BNT Desk: बिहार में करीब पांच दशक पुराने विश्वविद्यालय कानून में प्रस्तावित बदलाव को लेकर शिक्षा जगत में विरोध तेज हो गया है। बिहार सरकार की ओर से प्रस्तावित ‘Bihar University Act 2026’ के विरोध में राज्यभर के विश्वविद्यालयों और सरकारी डिग्री कॉलेजों के शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी आज सामूहिक अवकाश पर रहेंगे। इस दौरान प्रदेश के 481 सरकारी डिग्री कॉलेजों के 12 हजार से अधिक शिक्षक और कर्मचारी अपने-अपने विश्वविद्यालय मुख्यालय पर प्रदर्शन करेंगे। आंदोलन का आह्वान बिहार राज्य विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक-शिक्षकेतर कर्मचारी संयुक्त संघर्ष मोर्चा ने किया है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित कानून लागू होने के बाद विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की स्वायत्तता कमजोर होगी और उच्च शिक्षा व्यवस्था में सरकार का सीधा हस्तक्षेप बढ़ जाएगा।
पटना यूनिवर्सिटी में 1:30 बजे प्रदर्शन
पटना विश्वविद्यालय में प्रस्तावित आंदोलन को लेकर व्हीलर सीनेट हॉल में दोपहर 1:30 बजे प्रदर्शन किया जाएगा। इसमें विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी शामिल होंगे। प्रदर्शन के बाद कुलपति को ज्ञापन सौंपा जाएगा। शिक्षक संगठनों की मांग होगी कि कुलपति सरकार को प्रस्तावित विश्वविद्यालय अधिनियम को तत्काल वापस लेने की अनुशंसा करें। शिक्षक संगठनों का कहना है कि नया कानून लागू होने पर वर्तमान में लागू बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 और पटना विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 समाप्त हो जाएंगे और उनकी जगह बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 लागू होगा।
काला बिल्ला से लेकर आक्रोश मार्च तक विरोध
नए कानून के विरोध में शिक्षक संगठनों ने पहले भी चरणबद्ध आंदोलन किया है। 5 से 8 अगस्त तक शिक्षकों और कर्मचारियों ने अलग-अलग तरीकों से विरोध जताया। इस दौरान शिक्षकों ने काला बिल्ला लगाकर काम किया और प्रस्तावित कानून के खिलाफ अपनी नाराजगी दर्ज कराई। पटना विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने सामूहिक अवकाश लेकर प्रदर्शन भी किया था। इसके अलावा विश्वविद्यालय मुख्यालय से लोकभवन तक आक्रोश मार्च निकालने का आह्वान किया गया था। हालांकि, पुलिस ने पटना कॉलेज के पास ही मार्च को रोक दिया था। अब शिक्षक संगठनों ने एक बार फिर राज्यभर में सामूहिक अवकाश लेकर विश्वविद्यालय मुख्यालयों पर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है।
भर्ती और ट्रांसफर-पोस्टिंग पर सरकार के नियंत्रण का विरोध
शिक्षक संगठनों का सबसे बड़ा विरोध प्रस्तावित कानून में भर्ती, स्थानांतरण और पदस्थापन से जुड़े प्रावधानों को लेकर है। संगठनों का दावा है कि नए कानून के लागू होने के बाद कॉलेजों के शिक्षकों की भर्ती, ट्रांसफर-पोस्टिंग और प्रशासनिक मामलों में सरकार की भूमिका काफी बढ़ जाएगी। शिक्षकों का कहना है कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित होगी। उनका तर्क है कि यदि प्रशासनिक नियंत्रण सरकार के पास अधिक चला गया तो विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छोटे-छोटे कामों के लिए भी शिक्षकों को सचिवालय का चक्कर लगाना पड़ सकता है। शिक्षक संगठनों ने राज्यपाल के अधिकारों में प्रस्तावित बदलाव और कॉलेज शिक्षकों के राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने पर प्रतिबंध जैसे प्रावधानों पर भी आपत्ति जताई है।
कॉलेजों को विश्वविद्यालयों से अलग करने की तैयारी का आरोप
शिक्षक संगठनों के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था में कॉलेजों को विश्वविद्यालयों से अलग प्रशासनिक व्यवस्था में लाने की योजना है। इससे कॉलेजों के संचालन और प्रशासन में सरकार की सीधी भूमिका बढ़ सकती है। संगठनों का यह भी कहना है कि अगर कॉलेजों को विश्वविद्यालयों से अलग कर दिया गया तो कॉलेज शिक्षकों के विश्वविद्यालय स्तर पर प्रोफेसर बनने और आगे बढ़ने के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, प्रस्तावित कानून को लेकर सरकार का पक्ष इससे अलग है। सरकार इसे उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है।
सरकार क्यों ला रही नया विश्वविद्यालय कानून?
राज्य सरकार का तर्क है कि बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से कई समस्याएं बनी हुई हैं। विश्वविद्यालयों में वित्तीय अनियमितता, परीक्षाओं और कक्षाओं के समय पर संचालन में परेशानी, नियुक्ति और प्रोन्नति में देरी, वेतन वृद्धि से जुड़ी शिकायतें और नैक ग्रेडिंग में कमजोर प्रदर्शन जैसे मुद्दे लगातार सामने आते रहे हैं। सरकार का कहना है कि नई कानूनी व्यवस्था के जरिए विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाई जाएगी। इसके साथ ही उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, छात्रों के दूसरे राज्यों में पलायन को रोकने और विश्वविद्यालयों के कामकाज को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया जाएगा।
नए कानून में कॉलेजों का सरकार से सीधा जुड़ाव
प्रस्तावित व्यवस्था में कॉलेजों के प्रशासनिक नियंत्रण को विश्वविद्यालयों से अलग कर सीधे सरकार से जोड़ने की बात सामने आई है। इसके तहत कॉलेजों में प्रशासनिक कामकाज के लिए सरकारी अधिकारियों की तैनाती की संभावना है। शिक्षकों की भर्ती, स्थानांतरण और पदस्थापन में भी सरकार की भूमिका बढ़ने की बात कही जा रही है। इसके अलावा राज्य के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में शिक्षा और पाठ्यक्रम के पैटर्न को एकरूप करने की योजना भी प्रस्तावित व्यवस्था का हिस्सा बताई जा रही है। वहीं, विश्वविद्यालयों को मुख्य रूप से स्नातकोत्तर शिक्षा और शोध कार्य की जिम्मेदारी दिए जाने की बात सामने आई है।
सरकार और शिक्षकों के बीच बढ़ा टकराव
प्रस्तावित बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 को लेकर सरकार और शिक्षक संगठनों के बीच टकराव अब खुलकर सामने आ गया है। शिक्षक संगठन कानून को वापस लेने की मांग पर अड़े हैं, जबकि सरकार उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए इसे जरूरी बता रही है। आज होने वाले सामूहिक अवकाश और प्रदर्शन के बाद आंदोलन किस दिशा में जाता है, इस पर शिक्षा जगत की नजर रहेगी। अब देखना होगा कि सरकार शिक्षक संगठनों के साथ बातचीत कर कोई रास्ता निकालती है या प्रस्तावित कानून के विरोध में आंदोलन आने वाले दिनों में और तेज होता है।