बिना राजनीतिक ट्रेनिंग के मैदान में निशांत कुमार, सामने खड़ी होंगी 5 मुश्किलें, जानिए क्या क्या होंगी दिक्कतें

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के राजनीति में आने की चर्चा तेज है। लेकिन बिना जमीनी अनुभव के उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। परिवारवाद का आरोप, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की स्वीकार्यता, NDA में राजनीतिक वजन, कार्यकर्ताओं से जुड़ाव और नीतीश के वोट बैंक को संभालना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

BNT
By
3 Min Read

BNT Desk: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक ही नाम की चर्चा है—निशांत कुमार। नीतीश कुमार के 50 वर्षीय बेटे, जो पेशे से इंजीनियर हैं और अब तक राजनीति से पूरी तरह दूर रहे हैं, उन्हें विरासत सौंपने की तैयारी चल रही है। जहाँ जेडीयू इसे नीतीश जी का ‘नैतिक बल’ कह रही है, वहीं जानकार इसे मजबूरी में उठाया गया कदम मान रहे हैं। क्या बिना किसी जमीनी अनुभव के निशांत बिहार की बिसात पर टिक पाएंगे? आइए समझते हैं उन 5 बड़ी चुनौतियों को, जो उनके सामने पहाड़ बनकर खड़ी हैं।

1. ‘परिवारवाद’ का मनोवैज्ञानिक दबाव

नीतीश कुमार ने अपना पूरा राजनीतिक करियर लालू यादव के ‘परिवारवाद’ के विरोध पर बनाया है। अब खुद अपने बेटे को आगे लाना उनके सिद्धांतों पर सवाल उठाता है। विपक्ष को यह कहने का मौका मिल गया है कि “नीतीश भी अंत में वही कर रहे हैं, जिसका उन्होंने विरोध किया था।” इस नैरेटिव को काटना निशांत के लिए सबसे पहली और बड़ी परीक्षा होगी।

2. जमीनी अनुभव और संघर्ष की कमी

बिहार की राजनीति ‘एल्गोरिदम’ से नहीं, बल्कि जनता के बीच ‘पसीना’ बहाने से चलती है। अखिलेश यादव या तेजस्वी यादव ने राजनीति में आने से पहले लंबी पदयात्राएं कीं और कार्यकर्ताओं से संवाद किया। निशांत की सक्रियता अब तक शून्य रही है। बिना बूथ स्तर की राजनीति समझे, कार्यकर्ताओं का दिल जीतना उनके लिए बहुत मुश्किल होगा।

3. पार्टी के दिग्गजों की स्वीकार्यता

जेडीयू में ललन सिंह, विजेंद्र यादव और अशोक चौधरी जैसे कई कद्दावर नेता हैं, जो खुद को नीतीश का उत्तराधिकारी मानते रहे हैं। ऐसे में एक “नए चेहरे” के नीचे काम करना इन वरिष्ठ नेताओं के लिए कितना सहज होगा? पार्टी के भीतर होने वाले संभावित ‘भीतरघात’ को रोकना निशांत के लिए बड़ी चुनौती होगी।

4. NDA गठबंधन में मोलभाव

नीतीश कुमार का कद इतना बड़ा था कि वे भाजपा के सामने अपनी शर्तें रखते थे। निशांत के पास अभी वह ‘चुनावी वजन’ नहीं है। क्या भाजपा उन्हें वही सम्मान और उतनी ही सीटें देगी जो नीतीश कुमार को मिलती थीं? गठबंधन में अपनी पकड़ बनाए रखना उनके लिए आसान नहीं होगा।

5. वोट बैंक को सहेज कर रखना

नीतीश कुमार ने सालों की मेहनत से EBC (अति पिछड़ा) और ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) का एक अटूट वोट बैंक तैयार किया है। यह वर्ग नीतीश के चेहरे पर वोट देता है। निशांत के लिए इस जटिल ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को बिखरने से बचाना और खुद को इन वर्गों का सर्वमान्य नेता साबित करना सबसे कठिन काम होगा।

Share This Article