दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर टला संकट! भाजपा MLC के इस्तीफे से विधान परिषद जाने का रास्ता साफ

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BNT Desk: बिहार की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर मंडरा रहा संवैधानिक संकट फिलहाल टलता नजर आ रहा है। भाजपा के विधान परिषद सदस्य (MLC) देवेश कुमार के इस्तीफे के बाद दीपक प्रकाश के विधान परिषद पहुंचने का रास्ता लगभग साफ हो गया है। माना जा रहा है कि इस कदम से उनके मंत्री पद को तत्काल राहत मिल सकती है।

सूत्रों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में दीपक प्रकाश के गैर-विधायक रहते मंत्री बने रहने को लेकर उठे सवालों के बाद भाजपा नेतृत्व सक्रिय हुआ। बताया जा रहा है कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर देवेश कुमार ने अपनी विधान परिषद सदस्यता से इस्तीफा दिया है। अब उनकी खाली हुई सीट पर दीपक प्रकाश को भेजने की तैयारी की जा रही है, ताकि संवैधानिक विवाद का समाधान किया जा सके।

 

सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है मामला

दीपक प्रकाश के मंत्री पद को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 164(4) का हवाला देते हुए याचिका दायर की है।

याचिका में कहा गया है कि किसी गैर-विधायक को एक ही विधानसभा कार्यकाल के दौरान केवल सरकार बदलने के आधार पर दोबारा छह महीने तक मंत्री बने रहने की संवैधानिक छूट नहीं मिल सकती।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने बिहार सरकार से सवाल किया कि कोई व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है। इस मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को होनी है।

 

उपेंद्र कुशवाहा पहले ही कर चुके थे बड़ा दावा

विधानसभा चुनाव 2025 में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के चार विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। इनमें उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा भी शामिल हैं।

चुनाव के बाद भाजपा में RLM के विलय की चर्चाएं भी सामने आई थीं, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा ने इन अटकलों को खारिज कर दिया था। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि उनके बेटे दीपक प्रकाश कुछ महीनों के लिए नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल तक मंत्री रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि यह फैसला केवल उनकी पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे NDA का निर्णय है।

 

भाजपा की रणनीति के पीछे राजनीतिक संदेश

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का यह कदम केवल कानूनी विवाद को सुलझाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति और सामाजिक समीकरण भी जुड़े हुए हैं।

बिहार में कुशवाहा (कोइरी) समुदाय कई विधानसभा और लोकसभा सीटों पर प्रभावशाली माना जाता है। ऐसे में भाजपा किसी भी कीमत पर उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी को NDA में मजबूत बनाए रखना चाहती है।

विश्लेषकों का कहना है कि पहले उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा गया और अब उनके बेटे दीपक प्रकाश के मंत्री पद को बचाने के लिए विधान परिषद का रास्ता तैयार किया जा रहा है। इसे NDA की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

 

राहत फिलहाल अस्थायी

हालांकि, दीपक प्रकाश को मिलने वाली यह राहत स्थायी नहीं मानी जा रही है। यदि वे विधान परिषद के सदस्य बनते हैं, तो उनका कार्यकाल केवल मार्च 2027 तक ही रहेगा। इसकी वजह यह है कि जिस सीट पर उन्हें भेजे जाने की चर्चा है, वह देवेश कुमार के शेष कार्यकाल के लिए ही होगी।

ऐसे में करीब आठ महीने बाद उन्हें दोबारा विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनने की व्यवस्था करनी होगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो उनके मंत्री पद पर एक बार फिर संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है।

 

4 अगस्त की सुनवाई पर टिकी नजर

फिलहाल बिहार की राजनीति की नजरें सुप्रीम कोर्ट में 4 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। यदि इस बीच दीपक प्रकाश के विधान परिषद जाने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो सरकार को अदालत में राहत मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि यह मामला सिर्फ एक मंत्री के पद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संवैधानिक प्रावधान, NDA की राजनीतिक रणनीति, सहयोगी दलों के साथ तालमेल और बिहार के जातीय समीकरण भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। आने वाले दिनों में अदालत का फैसला और राजनीतिक घटनाक्रम इस मामले की दिशा तय करेंगे।

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