पटना: सलवार उतारने और सीना दबाने को रेप की कोशिश नहीं मानने वाले पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का संज्ञान

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BNT Desk: सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने की घटना को बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं माना गया था। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ कर रही है। पीठ ने कहा कि मामले के तथ्यों को देखा जाएगा और हाईकोर्ट के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियां आपत्तिजनक प्रतीत होती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के फैसले और उसमें बलात्कार के प्रयास से जुड़े कानून की व्याख्या की समीक्षा शुरू की है। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि आरोपी का पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट के आदेश को खारिज भी किया जा सकता है। हालांकि, अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और कानूनी परीक्षण के बाद ही होगा।

बांका के करीब 18 साल पुराने मामले से जुड़ा है विवाद

यह मामला बिहार के बांका जिले के अमरपुर से जुड़ा है और करीब 18 साल पुराना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 20 जनवरी 2008 को एक स्टूडियो मालिक के खिलाफ बलात्कार के प्रयास के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। युवती का आरोप था कि वह अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने के लिए स्टूडियो गई थी। इसी दौरान स्टूडियो मालिक ने कथित तौर पर दरवाजा बंद कर दिया और उसकी सलवार उतारने की कोशिश की।

पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने बलात्कार के इरादे से उसके सीने को दबाया। मामले में निचली अदालत ने सुनवाई के बाद आरोपी को बलात्कार के प्रयास का दोषी माना था। 2013 में बांका की अदालत ने आरोपी को तीन साल की कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपी ने निचली अदालत के फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। करीब 13 साल बाद 9 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया।

पटना हाईकोर्ट ने धारा 376/511 की सजा बदली

पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आरोपी को बलात्कार के प्रयास यानी धारा 376/511 के तहत मिली सजा को बदल दिया। अदालत ने मामले को भारतीय दंड कानून की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने से जुड़े अपराध के रूप में देखा।

रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने कहा कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने की घटना को अपने आप में बलात्कार के प्रयास के रूप में नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि मामले में शारीरिक संबंध बनाने का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं था और बलात्कार के इरादे को साबित करने वाला स्पष्ट शारीरिक प्रयास भी सामने नहीं आया था। हाईकोर्ट ने मेडिकल साक्ष्य की अनुपस्थिति का भी उल्लेख किया और इसी आधार पर आरोपी को बलात्कार के प्रयास के आरोप से राहत दी।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले की टिप्पणियों पर उठाया सवाल

जुलाई में पटना हाईकोर्ट के इस आदेश की जानकारी सुप्रीम कोर्ट के सामने आई। उस समय सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक दूसरे मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें नाबालिग की छाती दबाने और पायजामे का नाड़ा तोड़ने जैसी घटनाओं को बलात्कार के प्रयास के रूप में नहीं माना गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया था। अब पटना हाईकोर्ट के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। इसी क्रम में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पटना हाईकोर्ट के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को लेकर चिंता जताई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी पटना हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम रूप से रद्द नहीं किया है। अदालत पहले मामले के तथ्यों, आरोपी का पक्ष और संबंधित कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी।

बिहार के एडवोकेट जनरल से भी कहा गया नोटिस पहुंचाने को

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय से कहा कि स्थानीय पुलिस के माध्यम से आरोपी को नोटिस भेजा जाए। इसका उद्देश्य आगे की सुनवाई में आरोपी का पक्ष भी अदालत के सामने रखना है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने संकेत दिया है कि मामले में हाईकोर्ट के फैसले और उसमें इस्तेमाल की गई कानूनी व्याख्या की विस्तार से जांच की जाएगी। अदालत यह देखेगी कि उपलब्ध तथ्यों और आरोपों के आधार पर बलात्कार के प्रयास से संबंधित कानूनी प्रावधानों को किस तरह लागू किया जाना चाहिए।

अब सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश पर नजर

इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत के सामने मुख्य सवाल हाईकोर्ट के फैसले में बलात्कार के प्रयास और अन्य यौन अपराधों के बीच किए गए कानूनी अंतर से जुड़ा है।मामला करीब 18 साल पुराना होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियों और कानून की व्याख्या पर स्वतः संज्ञान लिया है। फिलहाल अदालत ने अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। आरोपी का पक्ष सुनने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट आगे का आदेश जारी करेगा। इसलिए इस स्तर पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह खारिज करेगा या उसमें कोई अन्य बदलाव करेगा। अगली सुनवाई में मामले के तथ्य, साक्ष्य और लागू कानूनी प्रावधानों पर अदालत का रुख स्पष्ट हो सकता है।

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