बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं की चर्चा जब भी होती है, आनंद मोहन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। एक ऐसा नेता जिसे कभी भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई, फिर वह सजा उम्रकैद में बदल गई। इसके बाद बिहार सरकार ने जेल नियमों में बदलाव किया और महज 14 साल जेल में रहने के बाद उन्हें रिहा कर दिया।
अब उनकी रिहाई के तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने इस पूरे मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान कई गंभीर सवाल उठाए हैं। ऐसे में एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है कि क्या आनंद मोहन को दोबारा जेल जाना पड़ सकता है?
क्या था जी. कृष्णैया हत्याकांड?
यह मामला 5 दिसंबर 1994 का है। उस समय गोपालगंज के जिलाधिकारी जी. कृष्णैया अपनी सरकारी गाड़ी से जा रहे थे। उसी दौरान गैंगस्टर छोटन शुक्ला के अंतिम संस्कार का जुलूस निकल रहा था, जिसमें तत्कालीन विधायक आनंद मोहन भी मौजूद थे।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, भीड़ ने जी. कृष्णैया की सरकारी गाड़ी को रोक लिया, उन्हें वाहन से बाहर निकाला और पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था, क्योंकि पहली बार किसी कार्यरत आईएएस अधिकारी की इस तरह सार्वजनिक रूप से हत्या हुई थी।
मौत की सजा से उम्रकैद तक
लंबी सुनवाई के बाद निचली अदालत ने 5 अक्टूबर 2007 को आनंद मोहन को मौत की सजा सुनाई।
बाद में 10 दिसंबर 2008 को पटना हाईकोर्ट ने इस सजा को उम्रकैद में बदल दिया। वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद कानूनी रूप से आनंद मोहन उम्रकैद की सजा काट रहे थे।
बिहार सरकार ने बदले जेल के नियम
इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ अप्रैल 2023 में आया।
बिहार सरकार ने जेल नियमावली में संशोधन करते हुए उस प्रावधान को हटा दिया, जिसके तहत ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारी की हत्या के दोषियों को समय से पहले रिहा नहीं किया जा सकता था।
सरकार ने इस संशोधन को पूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू किया। इसके बाद 24 अप्रैल 2023 को आनंद मोहन को सहरसा जेल से रिहा कर दिया गया। उनके साथ 26 अन्य कैदियों को भी रिहाई मिली।
रिहाई पर उठा विवाद
आनंद मोहन की रिहाई के बाद पूरे देश में इस फैसले को लेकर बहस शुरू हो गई।
आईएएस एसोसिएशन ने इस फैसले पर निराशा जताई। वहीं जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर रिहाई को चुनौती दी।
याचिका में कहा गया कि जब किसी व्यक्ति की मौत की सजा को उम्रकैद में बदला गया हो, तब केवल 14 वर्ष की सजा पूरी होने के आधार पर उसे रिहा नहीं किया जा सकता। उनका तर्क था कि ऐसे मामलों में कानून का उद्देश्य गंभीर अपराधों के प्रति कठोर संदेश देना होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
यह मामला पिछले तीन वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
हाल ही में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान कई अहम टिप्पणियां कीं।
अदालत ने कहा कि वह इस विचार से परेशान है कि ड्यूटी पर तैनात एक सरकारी अधिकारी की हत्या को “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” श्रेणी में नहीं माना गया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि आनंद मोहन के खिलाफ लंबित कुछ अन्य मामलों की जानकारी पूरी तरह सामने नहीं रखी गई। इनमें एक मामला ऐसा भी बताया गया, जो कथित रूप से उनके जेल में रहने के दौरान दर्ज हुआ था।
हालांकि अदालत ने इस संबंध में अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
फैसला सुरक्षित
सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
अभी तक अदालत ने यह नहीं बताया है कि फैसला कब सुनाया जाएगा। इसलिए फिलहाल आनंद मोहन की कानूनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
क्या दोबारा जेल जा सकते हैं आनंद मोहन?
फिलहाल इसका स्पष्ट जवाब देना संभव नहीं है।
यदि सुप्रीम कोर्ट यह मानता है कि बिहार सरकार द्वारा 2023 में किया गया नियम संशोधन या उसके आधार पर दी गई रिहाई कानून के अनुरूप नहीं थी, तो अदालत रिहाई को रद्द कर सकती है। ऐसी स्थिति में आनंद मोहन को दोबारा जेल जाना पड़ सकता है।
वहीं यदि अदालत सरकार के फैसले और रिहाई को वैध मानती है, तो उनकी रिहाई बरकरार रहेगी।
अंतिम फैसला ही तय करेगा आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों से यह जरूर स्पष्ट हुआ है कि अदालत इस मामले के कानूनी पहलुओं की गंभीरता से जांच कर रही है। लेकिन केवल टिप्पणियों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
अब पूरे मामले में अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी। तब तक यह कहना कि आनंद मोहन निश्चित रूप से दोबारा जेल जाएंगे या नहीं, केवल अटकल होगी। फिलहाल सभी की नजरें सर्वोच्च अदालत के अंतिम निर्णय पर टिकी हुई हैं।