Success Story: हाफ पैंट पहनने पर सुनने पड़े ताने, रग्बी में जीते मेडल तो बनीं बिहार पुलिस में सब-इंस्पेक्टर

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Success Story: Faced taunts for wearing shorts, but winning a rugby medal paved the way to becoming a Sub-Inspector in the Bihar Police.

BNT Desk : बिहार के मुजफ्फरपुर की सपना कुमारी ने साबित कर दिया कि अगर हौसले मजबूत हों, तो सामाजिक बंदिशें और संसाधनों की कमी भी रास्ता नहीं रोक सकती। कभी रग्बी खेलने और हाफ पैंट पहनने पर ताने सुनने वाली सपना आज पुलिस की वर्दी पहनकर अपनी पहचान बना चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रग्बी खेल चुकी सपना का चयन सब-इंस्पेक्टर के पद पर हुआ है। उनकी कहानी उन लड़कियों के लिए प्रेरणा है, जो खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं, लेकिन सामाजिक सोच और आर्थिक परेशानियों के कारण अपने सपनों को पूरा नहीं कर पातीं।

गांव की छोटी-सी जगह से शुरू हुआ रग्बी का सफर

मुजफ्फरपुर की रहने वाली सपना कुमारी के लिए रग्बी का सफर आसान नहीं था। शुरुआत में उनके पास अभ्यास के लिए न तो बेहतर मैदान था और न ही पर्याप्त सुविधाएं। वह ब्लॉक में मौजूद एक छोटी-सी खाली जगह पर प्रैक्टिस करती थीं। इसके बावजूद खेल के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ।धीरे-धीरे सपना ने अपने खेल को बेहतर बनाया और पेशेवर स्तर पर खेलने की तैयारी शुरू कर दी। सीमित संसाधनों के बीच लगातार मेहनत करते हुए उन्होंने खेल की दुनिया में अपनी जगह बनाने की कोशिश जारी रखी।

हाफ पैंट पहनने पर लोग मारते थे ताने

सपना को खेल के दौरान सामाजिक रूढ़ियों का भी सामना करना पड़ा। रग्बी में अभ्यास और मुकाबलों के लिए खेल के अनुकूल पोशाक पहनना जरूरी होता है। लेकिन गांव में कुछ लोगों को उनका इस तरह कपड़े पहनना पसंद नहीं था।सपना के मुताबिक, कुछ बुजुर्ग महिलाएं उन्हें ताने देती थीं। वे कहती थीं कि इतनी बड़ी लड़की होकर ऐसे कपड़े पहनती है और ऐसा खेल खेलती है, जिसमें चोट लगने का खतरा रहता है। चोट लग गई तो शादी कौन करेगा?ऐसी बातें किसी के भी हौसले को कमजोर कर सकती हैं, लेकिन सपना ने लोगों की टिप्पणियों को अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया। उन्होंने खेल पर ध्यान बनाए रखा और मेहनत जारी रखी।

मां ने दिया साथ, तो मजबूत हुआ हौसला

सपना के सफर में उनकी मां का साथ बेहद अहम रहा। जब सामाजिक तानों के कारण मुश्किलें बढ़ती थीं, तब उनकी मां उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती थीं।सपना बताती हैं कि उनकी मां हमेशा कहती थीं कि लोगों की बातों पर ध्यान देने के बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान दो और वही करो, जो तुम्हें करना है। मां के इसी भरोसे ने उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत दी।इसके बाद सपना दूसरे राज्यों में भी खेलने जाने लगीं। उन्होंने अंडर-17 से लेकर सीनियर स्तर तक चार अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में हिस्सा लिया और कई पदक अपने नाम किए। उनकी मेहनत ने धीरे-धीरे उन्हें उस मुकाम तक पहुंचाया, जिसका सपना उन्होंने देखा था।

