बिहार में साइबर फ्रॉड के बढ़ते मामले, 6 महीने में 888 केस और 72 गिरफ्तारियां; जानिए पुलिस कैसे पकड़ती है ठग

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BNT Desk: बिहार में साइबर फ्रॉड के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। साइबर ठगों के निशाने पर शहरों में रहने वाले लोगों के साथ-साथ अब ग्रामीण इलाकों के लोग भी आ रहे हैं। सरकारी योजना का लाभ दिलाने के नाम पर बैंक खाते खुलवाने से लेकर निवेश के नाम पर लाखों रुपये की ठगी तक के मामले सामने आए हैं। कई मामलों में पुलिस आरोपितों तक पहुंच रही है, जबकि कुछ मामलों में ठगी के पीछे मौजूद पूरे नेटवर्क तक पहुंचना चुनौती बना हुआ है। बिहार पुलिस साइबर अपराध की जांच में बैंक खातों, पैसों के ट्रांजेक्शन और दूसरी तकनीकी जानकारी का इस्तेमाल कर रही है। वहीं, पीड़ितों के पैसे को जल्द रोकने या वापस कराने की कोशिश भी जांच का एक अहम हिस्सा है।

 

6 महीने में 888 साइबर फ्रॉड केस, 72 गिरफ्तार

पिछले छह महीनों के उपलब्ध आंकड़ों को देखें तो मार्च से अगस्त के बीच साइबर फ्रॉड से जुड़े कुल 888 मामले दर्ज हुए। इसी अवधि में पुलिस ने 72 गिरफ्तारियां कीं। अलग-अलग महीनों में पीड़ितों को वापस कराई गई रकम में भी अंतर रहा।

मार्च में 132 केस दर्ज हुए और 7 गिरफ्तारियां हुईं। इस दौरान 5 लाख 70 हजार 853 रुपये रिफंड कराए गए।

अप्रैल में 168 केस सामने आए। पुलिस ने 6 लोगों को गिरफ्तार किया और 19 लाख 70 हजार 503 रुपये की रकम वापस कराई।

मई में 179 मामले दर्ज हुए, जो इन छह महीनों में सबसे अधिक मामलों वाले महीनों में शामिल रहा। इस महीने 5 गिरफ्तारियां हुईं और 19 लाख 84 हजार 112 रुपये की रिकवरी या रिफंड हुआ।

जून में 181 केस दर्ज हुए। 7 लोगों की गिरफ्तारी हुई और 9 लाख 54 हजार 857 रुपये वापस कराए गए।

जुलाई में 118 मामले सामने आए, लेकिन गिरफ्तारियों की संख्या बढ़कर 18 हो गई। इस दौरान 30 लाख 14 हजार 285 रुपये रिफंड हुए।

अगस्त में 110 केस दर्ज हुए। पुलिस ने 22 लोगों को गिरफ्तार किया और 7 लाख 90 हजार 48 रुपये की रकम वापस कराई।

इस तरह आंकड़ों से पता चलता है कि मामलों की संख्या हर महीने एक जैसी नहीं रही, जबकि गिरफ्तारियों और रिफंड की रकम में भी काफी अंतर रहा।

2024 से साइबर अपराध के आंकड़ों में बढ़ोतरी

बिहार में साइबर अपराध को लेकर उपलब्ध आंकड़ों में भी बढ़ोतरी दिखाई देती है। दी गई जानकारी के अनुसार, 2024 में साइबर क्राइम से जुड़े 68,931 मामले दर्ज हुए थे। 2025 में यह संख्या बढ़कर 1,17,812 हो गई। इसके बाद 2026 में भी साइबर अपराध से जुड़े मामलों की संख्या 1.14 लाख से अधिक बताई गई है। इन आंकड़ों से बिहार में साइबर अपराध के बढ़ते दायरे का अंदाजा लगाया जा सकता है। पटना, नवादा, नालंदा और शेखपुरा को साइबर अपराध से जुड़े हॉटस्पॉट जिलों में शामिल बताया गया है। हालांकि अलग-अलग स्रोतों में साइबर अपराध के आंकड़ों की श्रेणी और गणना की पद्धति अलग हो सकती है, इसलिए इन आंकड़ों को उसी संदर्भ में देखना जरूरी है।

 

गांवों में सरकारी योजना के नाम पर खुलवाए जा रहे बैंक खाते

साइबर अपराध का एक तरीका ग्रामीण इलाकों में भी सामने आया है। साइबर पुलिस के मुताबिक, लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का झांसा देकर बैंक खाते खुलवाए जाते हैं। बाद में इन खातों का इस्तेमाल साइबर अपराध में किया जाता है। पटना साइबर थाना की SHO संगीता कुमारी के अनुसार, जांच के दौरान एक गांव से जुड़े मामले में इस तरह की जानकारी सामने आई। एक महिला अलग-अलग सरकारी योजनाओं का नाम लेकर ग्रामीणों को बैंक खाते खुलवाने के लिए प्रेरित करती थी। कभी शौचालय निर्माण तो कभी अनाज उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं का नाम लिया जाता था। लोगों को लगता था कि सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए खाता खुलवाना जरूरी है। लेकिन जांच में पुलिस को पता चला कि इन बैंक खातों का इस्तेमाल साइबर फ्रॉड से जुड़े लेनदेन में किया जा रहा था। इस तरह किसी व्यक्ति का बैंक खाता सीधे उसके अपने पैसे की ठगी के लिए ही नहीं, बल्कि किसी दूसरे साइबर अपराध में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

