसके लिए उन्हें एक ऐसे नेता की जरूरत थी जो सीधे भाजपा के नियंत्रण में हो। सम्राट चौधरी इस फ्रेम में पूरी तरह फिट बैठे, जबकि उपेंद्र कुशवाहा हमेशा अपनी शर्तों पर गठबंधन करते थे।
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2024 की चुनावी हार: 2024 के लोकसभा चुनाव में काराकाट सीट पर उपेंद्र कुशवाहा की हार (त्रिकोणीय मुकाबले में तीसरे स्थान पर रहना) ने उनके ‘जननेता’ होने के दावे को कमजोर कर दिया । इसके विपरीत, सम्राट चौधरी ने प्रदेश अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री के रूप में भाजपा के आधार को मजबूत किया।
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परिवारवाद का आरोप: 2025 के चुनावों के बाद, उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को पंचायती राज मंत्री नियुक्त करवाया, जिससे उनकी पार्टी में ही विद्रोह हो गया । इससे उनकी छवि एक ‘समाजवादी नेता’ के बजाय ‘परिवारवादी नेता’ की बन गई, जिसका फायदा सम्राट चौधरी को मिला।
कुशवाहा राजनीति का नया व्याकरण
आज 15 April को सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार में ‘मंडल-पार्ट 2’ की राजनीति का संकेत है, जहाँ भाजपा अब पिछड़ों के नेतृत्व के लिए क्षेत्रीय दलों पर निर्भर नहीं है । उपेंद्र कुशवाहा ने जिस सामाजिक चेतना की नींव रखी थी, उस पर सम्राट चौधरी ने भाजपा के समर्थन से सत्ता का महल खड़ा कर लिया है।
उपेंद्र कुशवाहा फिलहाल राज्यसभा सदस्य के रूप में एनडीए का हिस्सा हैं । उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वे अपनी प्रासंगिक पहचान कैसे बचाए रखते हैं, क्योंकि अब कुशवाहा समाज के पास सम्राट चौधरी के रूप में सत्ता का एक सीधा और अधिक शक्तिशाली केंद्र मौजूद है।
बिहार की राजनीति का यह अध्याय सिखाता है कि केवल मुद्दा उठाना या समाज को जगाना काफी नहीं है, बल्कि उस शक्ति को सत्ता में बदलने के लिए रणनीतिक स्थिरता और संगठनात्मक समर्थन अनिवार्य है। उपेंद्र कुशवाहा ने रास्ता दिखाया, लेकिन सम्राट चौधरी उस रास्ते पर चलकर मंजिल तक पहुँचने में सफल रहे।