कच्चा तेल 56% सस्ता, फिर भी पेट्रोल-डीजल महंगा! आखिर जनता को राहत कब?

BiharNewsAuthor
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BNT Desk: भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सवाल यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में बड़ी गिरावट आ चुकी है, तो इसका फायदा आम लोगों को क्यों नहीं मिल रहा? अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान क्रूड ऑयल की कीमत करीब 157 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की बात कही जा रही थी। अब यह घटकर करीब 68.69 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई है। यानी कीमतों में लगभग 56% की गिरावट आई है। इसके बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में उसी अनुपात में कमी नहीं आई है।

 

तेल कंपनियों का क्या कहना है?

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, मौजूदा कीमतों पर सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर अच्छा मार्जिन मिल रहा है।

तेल कंपनियों का कहना है कि:

  • पहले जब कच्चा तेल महंगा था, तब उन्हें नुकसान उठाना पड़ा था।
  • उस नुकसान की भरपाई अभी की जा रही है।
  • भविष्य में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए वित्तीय मजबूती भी जरूरी है।

 

विशेषज्ञों की क्या राय है?

कई ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक कच्चे तेल की कीमतें कम रहने पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत देने की गुंजाइश बनती है। हालांकि, खुदरा ईंधन कीमतें केवल क्रूड ऑयल पर निर्भर नहीं करतीं।

इन पर कई अन्य कारक भी असर डालते हैं, जैसे:

  • केंद्र और राज्यों के कर (Excise Duty और VAT)
  • रुपये और डॉलर की विनिमय दर
  • रिफाइनिंग और परिवहन लागत
  • मार्केटिंग लागत
  • तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति

 

क्या कीमतें तुरंत घटनी चाहिए?

जरूरी नहीं। भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कई आर्थिक और नीतिगत कारकों को ध्यान में रखकर तय की जाती हैं। इसलिए केवल क्रूड ऑयल सस्ता होने से खुदरा कीमतें उसी अनुपात में कम हों, यह निश्चित नहीं होता। हालांकि, यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम बनी रहती हैं और अन्य लागतों में बड़ा बदलाव नहीं होता, तो ईंधन की कीमतों में राहत देने की संभावना बढ़ सकती है।

 

सबसे बड़ा सवाल

आम उपभोक्ताओं के मन में फिलहाल यही सवाल है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद उन्हें पेट्रोल और डीजल पर राहत कब मिलेगी। इसका जवाब आने वाले समय में तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति और सरकार के कर संबंधी फैसलों पर निर्भर करेगा।

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