 

निवेश के नाम पर लाखों रुपये की ठगी

साइबर पुलिस के अनुसार, इन्वेस्टमेंट फ्रॉड के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। इसमें लोगों को कम समय में बड़ी रकम कमाने का लालच दिया जाता है। ठग शुरुआत में पीड़ित से छोटी रकम निवेश करवाते हैं। कई बार शुरुआती स्तर पर उसे कुछ रिटर्न भी दिखाया जाता है, जिससे पीड़ित को योजना पर भरोसा हो जाता है। इसके बाद उससे ज्यादा रकम निवेश करने के लिए कहा जाता है। जैसे-जैसे भरोसा बढ़ता है, निवेश की रकम भी बढ़ती जाती है। पीड़ित को जब ठगी का एहसास होता है, तब तक वह अपनी शुरुआती रकम से कई गुना ज्यादा पैसा लगा चुका होता है। साइबर पुलिस लोगों को ऐसे ऑफर में निवेश करने से पहले उसकी पूरी जानकारी जांचने की सलाह देती है।

 

फर्जी SIM से ज्यादा बैंक खातों के ट्रांजेक्शन पर नजर

साइबर अपराध की जांच में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक अपराधियों की पहचान करना है। साइबर अपराध में इस्तेमाल होने वाले SIM कई बार फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लिए जाते हैं। इससे सीधे SIM के आधार पर आरोपित तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। ऐसे मामलों में पुलिस बैंक खातों और पैसों के ट्रांजेक्शन को फॉलो करती है। रकम किस खाते में गई, वहां से आगे कहां ट्रांसफर हुई और उससे जुड़े दूसरे खातों की जानकारी जुटाई जाती है। पुलिस के लिए पीड़ित को तत्काल राहत दिलाना भी महत्वपूर्ण है। यदि ठगी की रकम को समय रहते रोका जा सके तो उसे वापस कराने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए साइबर फ्रॉड होने के बाद शिकायत में देरी न करने की सलाह दी जाती है।

 

हर महीने 100 से 150 साइबर फ्रॉड की FIR

साइबर पुलिस अधिकारी के अनुसार, पटना साइबर थाना में हर महीने करीब 100 से 150 साइबर अपराध से जुड़ी FIR दर्ज हो रही हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि साइबर ठगी अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। ऑनलाइन बैंकिंग, UPI, सोशल मीडिया और डिजिटल निवेश के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर अपराध के तरीके भी बदल रहे हैं। पुलिस तकनीकी संसाधनों की मदद से इन मामलों की जांच कर रही है।

 

सोशल मीडिया पर फोटो और निजी जानकारी भी रखें सुरक्षित

साइबर अपराध सिर्फ पैसों की ठगी तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर फोटो और निजी जानकारी के गलत इस्तेमाल के मामले भी सामने आ सकते हैं। कई बार लोग अनजान लोगों की फ्रेंड रिक्वेस्ट या फॉलो रिक्वेस्ट स्वीकार कर लेते हैं। इसके बाद उनकी प्रोफाइल पर मौजूद फोटो और दूसरी जानकारी का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए सोशल मीडिया पर किसी अनजान व्यक्ति को जोड़ने से पहले उसकी प्रोफाइल की जांच करनी चाहिए। अपनी निजी तस्वीरें, मोबाइल नंबर, बैंकिंग जानकारी और अन्य संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक करने से भी बचना जरूरी है।

 

लालच से बचना साइबर ठगी रोकने का सबसे आसान तरीका

साइबर पुलिस लोगों को किसी भी ऐसे ऑफर से सावधान रहने की सलाह देती है जिसमें कम समय में असामान्य रूप से ज्यादा मुनाफे का दावा किया जाए। अगर कोई व्यक्ति 2 हजार रुपये निवेश करने पर 10 हजार रुपये मिलने का दावा करता है, तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इतना ज्यादा रिटर्न क्यों और कैसे दिया जा रहा है। बिना जांच किए पैसा भेजने के बजाय संबंधित कंपनी, ऐप, वेबसाइट या व्यक्ति की वास्तविकता जांचनी चाहिए। किसी अनजान लिंक पर क्लिक करने, OTP साझा करने या बैंक संबंधी जानकारी देने से भी बचना चाहिए। साइबर ठगी की स्थिति में जितनी जल्दी पुलिस या संबंधित साइबर हेल्पलाइन को सूचना दी जाए, उतना ही बेहतर रहता है।

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