बिहार की सियासत में ‘खेला’ शब्द अब आम हो चुका है, लेकिन 16 मार्च 2026 को राज्यसभा चुनाव के दौरान जो हुआ, उसने राजनीति के जानकारों को भी हैरान कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विपक्ष के खिलाफ एक ऐसी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है, जिसने राजद (RJD) और कांग्रेस को एक ‘पॉलिटिकल कोमा’ में धकेल दिया है। यह एक ऐसी रणनीति है जहाँ विपक्ष को अपनी हार और कमजोरी का पता तो है, लेकिन वे चाहकर भी इसका इलाज नहीं कर पा रहे हैं।
राज्यसभा चुनाव की वह बिसात और BJP की ‘चाणक्य नीति’
राज्यसभा चुनाव में संख्या बल के हिसाब से भाजपा और जदयू के दो-दो उम्मीदवारों की जीत तय थी। ट्विस्ट तब आया जब भाजपा ने पांचवीं सीट पर अपने उम्मीदवार शिवेश राम को उतार दिया। विपक्ष की ओर से बड़े व्यवसायी एडी सिंह मैदान में थे। शिवेश राम को जीत के लिए केवल 3 अतिरिक्त वोटों की दरकार थी, जबकि एडी सिंह को 6।
माना जा रहा था कि धनबल के मामले में मजबूत एडी सिंह बाजी मार सकते हैं, लेकिन भाजपा ने ‘चाणक्य नीति’ का इस्तेमाल करते हुए वोटिंग के ठीक पहले महागठबंधन के 4 विधायकों (3 कांग्रेस और 1 राजद) को सीन से गायब कर दिया। नतीजा यह हुआ कि जीत का कोटा कम हो गया और शिवेश राम शान से सदन पहुँच गए।
तेजस्वी यादव की सबसे बड़ी मजबूरी: कुर्सी या कार्रवाई?
इस पूरी स्ट्राइक में सबसे ज्यादा दर्दनाक स्थिति तेजस्वी यादव की है। भाजपा ने राजद विधायक फैसल रहमान को तोड़कर तेजस्वी को एक ‘संवैधानिक पिंजरे’ में बंद कर दिया है।
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खतरे में नेता प्रतिपक्ष का पद: बिहार विधानसभा के नियमों के मुताबिक, ‘नेता प्रतिपक्ष’ का दर्जा बनाए रखने के लिए किसी दल के पास कम से कम 10% यानी 25 विधायक होने चाहिए।
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संख्या का गणित: राजद के पास वर्तमान में ठीक 25 विधायक हैं। यदि तेजस्वी यादव बागी विधायक फैसल रहमान पर दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई करते हैं और उनकी सदस्यता जाती है, तो राजद की संख्या घटकर 24 रह जाएगी।
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सुख-सुविधाओं का मोह: संख्या 25 से नीचे गिरते ही तेजस्वी यादव से कैबिनेट मंत्री वाला बंगला, गाड़ी और ‘नेता प्रतिपक्ष’ का रूतबा छिन जाएगा। भाजपा बखूबी जानती है कि तेजस्वी अपनी पावर को दांव पर लगाकर कार्रवाई का जोखिम नहीं उठाएंगे।
कांग्रेस की लाचारी: न नेता, न व्हिप, न कार्रवाई
कांग्रेस की हालत तो और भी हास्यास्पद बनी हुई है। भाजपा की स्ट्राइक ने कांग्रेस की आंतरिक सुस्ती और सांगठनिक विफलता को जगजाहिर कर दिया है।
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व्हिप की अनुपस्थिति: कांग्रेस पिछले 4 महीनों से अपना विधायक दल का नेता (CLP Leader) ही नहीं चुन पाई है। जब नेता ही नहीं, तो व्हिप (सचेतक) की नियुक्ति भी नहीं हुई।
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कानूनी दांव-पेंच: राज्यसभा चुनाव में वोटिंग के लिए कोई आधिकारिक व्हिप जारी नहीं हुआ था। ऐसे में तकनीकी तौर पर बागी विधायकों—मनोहर प्रसाद सिंह, सुरेंद्र कुशवाहा और मनोज विश्वास—को अयोग्य घोषित करना नामुमकिन है। उनके पास कोर्ट में यह मजबूत दलील है कि उन्हें किसी ने वोट देने का ‘आधिकारिक आदेश’ दिया ही नहीं था।
बागी विधायकों को ‘इनाम’ और विपक्ष का मौन
भाजपा की इस स्ट्राइक का असर अब जमीन पर दिखने लगा है। अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले विधायकों को सत्ता पक्ष की ओर से पुरस्कृत किया जा रहा है:
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राजद के फैसल रहमान और कांग्रेस के मनोहर प्रसाद सिंह को विधानसभा की समितियों का सभापति बना दिया गया है।
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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मंत्री अशोक चौधरी के साथ इन बागी विधायकों की मुस्कुराती हुई तस्वीरें इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की सफलता की कहानी खुद बयां कर रही हैं।
भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम से यह साबित कर दिया है कि बिहार की राजनीतिक बिसात पर असली ‘वजीर’ वही है। उसने विपक्ष की तकनीकी कमियों और सत्ता के मोह को अपना हथियार बनाया है। विपक्ष आज उस मरीज की तरह है जिसे अपनी बीमारी का पता है, लेकिन वह इलाज इसलिए नहीं करा सकता क्योंकि इलाज की कीमत उसकी अपनी ‘कुर्सी’ है।
राजनीति के छात्रों के लिए यह ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ एक केस स्टडी है, जहाँ बिना एक शब्द बोले विपक्षी खेमे की चूलें हिला दी गईं। आने वाले दिनों में देखना होगा कि क्या कांग्रेस के बाकी विधायक भी इसी रास्ते पर चलते हैं या विपक्ष इस ‘कोमा’ से बाहर निकलने का कोई रास्ता तलाश पाता है।
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