पश्चिम चंपारण: नरकटिया दोन में हारहा नदी के कटाव का खतरा; गांव बचाने के लिए नदी में उतरीं 50 से ज्यादा महिलाएं, पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर किया श्रमदान

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BNT Desk: पश्चिम चंपारण के रामनगर प्रखंड से ग्रामीणों की एकजुटता की तस्वीर सामने आई है। रामनगर की दो पंचायतों के करीब 22 गांवों में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लोग लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। बरसात के मौसम में इन गांवों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। कई गांवों के लोगों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए उफनती पहाड़ी नदियों को पार करना पड़ता है। कई बार नदी पार करना ग्रामीणों के लिए जानलेवा भी साबित हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार, नदी पार करने के दौरान दो लोगों की मौत हो चुकी है। अब एक बार फिर नदी के तेज कटाव से गांव पर खतरा मंडरा रहा है। इसी खतरे को देखते हुए नरकटिया दोन गांव के ग्रामीण खुद नदी में उतर गए और गांव को बचाने के लिए श्रमदान शुरू कर दिया।

 

50 से ज्यादा महिलाओं ने संभाला मोर्चा

नरकटिया दोन गांव के समीप बहने वाली हारहा नदी के तेज कटाव से गांव को खतरा पैदा हो गया है। बाढ़ का पानी फिलहाल कुछ कम हुआ है, लेकिन नदी लगातार अपना रास्ता बदलते हुए गांव की ओर कटाव कर रही है। ऐसे में अगली बारिश से पहले ग्रामीण नदी के पानी को गांव में घुसने से रोकने की कोशिश में जुट गए हैं। इस काम में पुरुषों के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं भी आगे आई हैं। करीब 50 से अधिक महिलाएं सिर पर टोकरी रखकर मिट्टी और बालू ढोती नजर आईं। महिलाएं कुदाल और टोकरी लेकर पुरुषों के साथ मिलकर बांध बनाने में जुटी हैं। गांव को बचाने के लिए नारी शक्ति ने भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मोर्चा संभाल लिया है।

 

सिर पर मिट्टी-बालू लेकर बना रहे बांध

ग्रामीण नदी में उतरकर मिट्टी और बालू इकट्ठा कर रहे हैं। इसके बाद उसे टोकरी में भरकर सिर पर उठाकर कटाव वाली जगह तक पहुंचाया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय रहते कटाव को नहीं रोका गया तो अगली बारिश में नदी का पानी गांव की ओर पहुंच सकता है। इसी वजह से ग्रामीण सरकारी मदद का इंतजार किए बिना खुद श्रमदान कर बांध को मजबूत करने में जुटे हैं। महिलाएं, पुरुष और बच्चे सभी अपनी क्षमता के अनुसार इस काम में योगदान दे रहे हैं।

 

बरसात में जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं ग्रामीण

रामनगर की दो पंचायतों के 22 गांवों में रहने वाले लोगों के लिए बरसात का मौसम हर साल बड़ी चुनौती लेकर आता है। कई गांवों को जोड़ने वाली सड़कों और पुल-पुलियों की कमी के कारण ग्रामीणों को पहाड़ी नदियों के पानी के बीच से होकर गुजरना पड़ता है। बारिश के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद गांवों का संपर्क भी प्रभावित हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि नदी पार करते समय पहले भी हादसे हो चुके हैं और दो लोगों की जान जा चुकी है। अब नदी का कटाव गांव के नजदीक पहुंचने से ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है।

 

पहले भी श्रमदान से बचाया था गांव

ग्रामीणों के लिए यह पहली बार नहीं है जब उन्हें अपने गांव को बचाने के लिए खुद नदी में उतरना पड़ा हो। कुछ दिन पहले बैरीया दोन गांव के समीप खुदी नदी का बांध टूट गया था। बांध टूटने के बाद नदी का पानी गांव की ओर बढ़ने लगा था। उस समय भी ग्रामीणों ने एकजुट होकर श्रमदान किया और बांध की मरम्मत कर गांव में पानी घुसने से रोकने की कोशिश की थी। अब हारहा नदी के कटाव ने नरकटिया दोन गांव के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

 

महिलाओं की भागीदारी बनी चर्चा का विषय

इस बार ग्रामीणों के श्रमदान में महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी सबसे खास बात रही। करीब 50 से ज्यादा महिलाएं नदी में उतरकर मिट्टी और बालू ढोती नजर आईं। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि गांव सुरक्षित रहेगा तभी उनका परिवार और आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित रहेंगी। इसलिए गांव को बचाने के इस प्रयास में वे पुरुषों से पीछे नहीं रहना चाहतीं। नदी के कटाव से जूझ रहे गांव में महिलाओं की यह भागीदारी न सिर्फ ग्रामीण एकजुटता की तस्वीर दिखाती है, बल्कि यह भी बताती है कि संकट के समय महिलाएं भी बराबर की जिम्मेदारी उठा रही हैं।

 

सरकारी मदद की जरूरत

ग्रामीणों के इस प्रयास से फिलहाल नदी के कटाव को रोकने की कोशिश की जा रही है, लेकिन लंबे समय के समाधान के लिए प्रशासन की मदद जरूरी है। ग्रामीणों की मांग है कि नदी के कटाव वाले इलाकों में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था की जाए। साथ ही गांवों को जोड़ने के लिए बेहतर सड़क और पुल-पुलिया का निर्माण कराया जाए, ताकि बरसात के दौरान लोगों को जान जोखिम में डालकर नदी पार न करनी पड़े। फिलहाल नरकटिया दोन गांव के ग्रामीण हारहा नदी के कटाव को रोकने के लिए लगातार श्रमदान कर रहे हैं। पुरुषों के साथ महिलाओं और बच्चों की भागीदारी ने इस प्रयास को एक सामूहिक अभियान का रूप दे दिया है।

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