BNT Desk: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है—”सम्राट चौधरी आखिर कितना पढ़े हैं?” यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि वह राज्य के उपमुख्यमंत्री हैं और भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे माने जा रहे हैं। जब पत्रकार ने उनकी शिक्षा पर सवाल किया, तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से कहा था— “मेरा एफिडेविट (Affidavit) देख लो।” हमने वही किया, और जो सच सामने आया, वह न केवल चौंकाने वाला है बल्कि कई गंभीर सवाल भी खड़े करता है।
चुनावी हलफनामा: शैक्षणिक योग्यता का खाली पन्ना?
चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध सम्राट चौधरी का 2025 बिहार विधानसभा चुनाव (तारापुर सीट) का हलफनामा खंगालने पर Section 10 में एक अजीब स्थिति देखने को मिलती है। जहाँ उम्मीदवार को अपनी पूरी पढ़ाई का विवरण देना होता है, वहां सम्राट चौधरी ने केवल एक पंक्ति लिखी है:
“Doctor of Litt (Honorary), PFC Kamraj University”
हैरानी की बात यह है कि पूरे कॉलम में न तो 10वीं का जिक्र है, न 12वीं का, और न ही किसी मान्यता प्राप्त कॉलेज से ग्रेजुएशन या पोस्ट-ग्रेजुएशन की जानकारी दी गई है।
क्या होती है ‘Honorary’ (मानद) डिग्री?
सम्राट चौधरी ने जिस डिग्री का उल्लेख किया है, उसके साथ ‘Honorary’ शब्द जुड़ा है। इसे समझना जनता के लिए बहुत जरूरी है:
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बिना परीक्षा की डिग्री: मानद उपाधि वह सम्मान है जो किसी विश्वविद्यालय द्वारा किसी व्यक्ति को उसके सामाजिक कार्यों या प्रभाव के लिए दिया जाता है।
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कोई शैक्षणिक मूल्य नहीं: इसके लिए न कोई क्लास अटेंड करनी होती है, न कोई परीक्षा देनी होती है और न ही कोई थीसिस लिखनी होती है।
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असली बनाम सम्मान: एक असली D.Litt. की डिग्री वर्षों की पढ़ाई और रिसर्च के बाद मिलती है, लेकिन ‘मानद’ डिग्री सिर्फ एक ‘सम्मान पत्र’ की तरह है, जिसे शैक्षणिक योग्यता नहीं माना जा सकता।
नीतीश मिश्रा बनाम सम्राट चौधरी
पारदर्शिता को समझने के लिए हमने भाजपा के ही दूसरे नेता नीतीश मिश्रा (झंझारपुर) का हलफनामा देखा। उनकी जानकारी स्पष्ट और क्रमानुसार थी:
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10वीं और 12वीं: सेंट माइकल हाई स्कूल, पटना (CBSE)।
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BA Honours: जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय। यहाँ साल, संस्थान और डिग्री—तीनों का स्पष्ट उल्लेख है। सम्राट चौधरी के हलफनामे में यह पूरी स्पष्टता गायब है।
प्रशांत किशोर का दावा और कानूनी पक्ष
जन सुराज के प्रशांत किशोर सार्वजनिक रूप से दावा कर चुके हैं कि सम्राट चौधरी 10वीं पास भी नहीं हैं। कानूनन, भारत में चुनाव लड़ने के लिए पढ़ा-लिखा होना अनिवार्य नहीं है; एक अनपढ़ व्यक्ति भी मुख्यमंत्री बन सकता है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट (2002 ADR केस) के अनुसार, मतदाताओं को अपने उम्मीदवार की शिक्षा के बारे में सही और पूरी जानकारी पाने का संवैधानिक अधिकार है। यदि कोई जानकारी छिपाई जाती है या भ्रामक दी जाती है, तो यह जनता के भरोसे के साथ खिलवाड़ है।
बिहार की जनता के सामने बड़े सवाल
जब कोई व्यक्ति राज्य के सर्वोच्च पद (मुख्यमंत्री) का दावेदार हो, तो उसकी पृष्ठभूमि पारदर्शी होनी चाहिए। इस रिपोर्ट से दो ही बातें निकलकर सामने आती हैं:
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पहली: सम्राट चौधरी के पास कोई औपचारिक स्कूली या कॉलेज की डिग्री नहीं है।
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दूसरी: उन्होंने जानबूझकर अपने हलफनामे में अधूरी जानकारी दी है।
दोनों ही स्थितियां राजनीतिक और नैतिक रूप से गंभीर हैं। बिहार की जनता, जो अपने बच्चों की शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही है, वह यह जानने का हक रखती है कि उनका होने वाला नेतृत्व खुद कितना शिक्षित है।
मुख्यमंत्री पद की दावेदारी और पारदर्शिता
जब कोई नेता 13 करोड़ की आबादी वाले राज्य का मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहा हो, तो उसकी हर बुनियादी जानकारी पारदर्शी होनी चाहिए। बिहार के युवा, जो दिन-रात पढ़ाई और परीक्षाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, क्या वे यह जानने का हक नहीं रखते कि उनका होने वाला नेतृत्व खुद कितना शिक्षित है?