BNT Desk: बिहार में 18 जून को होने वाले विधान परिषद (MLC) चुनाव के लिए 5 जून की शाम को एनडीए ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी। इस लिस्ट के सामने आते ही बिहार के राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। लिस्ट में कई बड़े और चौंकाने वाले नाम शामिल हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार (जो इस समय बिहार के स्वास्थ्य मंत्री हैं) को जेडीयू से टिकट मिला है। वहीं, भाजपा ने पिछले चुनाव में पार्टी के लिए जमकर पसीना बहाने वाले भोजपुरी के ‘पॉवर स्टार’ पवन सिंह को भी विधान परिषद का उम्मीदवार बनाया है। लेकिन इस लिस्ट में एक ऐसे नाम का न होना सबसे बड़ी खबर बन गया है, जिसने पूरी सरकार और एक बड़े राजनीतिक परिवार की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
दीपक प्रकाश का टिकट कटना क्यों है बेहद महत्वपूर्ण?
एनडीए की इस नई लिस्ट से राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ नेता उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश का नाम पूरी तरह गायब है। दीपक प्रकाश इस समय बिहार की सम्राट चौधरी सरकार में पंचायती राज मंत्री हैं।
अब समझिए कि उनका नाम लिस्ट में न होना उनके लिए कितनी बड़ी मुसीबत है। भारतीय संविधान के नियमों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति बिना चुनाव जीते अधिकतम 6 महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है। इस समय सीमा के भीतर उसे विधानसभा या विधान परिषद में से किसी एक सदन का सदस्य (विधायक या एमएलसी) बनना अनिवार्य होता है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसे अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ता है। दीपक प्रकाश के लिए यह चुनाव सदन में पहुंचने का सबसे आसान रास्ता था, जो अब बंद हो चुका है।
मंत्री बनने के बाद से ही पार्टी में चल रहा था गृहयुद्ध
पूरी कहानी को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे नवंबर 2025 में जाना होगा, जब बिहार में नई सरकार का गठन हुआ था। उस समय राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के कोटे से उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को सीधे कैबिनेट मंत्री बनवा दिया। उस समय भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे।
बेटे को मंत्री बनाए जाने के बाद उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के अंदर ही बगावत शुरू हो गई। पार्टी के कई बड़े नेताओं जैसे प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र कुशवाहा और उपाध्यक्ष जितेंद्र नाथ ने इसे ‘परिवारवाद’ (परिवार-केंद्रित राजनीति) बताते हुए अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। यहां तक कि पार्टी के विधायक रामेश्वर महतो और अन्य विधायक भी उपेंद्र कुशवाहा के कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगे। हालांकि, उपेंद्र कुशवाहा हमेशा यही कहते रहे कि यह फैसला पार्टी के भले के लिए लिया गया था।
बदल चुके हैं बिहार के समीकरण: अब BJP के हाथ में कमान
बिहार की राजनीति अब पूरी तरह बदल चुकी है। कभी सत्ता के मुख्य केंद्र रहे नीतीश कुमार अब एनडीए में मार्गदर्शक की भूमिका में हैं, जबकि बिहार की असली राजनीतिक कमान अब पूरी तरह भाजपा (BJP) नेतृत्व के हाथों में आ चुकी है।
इस चुनाव में एनडीए की ओर से सीटों का जो बंटवारा हुआ, उसने सबको चौंका दिया:
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भारतीय जनता पार्टी (BJP): पवन सिंह, डॉ. संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित (कुल 4 सीटें)।
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जनता दल यूनाइटेड (JDU): निशांत कुमार, भारती मेहता, शिवरानी देवी प्रजापति और ललन प्रसाद (कुल 4 सीटें)।
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लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास): अशरफ अंसारी (1 सीट)।
एनडीए की सभी 9 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय हो गए, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ‘राष्ट्रीय लोक मोर्चा’ के खाते में एक भी सीट नहीं आई। इसने सहयोगी दलों के बीच बदलती प्राथमिकताओं पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जब इस बारे में मंत्री श्रवण कुमार से पूछा गया, तो उन्होंने भी यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि इसका जवाब सिर्फ भाजपा और खुद उपेंद्र कुशवाहा ही दे सकते हैं।
अब क्या होगा दीपक प्रकाश का अगला कदम?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दीपक प्रकाश अपना मंत्री पद बचा पाएंगे? क्या एनडीए उनके लिए भविष्य में किसी दूसरी सीट या उप-चुनाव की व्यवस्था करेगा? या फिर संवैधानिक मजबूरी के कारण उन्हें आने वाले दिनों में पंचायती राज मंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ेगी? इन सभी सवालों के जवाब 18 जून के चुनाव के बाद ही साफ हो पाएंगे, लेकिन फिलहाल कुशवाहा परिवार के लिए यह समय राजनीतिक रूप से काफी कठिन नजर आ रहा है।