BNT Desk: बिहार में विकास की एक ऐसी बयार बहने वाली है जो राज्य की तस्वीर बदल देगी। सरकार ने राज्य के 11 महत्वपूर्ण केंद्रों पर ‘सेटेलाइट सिटी’ बसाने का फैसला किया है। इसके लिए बाकायदा रोडमैप तैयार हो चुका है और प्रधान सचिव विनय कुमार ने इसका पूरा ब्लूप्रिंट जनता के सामने रख दिया है। लेकिन इस चमक-धमक वाले प्रोजेक्ट के बीच सबसे ज्यादा हलचल उन किसानों में है जिनकी ज़मीनें इन चिन्हित क्षेत्रों में आती हैं। क्या उनकी ज़मीन बचेगी? क्या उन्हें सही मुआवजा मिलेगा? आइए, इस पूरे प्रोजेक्ट को आसान भाषा में समझते हैं।
कहाँ बसेंगे ये 11 नए शहर?
सरकार ने उन 11 शहरों और उनके नए नामों की घोषणा कर दी है, जिन्हें आधुनिक टाउनशिप के रूप में विकसित किया जाएगा:
-
पटना: पाटलिपुत्र
-
भागलपुर: विक्रमशिला
-
मुजफ्फरपुर: तिरहुत
-
मुंगेर: अंग
-
छपरा: सारण
-
दरभंगा: मिथिला
-
सहरसा: कोसी
-
गया: मगध
-
सोनपुर: हरिहर नाथपुर
-
सीतामढ़ी: सीतापुरम
-
पूर्णिया: पूर्णिया
ये शहर पुराने भीड़भाड़ वाले शहरों से करीब 30 मिनट की दूरी पर होंगे और एक्सप्रेसवे या हाई-स्पीड कॉरिडोर से जुड़े होंगे।
क्या है लैंड पूलिंग मॉडल? (55% का फॉर्मूला)
अक्सर सरकारी प्रोजेक्ट्स में ज़मीन ‘अधिग्रहण’ (Acquisition) की जाती है, जहाँ किसान अपनी ज़मीन बेचकर अलग हो जाता है। लेकिन इस बार बिहार सरकार ‘लैंड पूलिंग’ लेकर आई है।
-
शेयरहोल्डर किसान: इसमें किसान अपनी ज़मीन सरकार को विकास के लिए देता है।
-
वापसी का वादा: सरकार उस पूरी ज़मीन को विकसित (सड़क, बिजली, सीवरेज, पार्क) करती है और विकास के बाद कुल ज़मीन का 55% हिस्सा मूल मालिक को वापस कर देती है।
-
फायदा: किसान को जो 55% विकसित ज़मीन मिलती है, उसकी कीमत कच्चे खेत के मुकाबले 10 से 20 गुना ज्यादा हो जाती है। बाकी 45% ज़मीन का उपयोग सरकार सड़क, स्कूल, अस्पताल और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए करेगी।
‘जीरो कॉस्ट’ मॉडल और इंफ्रास्ट्रक्चर
सरकार इस प्रोजेक्ट के लिए अपनी जेब से भारी निवेश नहीं कर रही है। यह मॉडल खुद-ब-खुद अपनी लागत निकालेगा:
-
15% ज़मीन सरकार की: सरकार कुल ज़मीन का 15% हिस्सा अपने पास रखेगी, जिसे बेचकर सड़क और ड्रेनेज बनाने का खर्च निकाला जाएगा।
-
सुविधाएं: हर प्लॉट के साथ ड्रेनेज, सीवरेज और बिजली का कनेक्शन अनिवार्य होगा। अब लॉटरी सिस्टम की जगह हर किसान को विकसित भूखंड मिलेगा।
चुनौतियां और किसानों की चिंताएं
योजना जितनी सुनहरी दिखती है, ज़मीनी स्तर पर उतनी ही पेचीदा है।
-
रजिस्ट्री पर बैन: सरकार ने इन 11 इलाकों में 2027 तक ज़मीन की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी है। सरकार का तर्क है कि इससे भू-माफिया किसानों को ठग नहीं पाएंगे। लेकिन, उन लोगों के लिए यह मुसीबत है जिन्हें शादी या बीमारी के लिए अचानक पैसे की जरूरत है।
-
छोटा रकबा: जिनके पास सिर्फ 1 या 2 कट्ठा ज़मीन है, उन्हें 55% वापसी के बाद बहुत छोटा प्लॉट मिलेगा, जिस पर घर बनाना मुश्किल हो सकता है।
-
सर्किल रेट बनाम मार्केट रेट: यदि कोई किसान लैंड पूलिंग में शामिल नहीं होना चाहता, तो सरकार ‘नेगोशिएटेड परचेज’ (आपसी सहमति से खरीद) करेगी। यहाँ पेच यह है कि सरकारी रेट (सर्किल रेट) अक्सर असली मार्केट रेट से बहुत कम होता है।
TDR का विकल्प
जो लोग अपनी ज़मीन का सौदा करना चाहते हैं, उन्हें सरकार TDR (Transfer of Development Rights) देने पर भी विचार कर रही है। यह एक तरह का सर्टिफिकेट होगा जिसे बाज़ार में बेचा जा सकेगा, लेकिन ग्रामीण इलाकों के किसानों के लिए इस तकनीकी शब्द को समझना और इसका सही दाम पाना एक बड़ी चुनौती होगी।
समय सीमा की अग्निपरीक्षा
अक्टूबर-नवंबर 2026 तक इस प्रोजेक्ट का फाइनल ड्राफ्ट सामने आने की उम्मीद है। बिहार सरकार का दावा है कि इन शहरों में आईटी पार्क, फिल्म सिटी और आधुनिक सुविधाएं होंगी। बिहार के विकास के लिए यह एक ‘स्ट्रक्चरल शिफ्ट’ हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार किसानों का भरोसा कितनी पारदर्शिता से जीत पाती है।