मजदूर दिवस 2026: शुभकामनाओं के बीच सिसकती बिहार की ‘मजदूर नियति’; 5 साल में 3500 से अधिक मौतें

BiharNewsAuthor
4 Min Read

BNT Desk: आज एक मई है—दुनियाभर में ‘मजदूर दिवस’ मनाया जा रहा है। नेताओं के भाषण होंगे, सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बाढ़ आएगी और मजदूरों के सम्मान में बड़े-बड़े वादे किए जाएंगे। लेकिन बिहार के संदर्भ में यह दिन उत्सव से ज्यादा चिंतन और शोक का है। बिहार की मिट्टी से हर साल लाखों लोग पेट की आग बुझाने के लिए बाहर निकलते हैं, लेकिन अक्सर वापस लौटती है तो सिर्फ उनकी ‘लाश’। राजस्थान के भिवाड़ी में हाल ही में हुआ फैक्ट्री ब्लास्ट इसकी ताजा और दर्दनाक मिसाल है।

एक और जख्म, वही पुराना मंजर

पिछले दिनों राजस्थान के भिवाड़ी में एक फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट ने सात परिवारों को उम्र भर का गम दे दिया। इस ब्लास्ट में मारे गए 7 मजदूरों में से 5 मजदूर बिहार के थे। यह कोई पहली घटना नहीं है। देश के किसी भी कोने में आग लगे, बॉयलर फटे या इमारत गिरे—वहां बिहार के किसी न किसी लाल का खून जरूर बहता है। अपनी जमीन पर रोजगार न मिलने की मजबूरी इन्हें मौत के मुहाने पर खड़ा कर देती है।

हर दिन तीन लाशें!

बिहार के श्रम संसाधन विभाग और विभिन्न रिपोर्टों से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं।

  • सालाना त्रासदी: पिछले साल देश के अलग-अलग राज्यों में बिहार के 992 मजदूरों की मौत दुर्घटनाओं में हुई।

  • दैनिक औसत: अगर इसका औसत निकालें, तो भारत के किसी न किसी कोने में हर दिन 3 बिहारी मजदूर काम के दौरान या दुर्घटना में जान गंवा देते हैं।

  • 5 साल का काला लेखा-जोखा: पिछले पांच वर्षों में 3500 से ज्यादा मजदूरों की बलि चढ़ चुकी है।

2024-25 का भयावह दौर

साल 2024-25 बिहार के प्रवासी श्रमिकों के लिए बेहद काला साल साबित हुआ। इस दौरान:

  • 1658 मजदूरों की जान अलग-अलग हादसों में गई।

  • 14 मजदूर पूरी तरह से दिव्यांग (Disabled) हो गए, जिनका अब ताउम्र दूसरों पर आश्रित रहना मजबूरी है।

  • 37 मजदूर आंशिक रूप से दिव्यांग हुए।

  • 54 मजदूर ऐसी लाइलाज बीमारियों की चपेट में आ गए, जिनका इलाज उनके बस के बाहर है।

मजबूरी की वो राह, जो श्मशान तक जाती है

सवाल यह उठता है कि आखिर हर हादसे में बिहारी ही क्यों? इसका सीधा जवाब है— असीमित पलायन और असुरक्षित कार्यस्थल। बिहार में कल-कारखानों की कमी के कारण यहाँ का युवा पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दक्षिण भारत के राज्यों की ओर रुख करता है। वहां वे अक्सर ऐसी जगहों पर काम करते हैं जहाँ सुरक्षा के मानक जीरो होते हैं। कम पैसे में ज्यादा जोखिम उठाना उनकी नियति बन गई है।

सिस्टम की विफलता और मुआवजे का खेल

जब किसी मजदूर की मौत होती है, तो सरकार मुआवजे का एलान कर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेती है। लेकिन क्या चंद लाख रुपये उस परिवार का सहारा बन सकते हैं जिसका इकलौता कमाने वाला सदस्य चला गया? बिहार के गांवों में आज भी ऐसी कई बस्तियां हैं जहाँ हर दूसरे घर की कहानी पलायन और पीड़ा से जुड़ी है। ‘मजदूर दिवस’ पर इन आंकड़ों का सामने आना सिस्टम के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा है।

आज मजदूर दिवस है। हम सबको शुभकामनाएं देनी चाहिए। लेकिन यह शुभकामनाएं तब तक अधूरी हैं जब तक बिहार का मजदूर अपनी ही जमीन पर सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार न पा सके। जब तक बिहार से ‘लाशों का आना’ बंद नहीं होगा, तब तक ‘मजदूर दिवस’ के मायने सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख बनकर रह जाएंगे।

Share This Article