राष्ट्रीय जनता दल (राजद) कभी बिहार की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकतों में गिनी जाती थी। सामाजिक न्याय की राजनीति के नाम पर लालू प्रसाद यादव ने जिस पार्टी की नींव रखी, उसने तीन दशक तक बिहार की राजनीति को प्रभावित किया। लेकिन अब वही पार्टी लगातार अपने पुराने और अनुभवी नेताओं के पार्टी छोड़ने की वजह से चर्चा में है।
ताजा मामला राजद के वरिष्ठ प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी के इस्तीफे का है। उनके इस्तीफे के बाद एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं कि क्या राजद के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा, या यह केवल कुछ नेताओं की व्यक्तिगत नाराजगी का मामला है।
मृत्युंजय तिवारी ने दिया इस्तीफा
16 जुलाई 2026 को राजद के वरिष्ठ प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने प्रदेश अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल को अपना इस्तीफा सौंप दिया। वर्ष 2014 से पार्टी का मीडिया मोर्चा संभाल रहे मृत्युंजय तिवारी लंबे समय तक लालू प्रसाद यादव के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते रहे हैं।
इस्तीफा देने के बाद उन्होंने कई गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना था कि तेजस्वी यादव के आसपास कुछ ऐसे लोग सक्रिय हैं जिन्होंने पार्टी को अंदर से कमजोर कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी शिकायतों पर न तो वरिष्ठ नेताओं ने ध्यान दिया और न ही तेजस्वी यादव ने।
मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि लगातार अपमानित होने के बाद पार्टी में बने रहना संभव नहीं था। हालांकि खबर लिखे जाने तक राजद की ओर से उनके इस्तीफे को लेकर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
NDA में जाने की अटकलें
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मृत्युंजय तिवारी आने वाले दिनों में एनडीए का दामन थाम सकते हैं। हालांकि उन्होंने अभी तक सार्वजनिक रूप से किसी नई पार्टी में शामिल होने की घोषणा नहीं की है।
उनका इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर बिहार की राजनीति पहले से ही गर्म है। ऐसे में इसे राजद के लिए राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
पहले भी कई नेता छोड़ चुके हैं पार्टी
मृत्युंजय तिवारी पहले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्होंने पार्टी नेतृत्व को लेकर नाराजगी जताई हो।
इससे पहले श्याम रजक भी पार्टी छोड़ चुके हैं। उन्होंने भी संगठन की कार्यशैली और नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए थे। लगातार वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने से यह चर्चा तेज हो गई है कि संगठन के भीतर असंतोष बढ़ रहा है।
स्थापना दिवस पर भी दिखी नाराजगी
राजद ने अपना 30वां स्थापना दिवस 1 जुलाई 2026 को मनाया। इस दौरान पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उदय नारायण चौधरी और वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने सार्वजनिक मंच से तेजस्वी यादव को कार्यकर्ताओं के बीच ज्यादा समय देने की सलाह दी।
दोनों नेताओं ने कहा कि कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद बढ़ाना जरूरी है और लालू प्रसाद यादव की तरह लोगों के बीच सक्रिय रहना चाहिए।
स्थापना दिवस निर्धारित तिथि से पहले आयोजित होने को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं हुईं। भाजपा ने आरोप लगाया कि तेजस्वी यादव अपनी विदेश यात्रा से पहले कार्यक्रम जल्दबाजी में निपटाकर चले गए।
रोहिणी आचार्य का विवाद भी बना चर्चा का विषय
विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की हार के बाद लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने भी सोशल मीडिया पर कई गंभीर आरोप लगाए थे।
उन्होंने दावा किया था कि पार्टी की हार की समीक्षा के दौरान जब उन्होंने कुछ नेताओं के बारे में सवाल उठाया तो उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया। इसके बाद वे पटना से दिल्ली चली गईं।
हालांकि बाद में परिवार की ओर से इस विवाद पर सार्वजनिक रूप से ज्यादा टिप्पणी नहीं की गई, लेकिन इस घटना ने पार्टी के भीतर मतभेद की चर्चाओं को और हवा दी।
अभय कुशवाहा को लेकर भी चर्चाएं
इसी बीच राजद के राज्यसभा सांसद अभय कुशवाहा को लेकर भी राजनीतिक अटकलें जारी हैं। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि उनकी भाजपा नेताओं, विशेषकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकातों के बाद राजनीतिक चर्चाएं तेज हुई हैं।
हालांकि अभी तक न तो अभय कुशवाहा और न ही भाजपा या राजद की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा की गई है।
संगठन को लेकर उठ रहे सवाल
राजद के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी के भीतर संवाद पहले की तुलना में कम हुआ है। कई नेताओं ने समय-समय पर यह भी कहा कि कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के बीच सीधा संपर्क मजबूत होना चाहिए।
इसी वजह से लगातार यह चर्चा होती रही है कि संगठनात्मक स्तर पर पार्टी को नई रणनीति और बेहतर संवाद व्यवस्था की जरूरत है।
क्या राजद के सामने बड़ी चुनौती है?
मृत्युंजय तिवारी का इस्तीफा, श्याम रजक की विदाई, रोहिणी आचार्य का सार्वजनिक विवाद, स्थापना दिवस पर वरिष्ठ नेताओं की सलाह और अभय कुशवाहा को लेकर चल रही चर्चाएं—इन सभी घटनाओं ने राजद के भीतर चल रही राजनीतिक हलचल को चर्चा का विषय बना दिया है।
हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पार्टी किसी बड़े विभाजन की ओर बढ़ रही है। फिलहाल सामने आए मामले व्यक्तिगत इस्तीफों, असंतोष और राजनीतिक अटकलों तक सीमित हैं। राजद की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक स्वीकारोक्ति नहीं की गई है।
लेकिन इतना तय है कि लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने पार्टी की छवि और संगठनात्मक मजबूती को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि तेजस्वी यादव इन चुनौतियों का सामना किस तरह करते हैं और क्या पार्टी अपने पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं का भरोसा फिर से मजबूत कर पाती है।