छपरा के नयागांव में टाउनशिप के नाम पर ठगी? कागजी शहर बेच रहे डेवलपर्स

Parambir Singh
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पटना से गंगा पार, सारण जिले के नयागांव की तरफ जाते हुए सड़क के किनारे बड़े-बड़े गेट दिखाई देते हैं, “ग्रीन सिटी”, “मेगा टाउनशिप”, “फ्यूचर स्मार्ट सिटी”। कुछ जगहों पर लोहे के गेट लगे हैं, कहीं रंगीन बोर्ड, और कहीं सिर्फ बांस के खंभों से घेरा गया प्लॉट। पहली नजर में यह इलाका एक उभरते रियल एस्टेट हब जैसा लगता है।

लेकिन जब इन परियोजनाओं की तह तक जाया जाए, जमीन पर भी और कागज़ों में भी तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखती है।

इस इलाके में जमीन की मांग अचानक क्यों बढ़ी, इसका जवाब स्थानीय लोग सीधे देते हैं—“एयरपोर्ट।” साथ ही बिहार की राजधानी पटना के बगल में होना।  दलालों और डेवलपर्स ने इसे मौके की तरह लिया और नयागांव के खेतों को “टाउनशिप” में बदलने का दावा शुरू हो गया। सोनपुर में प्रस्तावित एयरपोर्ट की घोषणा के बाद से यहां जमीन खरीदने की होड़ मच गई।

लेकिन जांच में सामने आया कि इस ‘टाउनशिप’ मॉडल की बुनियाद ही कमजोर है।

एयरपोर्ट की घोषणा और जमीन का उछाल

नयागांव पहले एक साधारण ग्रामीण इलाका था, जहां खेती मुख्य पेशा था। लेकिन जैसे ही एयरपोर्ट की खबर आई, जमीन की कीमतों में तेजी से उछाल आया। स्थानीय स्तर पर छोटे-बड़े डेवलपर्स सक्रिय हुए और उन्होंने जमीन को छोटे-छोटे प्लॉट में काटकर बेचना शुरू किया।

खरीदारों को बताया गया कि आज जो खेत दिख रहा है, वह कुछ सालों में शहर का हिस्सा बन जाएगा। सड़कें होंगी, पार्क होंगे, ड्रेनेज सिस्टम होगा। लेकिन इन दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर है।

एक खरीदार की कहानी: रजिस्ट्री हुई, जमीन नहीं मिली

2021 में एक व्यक्ति ने नयागांव के एक प्रोजेक्ट शीतल ग्रीन सिटी में 1200 वर्गफीट का प्लॉट खरीदा। उन्होंने पूरी रकम चुकाई और रजिस्ट्री भी कराई। कागज़ों में सब कुछ सही दिखता था।

लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि जमीन कंपनी के नाम पर नहीं, बल्कि कंपनी के एक कर्मचारी के नाम पर थी। चार साल बाद भी उनकी जमीन पर सिर्फ बाउंड्री बनी है। सड़क नहीं बनी, मिट्टी भराई नहीं हुई और बारिश में वहां पानी भर जाता है। खरीद के समय उन्हें बताया गया था कि चार साल में पूरा डेवलपमेंट हो जाएगा। लेकिन 2026 तक वह जमीन अब भी खेत जैसी ही है।

कागज़ों में प्रोजेक्ट, जमीन पर खेत

RERA के दस्तावेज़ इस कहानी को और स्पष्ट करते हैं। शीतल ग्रीन सिटी का प्रोजेक्ट 2017 में शुरू हुआ और इसे जनवरी 2022 तक पूरा होना था । लेकिन तय समय सीमा गुजर जाने के बाद भी प्रोजेक्ट अधूरा है।

दस्तावेज़ बताते हैं कि जमीन अलग-अलग स्थानीय लोगों से रजिस्ट्री के जरिए ली गई थी, यानी डेवलपर के पास एकमुश्त स्वामित्व नहीं था। विकास का जिम्मा “सेल्फ डेवलपमेंट” के रूप में दिखाया गया, जिसका अर्थ है कि सड़क, पानी और अन्य सुविधाएं डेवलपर खुद विकसित करेगा। लेकिन जमीन पर इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता।