मेडल जीतकर बनीं सब-इंस्पेक्टर

सपना कुमारी का चयन ‘मेडल लाओ, नौकरी पाओ’ योजना के तहत सब-इंस्पेक्टर के पद पर हुआ है। वह बिहार राज्य खेल प्राधिकरण में अपनी सेवाएं दे रही हैं।अपनी नियुक्ति के अनुभव को याद करते हुए सपना ने बताया कि उन्हें पहले पता ही नहीं था कि खेल के जरिए सरकारी नौकरी भी मिल सकती है। जब सूची में उनका नाम आया, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।सपना की सफलता यह भी दिखाती है कि खेल में उपलब्धियां हासिल करने वाले खिलाड़ियों के लिए रोजगार के अवसर कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इससे खिलाड़ियों को अपने जुनून को करियर में बदलने का रास्ता मिलता है।

बिहार में 181 खिलाड़ियों को मिली सरकारी नौकरी

बिहार में खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए ‘मेडल लाओ, नौकरी पाओ’ योजना के तहत पिछले दो वर्षों में 181 खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी दिए जाने की जानकारी सामने आई है। इनमें 95 पुरुष और 86 महिला खिलाड़ी शामिल हैं।इन खिलाड़ियों को दरोगा, डीएसपी और बिहार सचिवालय सेवा जैसे पदों पर नियुक्ति मिली है। इससे खेल को करियर के रूप में अपनाने वाले युवाओं के सामने रोजगार की नई संभावनाएं खुली हैं।खास बात यह है कि नियुक्ति पाने वाली महिला खिलाड़ियों की संख्या भी काफी अधिक है। इससे उन लड़कियों को उम्मीद मिलती है, जो सीमित संसाधनों और सामाजिक चुनौतियों के बीच खेल के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं।

पांच लाख से 25 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता

बिहार राज्य खेल प्राधिकरण की एथलेटिक्स कोच कोमल कुमारी के मुताबिक, पहले राज्य में खेलों के लिए बुनियादी ढांचे और संस्थागत सहयोग की कमी थी। खासकर लड़कियों के लिए नियमित अभ्यास करना और खेल में आगे बढ़ना कई बार चुनौतीपूर्ण होता था।कोमल के अनुसार, अब खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से डाइट, शिक्षा और प्रशिक्षण जैसी जरूरतों के लिए आर्थिक सहायता दी जा रही है। ‘प्रेरणा’ और ‘दक्ष’ जैसी योजनाओं के तहत पांच लाख से 25 लाख रुपये तक की सहायता का उल्लेख किया गया है। हालांकि, सहायता की वास्तविक राशि संबंधित योजना, पात्रता और निर्धारित शर्तों पर निर्भर करती है।

ऐसी सुविधाएं खिलाड़ियों को प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित करने और आर्थिक परेशानियों के बावजूद अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में मदद कर सकती हैं।

सपना कुमारी की कहानी दूसरी बेटियों के लिए प्रेरणा

सपना कुमारी की कहानी केवल रग्बी में पदक जीतने और सरकारी नौकरी पाने तक सीमित नहीं है। यह उस सोच को चुनौती देने की कहानी भी है, जो लड़कियों के कपड़ों, खेल और करियर को सामाजिक रूढ़ियों के आधार पर आंकती है।परिवार का सहयोग, लगातार मेहनत और सही अवसर मिलने पर लड़कियां खेल के मैदान से लेकर सरकारी सेवा तक अपनी पहचान बना सकती हैं। सपना ने दिखाया कि दूसरों के तानों से ज्यादा जरूरी अपने लक्ष्य पर भरोसा रखना है।

बिहार में खिलाड़ियों के लिए नौकरी, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता के अवसर बढ़ाना खेल प्रतिभाओं को आगे लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। सपना जैसी खिलाड़ियों की सफलता से उम्मीद है कि आने वाले समय में अधिक लड़कियां सामाजिक दबाव से आगे बढ़कर खेल को अपना करियर बनाने का साहस जुटाएंगी।

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