समस्तीपुर: गंगा का जलस्तर घटा, फिर भी कम नहीं हुई बाढ़ की परेशानी; 20 हजार से ज्यादा पशु विस्थापित

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BNT Desk: समस्तीपुर जिले के मोहिउद्दीननगर प्रखंड क्षेत्र में गंगा नदी के जलस्तर में लगातार कमी दर्ज की जा रही है, लेकिन बाढ़ प्रभावित लोगों की मुश्किलें अभी भी बनी हुई हैं। कई इलाकों में जनजीवन सामान्य नहीं हो पाया है और ग्रामीणों का आवागमन अब भी नावों के सहारे हो रहा है। गांवों में नावों का परिचालन जारी है, जबकि प्रशासन की ओर से सामुदायिक किचन और मेडिकल कैंप के माध्यम से बाढ़ पीड़ितों को भोजन और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। जलस्तर में कमी के बावजूद कई गांवों और निचले इलाकों में बाढ़ का पानी जमा है। इससे लोगों को रोजमर्रा के कामों के लिए भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

 

खतरे के निशान से 1.80 मीटर ऊपर गंगा

सरारी कैंप पर तैनात जल संसाधन विभाग के सहायक अभियंता मनीष कुमार गुप्ता ने शुक्रवार को बताया कि गंगा का जलस्तर 47.30 मीटर पर पहुंच गया है। हालांकि नदी का जलस्तर घटने की प्रवृत्ति दर्ज की जा रही है, लेकिन यह अभी भी खतरे के निशान से काफी ऊपर है।

गंगा के खतरे का निशान 45.50 मीटर है। इस तरह नदी का पानी खतरे के निशान से करीब 1.80 मीटर ऊपर है। जलस्तर घटने से प्रशासन और ग्रामीणों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन बाढ़ का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कुछ सड़कों से पानी उतरने लगा है और वहां आवागमन शुरू होने की स्थिति बन रही है। वहीं कई गांवों में अभी भी पानी जमा रहने के कारण नाव ही आवागमन का मुख्य साधन बनी हुई है।

 

17 में से 11 पंचायतें बाढ़ से प्रभावित

स्थानीय लोगों के अनुसार मोहिउद्दीननगर प्रखंड की 17 पंचायतों में से 11 पंचायतें गंगा और वाया नदी की बाढ़ से पूरी तरह प्रभावित हैं। इसके अलावा कल्याणपुर बस्ती पूरब, मदुदाबाद, राजाजान और सिवैसिंहपुर पंचायतों को आंशिक रूप से प्रभावित बताया जा रहा है। इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ी समस्या आवागमन की है। बाढ़ के कारण कई रास्ते पानी में डूब गए हैं। ऐसे में ग्रामीणों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ रहा है। प्रशासन की ओर से प्रभावित क्षेत्रों में राहत गतिविधियां जारी रखने की बात कही गई है। सामुदायिक किचन के जरिए बाढ़ प्रभावित लोगों को भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि मेडिकल कैंप के माध्यम से स्वास्थ्य सुविधाएं देने का प्रयास किया जा रहा है।

 

20 हजार से अधिक पशु भी हुए विस्थापित

बाढ़ का असर केवल लोगों तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में पशुधन भी प्रभावित हुआ है। मोहिउद्दीननगर और मोहनपुर प्रखंड क्षेत्र से 20 हजार से अधिक पशुओं के विस्थापित होने की बात सामने आई है। पशुपालक अपने पशुओं को लेकर सुरक्षित और अपेक्षाकृत ऊंचे स्थानों पर शरण लेने को मजबूर हैं। हरपुर बोचहा हाल्ट, रमैया भदैया, राजाजान, कल्याणपुर बस्ती पूरब-पश्चिम और सिवैसिंहपुर के विभिन्न स्थानों पर पशुपालक अस्थायी रूप से रह रहे हैं। कई परिवारों के लिए पशु ही उनकी आजीविका का मुख्य साधन हैं। इसलिए बाढ़ के बीच उन्हें अपने परिवार के साथ-साथ पशुओं की सुरक्षा और भोजन की भी चिंता बनी हुई है।

 