दूसरा प्रोजेक्ट, वही कहानी

नयागांव का एक और बड़ा नाम “द साई ग्रीन” भी इसी पैटर्न का अनुसरण करता दिखता है। इस प्रोजेक्ट को दिसंबर 2023 तक पूरा होना था। लेकिन RERA के रिकॉर्ड में कई जरूरी दस्तावेज अनुपलब्ध हैं। यहां तक कि इस प्रोजेक्ट के खिलाफ शिकायत भी दर्ज की जा चुकी है। ग्राउंड पर देखने पर यहां भी बड़े पैमाने पर अधूरा विकास और खाली प्लॉट नजर आते हैं।

छोटे प्रोजेक्ट, बड़े दावे

कुछ प्रोजेक्ट इतने छोटे हैं कि उन्हें “टाउनशिप” कहना ही मुश्किल है। उदाहरण के तौर पर, एक प्रोजेक्ट में कुल 2032 वर्गमीटर जमीन को सिर्फ नौ प्लॉट में बांटा गया है । इसके विकास के लिए अनुमानित लागत मात्र एक लाख रुपये दिखाई गई है। इतनी कम राशि में सड़क, ड्रेनेज, बिजली और अन्य बुनियादी ढांचा तैयार होना व्यावहारिक नहीं लगता।

RERA की वेबसाइट पर उपलब्ध तस्वीरें भी यही दिखाती हैं- खेत, जिनमें केवल प्लॉट की सीमाएं चिन्हित की गई हैं।

कई प्रोजेक्ट, एक जैसी कमियां

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कुछ प्रोजेक्ट RERA में दर्ज ही नहीं हैं, जबकि कुछ रजिस्टर होने के बावजूद अधूरे हैं। जो प्रोजेक्ट रजिस्टर हैं, उनके दस्तावेजों में कई समानताएं दिखती हैं। लेआउट प्लान उपलब्ध नहीं, एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट लंबित, और विकास का जिम्मा “सेल्फ डेवलपमेंट” के नाम पर छोड़ दिया गया। लवण्या टाउन और आद्या ग्रेट सिटी जैसे प्रोजेक्ट्स में भी यही स्थिति दिखाई देती है—कागज़ों में योजनाएं, जमीन पर अधूरा काम । शौर्य विहार जैसे प्रोजेक्ट में विकास पर खर्च जमीन की कीमत के मुकाबले बहुत कम दिखाया गया है ।

‘टाउनशिप’ या सिर्फ प्लॉटिंग?

इन सभी उदाहरणों को जोड़ने पर जो तस्वीर बनती है, वह एक व्यवस्थित मॉडल की ओर इशारा करती है। खेत की जमीन को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा जाता है। फिर उसे “टाउनशिप” या “ग्रीन सिटी” जैसे नाम देकर बेचा जाता है। खरीदारों को भविष्य के विकास का भरोसा दिया जाता है। लेकिन वास्तविक विकास या तो बहुत धीमा है या लगभग नहीं के बराबर है।

नियामक की भूमिका पर सवाल

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल नियामक संस्था RERA की भूमिका पर उठता है। जब कई प्रोजेक्ट बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं, और जो रजिस्टर्ड हैं वे भी तय समय पर पूरे नहीं हो रहे, तो निगरानी और कार्रवाई की स्थिति क्या है? जमीन पर कहीं भी ऐसे चेतावनी बोर्ड नहीं दिखते जो खरीदारों को जोखिम के बारे में आगाह करें। बिक्री भी जारी है और प्रचार भी।

जोखिम किसका है?

इस पूरे मॉडल में सबसे ज्यादा जोखिम उन लोगों का है जो अपनी जीवन भर की बचत लगाकर जमीन खरीदते हैं। वे शहर के विस्तार का हिस्सा बनने का सपना देखते हैं, लेकिन बदले में उन्हें अधूरा प्लॉट मिलता है—बिना सड़क, बिना पानी और बिना किसी गारंटी के।

नयागांव में जमीन का यह उभार सिर्फ रियल एस्टेट विकास की कहानी नहीं है। यह उस अंतर की कहानी है जो वादों और हकीकत के बीच मौजूद है। एयरपोर्ट की संभावना ने इस इलाके को निवेश का केंद्र जरूर बना दिया है, लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि यहां का विकास असमान, असंगठित और कई मामलों में संदिग्ध है।

खरीदारों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे सिर्फ लोकेशन या भविष्य के वादों पर भरोसा न करें, बल्कि कागज़ों और जमीन दोनों की सच्चाई को परखें। क्योंकि नयागांव में फिलहाल जो बिक रहा है, वह सिर्फ जमीन नहीं—बल्कि एक ऐसा सपना है, जिसकी हकीकत अभी अधूरी है।

परमबीर सिंह | नयागांव (सारण) से विशेष रिपोर्ट

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