बिहार की सियासत का नया अध्याय: ‘शपथ’ से ‘समर्पण’ तक सम्राट चौधरी का सफर

BiharNewsAuthor
5 Min Read

BNT Desk: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी पटकथा लिखी जा रही है, जिसकी चर्चा सार्वजनिक कम और संकेतों में ज्यादा हो रही है। जिस नेता ने कभी कसम खाई थी कि वह नीतीश कुमार को सत्ता से हटाकर ही अपने सिर की पगड़ी उतारेंगे, आज वही नेता नीतीश कुमार के दाहिने हाथ के रूप में देखे जा रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर यह हृदय परिवर्तन कैसे हुआ और इसके पीछे की असली बिसात क्या है?

आनंद मोहन का बयान और राजनीतिक संकेत

हाल ही में पूर्व सांसद आनंद मोहन ने एक ऐसा बयान दिया जिसने सियासी गलियारों में सुगबुगाहट तेज कर दी। उन्होंने कहा कि यदि भाजपा को बिहार में मुख्यमंत्री बनाना है, तो सम्राट चौधरी सबसे बेहतर विकल्प हैं। आनंद मोहन का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी नजदीकियां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जगजाहिर हैं। जब नीतीश के करीबी माने जाने वाले लोग सम्राट के नाम की पैरवी करने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि संकेत गहरे हैं।

‘मुरेठा’ की कसम और बदलती रणनीति

फ्लैशबैक में जाएं तो साल 2022-23 में सम्राट चौधरी भाजपा के सबसे आक्रामक चेहरे थे। अपनी मां के निधन के बाद उन्होंने सिर पर साफा (मुरेठा) बांधा और संकल्प लिया कि जब तक नीतीश कुमार को गद्दी से नहीं उतारेंगे, यह पगड़ी नहीं खोलेंगे। वह समय महागठबंधन की सरकार का था।

लेकिन नवंबर 2023 के आते-आते हवा का रुख बदलने लगा। सम्राट के तेवर नरम होने लगे और उन्होंने कहना शुरू किया कि “पार्टी का आदेश सर्वोपरि है।” जनवरी 2024 में जब नीतीश कुमार वापस एनडीए में आए, तो सम्राट चौधरी ने न केवल उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली, बल्कि तालमेल की एक नई परिभाषा गढ़ी।

 टकराव की जगह तालमेल: अयोध्या यात्रा का संदेश

जुलाई 2024 में सम्राट चौधरी अयोध्या गए और वहां सिर मुंडवाकर अपने ‘मुरेठा’ का विसर्जन कर दिया। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं थी, बल्कि नीतीश कुमार के प्रति आक्रामकता के अंत का सार्वजनिक ऐलान था। इसके बाद से सम्राट ने खुद को एक ऐसे सहयोगी के रूप में ढाला जो मुख्यमंत्री के सम्मान का पूरा ख्याल रखता है। सार्वजनिक मंचों पर वह नीतीश कुमार की तारीफ करते नहीं थकते और खुद को हमेशा उनके नेतृत्व के पीछे खड़ा दिखाते हैं।

 लव-कुश समीकरण और पारिवारिक विरासत

इस बदलाव के पीछे ठोस सामाजिक गणित भी है। बिहार में ‘लव-कुश’ (कुर्मी और कुशवाहा) समीकरण नीतीश कुमार की ताकत रहा है। नीतीश कुर्मी समुदाय से हैं और सम्राट कुशवाहा समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके अलावा, सम्राट के पिता शकुनी चौधरी और नीतीश कुमार के बीच दशकों पुराना राजनैतिक संबंध रहा है। नीतीश कुमार ने भी हाल ही में सम्राट को भविष्य में “ऊंचाइयों तक जाने” का आशीर्वाद देकर इस उत्तराधिकार की चर्चा को बल दिया है।

गृह विभाग और भाजपा का भविष्य

2025 में एनडीए सरकार बनने के बाद एक अभूतपूर्व बदलाव हुआ—बिहार का गृह विभाग पहली बार भाजपा के पास आया और इसकी जिम्मेदारी सम्राट चौधरी को मिली। गृह मंत्रालय का मुख्यमंत्री के बजाय उपमुख्यमंत्री के पास होना यह संकेत था कि भाजपा अब राज्य के शासन पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। हालांकि, सम्राट ने बड़ी चतुराई से विधानसभा में यह बयान दिया कि “अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री का ही होता है,” जिससे नीतीश कुमार की गरिमा भी बनी रही और भाजपा का एजेंडा भी आगे बढ़ा।

क्या सम्राट ही होंगे अगले मुख्यमंत्री?

फिलहाल बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार मार्गदर्शक और संरक्षक की भूमिका में आ रहे हैं (विशेषकर उनके राज्यसभा जाने की चर्चाओं के बीच)। सम्राट चौधरी ने पिछले दो वर्षों में अपने व्यवहार को जिस तरह से ‘विद्रोही’ से ‘विनम्र’ बनाया है, वह उन्हें एक सर्वमान्य उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करता है। भाजपा अपने इस ओबीसी चेहरे के जरिए बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने का सपना देख रही है, और नीतीश कुमार भी शायद एक ऐसे चेहरे को कमान सौंपना चाहते हैं जो उनकी विरासत और लव-कुश वोट बैंक को सुरक्षित रख सके।

Share This Article