पशुओं का सरकारी स्तर पर हो रहा इलाज

बाढ़ प्रभावित इलाकों में पशुपालन विभाग की टीमों को भी लगाया गया है। टीमों की ओर से विस्थापित पशुओं का इलाज किया जा रहा है। पशुपालन चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. इंदुशेखर कुमार के अनुसार, पशुओं में डायरिया, कृमि और मौसम से संबंधित अन्य बीमारियों का सरकारी स्तर पर निशुल्क इलाज किया जा रहा है। आपात स्थिति में पशुपालकों की मदद के लिए पशु चिकित्सा वैन की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। बाढ़ के दौरान दूषित पानी और बदलते मौसम के कारण पशुओं में संक्रमण और दूसरी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में पशु चिकित्सा टीमों की मौजूदगी पशुपालकों के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है।

 

औने-पौने दाम पर दूध बेचने को मजबूर पशुपालक

बाढ़ के कारण विस्थापित पशुपालकों की आर्थिक परेशानी भी बढ़ गई है। रामशोभित राय, मनोज महतो और अशर्फी दास ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि दिन में किसी तरह पशुओं को चराकर गुजारा चल रहा है, लेकिन रात के समय सांप और बिच्छू का डर बना रहता है। पशुपालकों के सामने दूध बेचने की भी समस्या है। बाढ़ प्रभावित इलाके में सामान्य बाजार व्यवस्था प्रभावित होने के कारण उन्हें दूध औने-पौने दाम पर बेचने की मजबूरी हो रही है। प्रशासन की ओर से पॉलिथीन शीट और पशुचारे की व्यवस्था किए जाने की जानकारी दी गई है। हालांकि विस्थापित परिवारों की मुश्किलें अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

 

निर्माणाधीन सड़क कई जगह धंसी

बाढ़ के पानी का असर सड़क और निर्माण कार्यों पर भी दिखाई दे रहा है। शंकर चौक से कुरसाहा जाने वाली निर्माणाधीन सड़क कई जगहों पर धंस गई है। सड़क की सुरक्षा दीवार भी कई स्थानों पर गिरने की बात सामने आई है। पानी के दबाव को देखते हुए संवेदक की ओर से मिट्टी से भरी बोरियों का इस्तेमाल कर बचाव का प्रयास किया गया है। वहीं स्थानीय लोगों ने सड़क के धंसने को लेकर निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। बाढ़ के पानी का दबाव कम होने के बाद सड़क और सुरक्षा दीवार को हुए नुकसान का आकलन किया जा सकेगा। फिलहाल पानी के बीच सड़क की स्थिति को लेकर ग्रामीणों की चिंता बनी हुई है।

 

राहत वितरण में भेदभाव का आरोप

बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए सरकारी राहत और बचाव कार्य जारी हैं, लेकिन कुछ पीड़ितों ने राहत वितरण में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि कुछ जनप्रतिनिधियों ने अपने करीबियों को प्राथमिकता दी, जिसके कारण कई जरूरतमंद परिवारों को पॉलिथीन शीट नहीं मिल सकी। इन आरोपों के कारण कुछ इलाकों में लोगों के बीच असंतोष की स्थिति बनने की बात कही जा रही है। हालांकि राहत वितरण में कथित भेदभाव के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

 

310 परिवारों तक पहुंची राहत सामग्री

इधर, सूरज नारायण सेवा समिति और गूंज की ओर से बाढ़ प्रभावित 310 परिवारों के बीच राहत सामग्री का वितरण किया गया। राहत सामग्री में चावल, दाल, सत्तू, दालमोट, हवाई चप्पल और पानी की बोतल सहित अन्य जरूरी सामान शामिल थे। संस्था के निदेशक उमाशंकर सिंह ने बताया कि प्रभावित गांवों में जरूरतमंद परिवारों तक राहत सामग्री पहुंचाने का प्रयास आगे भी जारी रहेगा। गंगा का जलस्तर फिलहाल घट रहा है, जिससे प्रशासन और बाढ़ प्रभावित लोगों को राहत की उम्मीद है। हालांकि जब तक गांवों और निचले इलाकों से पूरी तरह पानी नहीं निकलता, तब तक लोगों की परेशानियां बनी रहने की संभावना है। फिलहाल प्रशासन के सामने लोगों के साथ-साथ विस्थापित पशुधन की देखभाल और प्रभावित सड़कों व अन्य बुनियादी ढांचे को सुरक्षित रखने की चुनौती बनी हुई है।

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