बिहार की सियासत के दो चेहरे: एक तरफ ‘कमीशन’ का खुला खेल, दूसरी तरफ ‘शून्य’ भ्रष्टाचार

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BNT Desk: बिहार की राजनीति को अक्सर जाति, जोड़-तोड़ और भ्रष्टाचार के चश्मे से देखा जाता है। लेकिन इसी मिट्टी ने देश को दो ऐसे उदाहरण दिए हैं जो एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का वह बयान है जिसने राजनीति में ‘कमीशन’ को शिष्टाचार बता दिया, और दूसरी तरफ राज्यसभा के निवर्तमान उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह हैं, जिन्होंने 50 करोड़ रुपये की सांसद निधि को बिना एक पैसे के दाग के बिहार के भविष्य पर न्योछावर कर दिया।

आज जब हरिवंश जी का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हो रहा है और जेडीयू ने उन्हें दोबारा मौका नहीं दिया है, तो बिहार की जनता के लिए यह मंथन का विषय है कि हम किस तरह की राजनीति को चुनना चाहते हैं।

जब मांझी ने कहा- “सब लेते हैं कमीशन, इसमें बुरा क्या?”

दिसंबर 2025 में गया की एक जनसभा में ‘हम’ (HAM) सुप्रीमो जीतन राम मांझी ने वह कह दिया जिसे सुनकर पूरा देश सन्न रह गया। उन्होंने सार्वजनिक मंच से स्वीकार किया कि सांसद और विधायक अपने फंड से कमीशन लेते हैं। मांझी यहीं नहीं रुके, उन्होंने अपने विधायकों को गणित समझाया कि अगर 5 करोड़ का फंड है, तो 10% के हिसाब से 40 लाख रुपये साल के बनते हैं।

उन्होंने तर्क दिया कि यह पैसा संगठन चलाने, गाड़ियाँ खरीदने और पार्टी के काम आता है। इस बयान ने न केवल एनडीए (NDA) को असहज किया, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की ईमानदारी पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया।

हरिवंश नारायण सिंह: ‘काजल की कोठरी’ में बेदाग छवि

जीतन राम मांझी के उस ‘कमीशन तंत्र’ के ठीक उलट एक नाम आता है—हरिवंश नारायण सिंह। पेशे से पत्रकार रहे हरिवंश जी ने चार दशक तक कलम की मर्यादा बचाई और फिर राजनीति में आए। 1990 में चंद्रशेखर के पीएमओ से लेकर 2014 और 2020 में राज्यसभा सदस्य रहने तक, उनकी चादर पर एक भी दाग नहीं लगा।

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर लिखते हैं कि जब उनसे सड़क या नाली के लिए फंड मांगा जाता था, तो उनका स्पष्ट जवाब होता था— “मैं अपना फंड केवल शिक्षा के लिए दूंगा।” इसके पीछे एक गहरी सोच थी—सड़क और नाली के निर्माण में ठेकेदार और बिचौलिए होते हैं, जहाँ कमीशन का खेल आसान होता है। लेकिन शिक्षण संस्थानों को एकमुश्त बड़ी राशि देने पर भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म हो जाती है।

50 करोड़ का ‘ज्ञान निवेश’: कहाँ खर्च हुए पैसे?

हरिवंश जी ने अपनी सांसद निधि का एक-एक रुपया बिहार की बौद्धिक संपदा को खड़ा करने में लगाया। उनके योगदान की फेहरिस्त देखिए:

  • IIT पटना: भाषा अध्ययन केंद्र (Center for Language Studies) के लिए ₹9.87 करोड़ और भूकंप इंजीनियरिंग अनुसंधान के लिए ₹7.10 करोड़।

  • मगध विश्वविद्यालय, गया: यहाँ उन्होंने आधुनिक भविष्य की नींव रखते हुए ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेंटर’ के लिए ₹20 करोड़ की भारी-भरकम राशि दी।

  • आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, पटना: नदी अध्ययन केंद्र के लिए ₹4.27 करोड़।

  • चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्थान (CIMP): बिजनेस इनक्यूबेशन और पब्लिक पॉलिसी सेंटर के लिए ₹9.43 करोड़।

कुल 50 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि सिर्फ शिक्षा और शोध पर। कोई सड़क नहीं, कोई निजी मूर्ति नहीं, कोई दिखावा नहीं।

राजनीति की भेंट चढ़ गई ‘ईमानदारी’?

विडंबना देखिए कि जिस नेता ने बिहार के छात्रों के लिए AI सेंटर और रिसर्च लैब बनवाई, उन्हें इस बार जेडीयू ने राज्यसभा नहीं भेजा। बिहार की जातिगत राजनीति के समीकरणों में हरिवंश जी की यह बेदाग छवि शायद फिट नहीं बैठ पाई। यह बिहार के लिए दुखद है कि एक ऐसा व्यक्ति जिसने ‘सांसद निधि’ के दुरुपयोग को चुनौती दी, वह अब संसद में नहीं दिखेगा।

कबीर का एक दोहा उन पर सटीक बैठता है— “जस की तस धर दीनी चदरिया”। उन्होंने राजनीति की इस कालिख भरी दुनिया में अपनी छवि को वैसा ही बनाए रखा जैसा वह लेकर आए थे।

जनता के सामने बड़ा सवाल

जीतन राम मांझी का बयान यह संदेश देता है कि “सब चोर हैं, तो बेईमानी सामान्य है।” लेकिन हरिवंश जी का चरित्र यह बताता है कि “सिस्टम आपको मजबूर नहीं करता, आप अपना रास्ता खुद चुनते हैं।”

जब मगध यूनिवर्सिटी का कोई छात्र एआई सीखेगा या आईआईटी पटना में भाषा का शोध होगा, तब शायद उन्हें उस सांसद का नाम याद न आए, लेकिन बिहार के निर्माण में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा। बिहार को आज ‘कमीशन वाली नसीहतों’ की नहीं, बल्कि ‘हरिवंश जैसे विजन’ की जरूरत है।

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