Bihar Women Entrepreneurs: स्ट्रीट फूड बिजनेस से घर चला रहीं बिहार की महिलाएं, 52% भागीदारी के साथ देश में दूसरे स्थान पर

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Women Entrepreneurs in Bihar: Women in Bihar are supporting their households through street food businesses; the state ranks second in the country with a 52% participation rate.

BNT Desk : बिहार में महिलाएं अब केवल घर की रसोई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उसी हुनर को रोजगार और कमाई का जरिया भी बना रही हैं। ठेला-खोमचा, चाय की दुकान, चाट-पकौड़ा, ढाबा और दूसरे स्ट्रीट फूड कारोबार में उनकी भागीदारी बढ़ रही है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, बिहार के फूड सेक्टर में महिलाओं की हिस्सेदारी 52 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय औसत 41 फीसदी है। इस तरह बिहार राष्ट्रीय औसत से 11 प्रतिशत अंक आगे है और महिला भागीदारी के मामले में देश में दूसरे स्थान पर बताया गया है।

बिहार में फूड बिजनेस से जुड़ी 52% महिलाएं

बिहार में खान-पान से जुड़े छोटे कारोबार महिलाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहे हैं। कम पूंजी में शुरू होने वाले इन व्यवसायों के जरिए महिलाएं परिवार की आय में योगदान दे रही हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य के फूड सेक्टर में काम करने वाले कुल कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी 52 फीसदी है। वहीं, देश में यह औसत 41 फीसदी बताया गया है।असंगठित क्षेत्र के कामगारों का पंजीकरण वर्ष 2021 से ई-श्रम पोर्टल पर किया जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में फूड सेक्टर के 18.60 लाख से अधिक कामगार इस पोर्टल पर पंजीकृत हैं।

ई-श्रम पोर्टल पर फूड सेक्टर के पंजीकृत कामगार

राज्य पंजीकृत कामगार
उत्तर प्रदेश 3.82 लाख
बिहार 1.90 लाख
महाराष्ट्र 1.64 लाख
मध्य प्रदेश 1.62 लाख
देशभर में कुल 18.60 लाख से अधिक

पंजीकृत कामगारों की संख्या के मामले में बिहार देश में दूसरे स्थान पर है। हालांकि, ई-श्रम पोर्टल का आंकड़ा पंजीकृत कामगारों को दर्शाता है, इसलिए इसे राज्य में फूड सेक्टर में काम करने वाले सभी लोगों की कुल संख्या नहीं माना जाना चाहिए।

ठेला-खोमचा और चाट-पकौड़ा से मिल रहा सबसे ज्यादा रोजगार

बिहार में स्ट्रीट फूड का कारोबार बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका का साधन बना हुआ है। चाट-पकौड़ा, ठेला-खोमचा और अन्य स्ट्रीट फूड व्यवसायों से 4.36 लाख से अधिक लोगों के जुड़े होने की जानकारी दी गई है।फूड सेक्टर के अलग-अलग कारोबारों में रोजगार का विवरण इस प्रकार है:

कारोबार कामगारों की संख्या
चाट-पकौड़ा और अन्य स्ट्रीट फूड 4.36 लाख से अधिक
बेकरी करीब 40 हजार
फूड ग्रेन और मिलिंग करीब 16 हजार
होम डिलीवरी करीब 15 हजार
दूध बेचने का कारोबार 10 हजार से अधिक
चाय बनाने का कारोबार 10 हजार से अधिक
खाना बनाने का काम करीब 10 हजार
ठेले पर फल बेचने का कारोबार 6,500 से अधिक

इन आंकड़ों से पता चलता है कि खान-पान से जुड़ी छोटी दुकानें और सड़क किनारे के कारोबार रोजगार के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। खासकर महिलाओं के लिए ये व्यवसाय घर की जिम्मेदारियों के साथ आय अर्जित करने का अवसर उपलब्ध करा सकते हैं।

फूड सेक्टर में युवाओं की भागीदारी भी ज्यादा

बिहार के फूड सेक्टर में युवा कामगारों की हिस्सेदारी भी उल्लेखनीय बताई गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में काम करने वाले 69 फीसदी लोग 18 से 40 वर्ष की आयु के हैं।

आयु वर्ग कुल कामगारों में हिस्सेदारी
18 से 40 वर्ष 69%
40 से 50 वर्ष 18%
50 वर्ष से अधिक 12% से ज्यादा

