BNT Desk: बिहार के लाखों सरकारी शिक्षकों के लिए तबादले की राह देख रहे आँखों का इंतज़ार और लंबा हो गया है। शिक्षकों के ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर शिक्षा विभाग के भीतर चल रही कशमकश के कारण फिलहाल पूरी प्रक्रिया पर असमंजस के बादल छाए हुए हैं। शिक्षा विभाग अब पुरानी गलतियों को सुधारने के लिए एक ‘नई ट्रांसफर पॉलिसी’ पर काम कर रहा है, जिसके लागू होने तक शिक्षकों को अपनी वर्तमान जगह पर ही डटे रहना होगा।
क्यों अटकी है ट्रांसफर प्रक्रिया?
शिक्षकों के तबादले में देरी का सबसे बड़ा कारण वर्तमान व्यवस्था में मौजूद गंभीर खामियाँ हैं। विभाग के आंतरिक सर्वे में यह बात सामने आई है कि पिछली नियुक्तियों और तबादलों के कारण स्कूलों में ‘विषयवार संतुलन’ पूरी तरह बिगड़ गया है। कई स्कूलों में शिक्षकों की संख्या तो पर्याप्त है, लेकिन विषयों के तालमेल में भारी अंतर है। इसी विसंगति को दूर करने के लिए विभाग अब जल्दबाजी के मूड में नहीं है।
विषयवार असंतुलन
सूत्रों के अनुसार, राज्य के कई माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में स्थिति काफी अजीबोगरीब है।
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अति-तैनाती: कुछ स्कूलों में जहाँ एक विषय के लिए केवल 2 पद स्वीकृत हैं, वहाँ 4-4 शिक्षक कार्यरत हैं।
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शिक्षकों का टोटा: दूसरी ओर, कई महत्वपूर्ण विषयों (जैसे विज्ञान और गणित) के लिए दूर-दराज के स्कूलों में एक भी विशेषज्ञ शिक्षक उपलब्ध नहीं है। इस ‘मिस-मैनेजमेंट’ के कारण छात्रों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ रहा है, जिसे दुरुस्त करना शिक्षा विभाग की पहली प्राथमिकता बन गई है।
24 अप्रैल की बैठक और ‘पारदर्शिता’ का निर्देश
स्थानांतरण प्रणाली को व्यवस्थित करने के लिए 24 अप्रैल को शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। इस बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि आगामी ट्रांसफर-पोस्टिंग व्यवस्था पूरी तरह से पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। सरकार की कोशिश है कि तबादलों में ‘पैरवी’ के बजाय ‘ज़रूरत’ और ‘योग्यता’ को आधार बनाया जाए, ताकि स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो सके।
मंत्रिमंडल विस्तार का इंतज़ार
बिहार की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों और आगामी 7 मई को होने वाले सम्राट चौधरी कैबिनेट के विस्तार का असर भी इस नीति पर दिख रहा है। माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल विस्तार के बाद जब नए शिक्षा मंत्री या वर्तमान व्यवस्था को पूर्ण शक्ति मिलेगी, तभी नई नीति पर अंतिम मुहर लगेगी। सरकार चाहती है कि नीति लागू करने से पहले सभी राजनीतिक और प्रशासनिक पहलुओं को सुलझा लिया जाए।
शिक्षक संघों से लिए जाएंगे सुझाव
शिक्षा विभाग इस बार किसी भी विवाद से बचने के लिए ‘समावेशी दृष्टिकोण’ अपना रहा है। नई ट्रांसफर पॉलिसी को अंतिम रूप देने से पहले शिक्षक संघों और अन्य हितधारकों (Stakeholders) के साथ चर्चा की जाएगी। उनके सुझावों को नीति में शामिल किया जाएगा ताकि शिक्षकों की वाजिब समस्याओं (जैसे स्वास्थ्य कारण या पति-पत्नी का एक जिले में होना) का समाधान हो सके।
फिलहाल अस्थायी रोक, शिक्षकों में असमंजस
विभाग ने फिलहाल सभी प्रकार के तबादलों पर अस्थायी रोक लगा दी है। इससे उन शिक्षकों में बेचैनी है जो सालों से अपने गृह जिले या किसी विशेष स्थान पर जाने की उम्मीद लगाए बैठे थे। विशेषकर महिला और दिव्यांग शिक्षकों के लिए यह इंतज़ार काफी कठिन साबित हो रहा है।
सुधार की ओर बढ़ता विभाग
देरी भले ही हो रही है, लेकिन शिक्षा विभाग का तर्क है कि एक गलत नीति से बेहतर है कि थोड़ा इंतज़ार करके एक सटीक और संतुलित नीति लाई जाए। यदि नई नीति विषयवार शिक्षकों की कमी को दूर करने में सफल रहती है, तो यह बिहार की स्कूली शिक्षा के लिए एक ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हो सकती है। फिलहाल, 5 लाख से अधिक शिक्षकों की नजरें विभाग के अगले आदेश पर टिकी हैं।