BNT Desk: बिहार के लोगों, सावधान हो जाइए! अब अपनी गाड़ी की चाबी घुमाने से पहले अपना बटुआ और फास्टैग का बैलेंस जरूर चेक कर लें। अब तक आप जिन स्टेट हाईवे (SH) पर बिना किसी रोक-टोक के फर्राटे भरते थे, सरकार वहां बहुत जल्द ‘टोल का नाका’ लगाने जा रही है। बिहार की सम्राट चौधरी सरकार एक ऐसी नीति ला रही है, जिसके बाद नेशनल हाईवे की तरह राज्य की सड़कों पर भी आपकी यात्रा अब ‘पेड’ (Paid) हो जाएगी। सवाल यह है कि क्या यह बेहतर सड़कों के लिए उठाया गया कदम है या फिर पहले से ही महंगाई की मार झेल रही जनता पर एक और ‘टैक्स बम’?
क्या है सरकार की नई टोल पॉलिसी?
मिली जानकारी के अनुसार, बिहार सरकार की नई टोल पॉलिसी अब अपने अंतिम चरण में है। इस नीति के मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार हैं:
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चुनिंदा सड़कों पर टैक्स: शुरुआत में बिहार के प्रमुख स्टेट हाईवे और भविष्य में बनने वाले एक्सप्रेस-वे पर टोल वसूला जाएगा।
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FASTag की अनिवार्यता: टोल का भुगतान पूरी तरह डिजिटल यानी फास्टैग के जरिए होगा।
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जुर्माने का प्रावधान: अगर आपकी गाड़ी में फास्टैग नहीं है या बैलेंस कम है, तो आपसे सवा गुना से लेकर दोगुना तक जुर्माना वसूला जाएगा।
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दोपहिया वाहनों को राहत: फिलहाल सरकार ने दोपहिया वाहनों को इस टोल से मुक्त रखने का ‘लॉलीपॉप’ दिया है।
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स्थानीय लोगों को छूट: टोल नाकों के 20 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों के लिए सस्ती दरों पर मंथली पास की सुविधा का प्रस्ताव है।
महाराष्ट्र और एमपी मॉडल का अध्ययन
बिहार सरकार का तर्क है कि वह महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की तर्ज पर यह कदम उठा रही है।
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महाराष्ट्र: यहाँ PWD और MSRDC मिलकर दर्जनों स्टेट हाईवे पर टोल वसूलते हैं, जहाँ दरें काफी अधिक हैं।
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राजस्थान: यहाँ तो निजी वाहनों (Private Cars) से भी कई राज्य सड़कों पर कड़ाई से टोल लिया जाता है।
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उत्तर प्रदेश: यूपी में एक्सप्रेस-वे के जाल के साथ-साथ भारी-भरकम टोल का सिस्टम लागू है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बिहार की तुलना इन विकसित राज्यों से करना सही है? बिहार पहले से ही प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे निचले पायदानों पर है, ऐसे में यहाँ के लोगों पर नया वित्तीय बोझ डालना कितना जायज है?
रोड टैक्स दिया, सेस दिया… फिर टोल क्यों?
जनता के मन में उठने वाला सबसे जायज सवाल यही है। जब हम नई गाड़ी खरीदते समय लाखों रुपये का ‘वन टाइम रोड टैक्स’ देते हैं, पेट्रोल और डीजल पर भारी भरकम ‘सेस’ (Cess) चुकाते हैं, तो फिर अपनी ही सरकार की बनाई सड़कों पर चलने के लिए फिर से पैसा क्यों दें?
विकास का मतलब जनता को सुविधाएं देना होना चाहिए, न कि सुविधाओं के नाम पर उनकी जेब काटना। सरकार का दावा है कि टोल से जो पैसा आएगा, उससे सड़कों का रखरखाव (Maintenance) बेहतर होगा। पर क्या वाकई ऐसा होता है? या फिर यह सिर्फ ठेकेदारों और निजी कंपनियों को फायदा पहुँचाने की एक और ‘साजिश’ है?
हकीकत या दिखावा?
सरकार यह भी कह रही है कि अगर टोल प्लाजा पर 10 सेकंड से ज्यादा वेटिंग हुई या 100 मीटर से लंबी लाइन लगी, तो टोल फ्री कर दिया जाएगा। पर कड़वा सच तो यह है कि नेशनल हाईवे पर भी ऐसे नियम कागजों पर ही सिमटे रहते हैं। जमीन पर अक्सर लंबी लाइनें और तकनीकी खराबी के नाम पर घंटों इंतजार करना आम बात है।
सुशासन का मॉडल या वसूली का तंत्र?
बिहार जैसे राज्य में, जहाँ कनेक्टिविटी को अभी और मजबूत करने की जरूरत है, वहां टोल टैक्स का बोझ डालना जनता के साथ एक बड़ा मजाक लग रहा है। एक तरफ सरकार सुशासन और विकास का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ हर कदम पर टैक्स वसूली का नया रास्ता तलाश लेती है।
क्या आपको लगता है कि बिहार की राज्य सड़कों पर टोल शुरू होना चाहिए? क्या इससे सड़कें वाकई बेहतर होंगी या सिर्फ कुछ रसूखदारों की जेबें भरेंगी? अपनी राय जरूर जाहिर करें।