ये आंकड़े संकेत देते हैं कि फूड बिजनेस केवल पारंपरिक रोजगार नहीं, बल्कि युवाओं के लिए स्वरोजगार का एक विकल्प भी है। छोटे स्टॉल और खाने-पीने की दुकानें शुरू करके लोग अपनी जरूरतों और बाजार की मांग के अनुसार कारोबार विकसित कर सकते हैं।

पटना में सबसे ज्यादा फूड सेक्टर के कामगार

बिहार के विभिन्न जिलों में भी फूड सेक्टर से जुड़े कामगारों की अच्छी संख्या है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, पटना इस सूची में सबसे आगे है।

जिला कामगारों की संख्या
पटना 12 हजार से अधिक
मुजफ्फरपुर करीब 10 हजार
मधुबनी लगभग 8,400
पूर्वी चंपारण लगभग 8,400
समस्तीपुर 7,500 से अधिक
पश्चिमी चंपारण लगभग 7,300
भागलपुर करीब 5,700

पटना जैसे शहरी इलाकों में चाय, नाश्ते, चाट और दूसरे स्ट्रीट फूड की मांग छोटे कारोबारों को बढ़ने का अवसर देती है। वहीं, दूसरे जिलों में भी स्थानीय बाजार और लोगों की जरूरतों के अनुसार इस तरह के व्यवसाय आजीविका का साधन बन रहे हैं।

केस स्टडी 1: ‘नर्सिंग चायवाली’ प्रीति झा की कहानी

पटना के महेंद्रू इलाके में चाय का स्टॉल चलाने वाली प्रीति झा सोशल मीडिया पर ‘नर्सिंग चायवाली’ के नाम से पहचानी जाती हैं। नर्सिंग की पढ़ाई कर चुकीं प्रीति ने निजी जीवन की मुश्किल परिस्थितियों के बीच अपना कारोबार शुरू करने का फैसला लिया।रिपोर्ट के मुताबिक, वैवाहिक जीवन में परेशानियों और पति की शराब की लत के कारण उन्हें अलग होने का निर्णय लेना पड़ा। इसके बाद अपनी छोटी बेटी की जिम्मेदारी उठाने और उसके बेहतर भविष्य के लिए उन्होंने चाय का स्टॉल शुरू किया।बताया गया है कि प्रीति इस कारोबार से महीने में करीब 30 हजार रुपये तक कमा लेती हैं। उनकी कहानी बताती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद छोटा व्यवसाय परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का जरिया बन सकता है।

केस स्टडी 2: दो बहनों का स्टार्टअप ‘कुचु-पुचु’

पटना के एसके पुरी पार्क के पास राशिका वरुण तिवारी और सपना तिवारी ‘गुप-चुप’ नाम से अपना स्टॉल चलाती हैं। यह स्टॉल युवाओं के बीच लोकप्रिय बताया जाता है।रिपोर्ट के अनुसार, सपना ने अपनी मां की खराब तबीयत के कारण कॉरपोरेट नौकरी छोड़कर पटना लौटने का फैसला किया। इसके बाद दोनों बहनों ने मिलकर अपना कारोबार शुरू किया।

हालांकि, उनके लिए भी यह सफर आसान नहीं रहा। सड़क किनारे स्टॉल लगाने के लिए जगह की व्यवस्था करना और कारोबार के साथ घर की जिम्मेदारियां निभाना उनके सामने बड़ी चुनौतियां थीं।सपना के मुताबिक, नौकरी छोड़कर अपना काम शुरू करना आसान नहीं होता और इसके लिए कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद दोनों बहनें मेहनत से अपना कारोबार आगे बढ़ा रही हैं।

महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का नया रास्ता

बिहार में स्ट्रीट फूड और खान-पान का कारोबार महिलाओं के लिए आय अर्जित करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। प्रीति झा और राशिका-सपना की कहानियां दिखाती हैं कि छोटे स्तर पर शुरू किया गया व्यवसाय भी परिवार की आर्थिक जरूरतों में योगदान दे सकता है।

हालांकि, ऐसे कारोबारों को लंबे समय तक चलाने के लिए उचित जगह, शुरुआती पूंजी, स्वच्छता, सुरक्षित कार्यस्थल और ग्राहकों तक पहुंच जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं।

बिहार में फूड सेक्टर में महिलाओं की 52 फीसदी भागीदारी इस क्षेत्र में उनकी सक्रिय भूमिका को रेखांकित करती है। छोटे स्टॉल से लेकर चाय की दुकानों तक, महिलाएं अपने हुनर को रोजगार में बदल रही हैं और परिवार की आय में योगदान दे रही हैं।

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