बिहार के सरकारी स्कूलों में ‘शनिवार का मंथन’: क्या बदल पाएगी शिक्षा की सूरत?

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BNT Desk: बिहार की शिक्षा व्यवस्था हमेशा से चर्चा और चुनौतियों के केंद्र में रही है। बीएड, डीएलएड जैसी डिग्रियां, टीईटी (TET) और सीटीईटी (CTET) जैसी कठिन परीक्षाओं को पास कर शिक्षक स्कूलों तक तो पहुंच रहे हैं, लेकिन बुनियादी शिक्षा के स्तर पर अब भी एक बड़ा ‘गैप’ नजर आता है। हाल ही में शिक्षा विभाग की एक रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है, जिसमें बताया गया कि कक्षा 3 से 6 तक के कई छात्र अब भी बुनियादी गणित (जोड़-घटाव) और भाषा की समझ में संघर्ष कर रहे हैं।

इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए बिहार शिक्षा विभाग ने एक नई और अनूठी पहल शुरू की है—‘शनिवार का संकल्प: संकुल स्तर पर मंथन’। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह योजना क्या है और इससे बदलाव की कितनी उम्मीद है।

सवाल वही: ट्रेनिंग और डिग्रियां हैं, फिर नतीजे ‘सिफर’ क्यों?

बिहार में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया अब काफी पारदर्शी और कठिन हो चुकी है। शिक्षकों को समय-समय पर रिफ्रेशर कोर्स भी कराए जाते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि जब शिक्षक इतने प्रशिक्षित हैं, तो बच्चों की नींव कमजोर क्यों है? असल में, समस्या किताबों के ज्ञान में नहीं, बल्कि उसे बच्चों तक पहुँचाने के ‘तरीके’ में है। इसी ‘गैप’ को भरने के लिए अब शिक्षकों को पारंपरिक ट्रेनिंग के बजाय एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

क्या है नई पहल: ‘अनुभवों का साझा मंच’

शिक्षा विभाग ने अब हर शनिवार को ‘संकुल’ यानी क्लस्टर स्तर पर शिक्षकों की बैठक अनिवार्य कर दी है। राज्य के शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के अनुसार, इसे एक औपचारिक ट्रेनिंग नहीं माना जाना चाहिए। यह एक ऐसा मंच है जहाँ शिक्षक अपनी क्लास की व्यावहारिक समस्याओं, चुनौतियों और उनके द्वारा खोजे गए सफल समाधानों को एक-दूसरे के साथ साझा करेंगे। इसका सीधा उद्देश्य शिक्षण को रटने की प्रक्रिया से निकालकर ‘सीखने की प्रक्रिया’ में बदलना है।

बैठक का खाका: 2 घंटे 15 मिनट का गहन मंथन

शनिवार की इस विशेष बैठक को बहुत ही व्यवस्थित तरीके से तीन चरणों में बांटा गया है:

1. पहला चरण: शुरुआती तालमेल (15 मिनट)

बैठक के शुरुआती 15 मिनटों में कक्षा 1 से 3 तक के शिक्षक विभाग द्वारा दिए गए एजेंडे और निर्देशों पर चर्चा करते हैं। यहाँ फोकस इस बात पर रहता है कि छोटी कक्षाओं में बच्चों के बीच सीखने की जो शुरुआती बाधाएं आती हैं, उन्हें कैसे दूर किया जाए।

2. दूसरा चरण: शिक्षण विधियों पर चर्चा (60 मिनट)

यह एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसमें पाठ्यपुस्तकों को आधार बनाकर भाषा और गणित जैसे विषयों को रोचक बनाने पर चर्चा होती है। यहाँ शिक्षक इस बात पर विचार करते हैं कि रजिस्टर बनाने और कागजी कार्रवाई के साथ-साथ बच्चों की प्रगति को कैसे ट्रैक किया जाए।

3. तीसरा चरण: पाठ योजना और नवाचार (60 मिनट)

अंतिम एक घंटे में शिक्षक अपनी ‘लेसन प्लान’ (Lesson Plan) साझा करते हैं। यहाँ इस बात पर जोर दिया जाता है कि पढ़ाई को ‘बोझ’ के बजाय ‘खेल’ कैसे बनाया जाए। शिक्षक यह चर्चा करते हैं कि छात्र के पास जो पहले से व्यावहारिक ज्ञान है, उसे नई पढ़ाई के साथ कैसे जोड़ा जाए (Contextual Learning)।

विषयवार रोस्टर: व्यवस्थित और प्रभावी

इस योजना को सफल बनाने के लिए विभाग ने एक रोस्टर भी तैयार किया है ताकि हर शनिवार अलग-अलग विषयों और कक्षाओं के शिक्षकों पर विशेष ध्यान दिया जा सके:

  • पहला शनिवार: कक्षा 1, 2 और 3 के शिक्षक।

  • दूसरा शनिवार: कक्षा 4 और 5 के शिक्षक।

  • तीसरा शनिवार: भाषा और सामाजिक विज्ञान के शिक्षक।

  • चौथा शनिवार: गणित और विज्ञान के शिक्षक।

इस व्यवस्था के तहत राज्य भर के करीब 1 लाख शिक्षक हर हफ्ते इस मंथन का हिस्सा बनेंगे।

क्या वाकई बदलेगी स्कूलों की तस्वीर?

इस नई पहल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब शिक्षकों का फोकस सिर्फ ‘सिलेबस खत्म करने’ पर नहीं, बल्कि ‘बच्चे के माइंडसेट’ को समझने पर होगा। जब शिक्षक एक-दूसरे के बेहतरीन आइडियाज को अपनाएंगे, तो इसका सीधा असर क्लासरूम के माहौल पर पड़ेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्कूलों के सुधार के लिए यह जमीनी स्तर का प्रयास है। यदि यह पहल केवल कागजों और हाजिरी तक सीमित नहीं रहती है, तो आने वाले समय में बिहार के छात्रों की बुनियादी समझ (Foundational Literacy and Numeracy) में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है।

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