BNT Desk : बिहार में शराबबंदी लागू होने के करीब एक दशक बाद नशीले पदार्थों का कारोबार पुलिस और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में Narcotic Drugs and Psychotropic Substances (NDPS) Act के तहत दर्ज मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। गांजा की जब्ती भी बढ़ी है, जबकि नशीली गोलियों की बरामदगी में असाधारण उछाल दर्ज किया गया है। इसी बीच म्यांमार के रास्ते आने वाले ‘कोटा’ नामक नशीले पदार्थ को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, समस्या केवल तस्करी तक सीमित नहीं है, बल्कि नशे की लत और इलाज की सीमित सुविधाएं भी बड़ी चुनौती हैं।
बिहार में नशे के मामलों में कितनी बढ़ोतरी हुई?
The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार पुलिस मुख्यालय के आंकड़ों में NDPS Act के तहत दर्ज मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि सामने आई है।
- 2019: NDPS के तहत 697 मामले दर्ज हुए।
- 2022: पूरे साल में दर्ज मामलों की तुलना में 2026 के शुरुआती पांच महीनों में 1,905 मामले सामने आए, जो 83 अधिक थे।
- गांजा जब्ती: 2022 में 16,691.81 किलोग्राम से बढ़कर 2025 में 31,915.29 किलोग्राम हो गई।
- नशीली गोलियां: 2022 में 29,762 गोलियां जब्त हुई थीं, जबकि 2026 के शुरुआती पांच महीनों में यह आंकड़ा 9.29 लाख तक पहुंच गया।
ये आंकड़े बताते हैं कि बिहार में नशीले पदार्थों की तस्करी और जब्ती से जुड़ी चुनौती बढ़ी है। हालांकि, जब्ती और दर्ज मामलों में बढ़ोतरी को नशे के वास्तविक प्रसार का अकेला पैमाना नहीं माना जा सकता। पुलिस की कार्रवाई और निगरानी में बदलाव भी इन आंकड़ों को प्रभावित कर सकते हैं।
क्या है ‘कोटा’ ड्रग और कहां से आ रहा है?
रिपोर्ट में ‘कोटा’ नाम से पहचाने जाने वाले नशीले पदार्थ का उल्लेख किया गया है, जिसकी तस्करी के लिए म्यांमार और पूर्वोत्तर भारत से जुड़े रास्तों पर चिंता जताई गई है। हालांकि, उपलब्ध विवरण में इस पदार्थ की सटीक रासायनिक पहचान और इसकी संरचना की पूरी जानकारी नहीं दी गई है।भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति म्यांमार से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा और दूसरे राज्यों से जुड़ी सड़क एवं रेल कनेक्टिविटी के कारण नशीले पदार्थों की तस्करी के मामलों में महत्वपूर्ण है। बिहार भी पूर्वोत्तर से आने वाले परिवहन मार्गों और नेपाल से लगी सीमा के कारण तस्करी के नेटवर्क की जद में आ सकता है।पुलिस अधिकारियों के अनुसार, गांजा नेपाल, त्रिपुरा, ओडिशा और आंध्र प्रदेश सहित विभिन्न रास्तों से बिहार पहुंचता है। कुछ खेप बिहार से होकर दूसरे राज्यों के बाजारों तक भी जाती हैं।ऐसे में बिहार की चुनौती केवल राज्य के भीतर नशीले पदार्थों की बिक्री रोकना नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय और सीमापार तस्करी के नेटवर्क पर कार्रवाई करना भी है।
शराबबंदी के बाद नशे के दूसरे बाजार का विस्तार?
बिहार में 5 अप्रैल 2016 को पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी। इसके बाद पुलिस ने अवैध शराब की तस्करी रोकने के लिए बड़े स्तर पर कार्रवाई की।The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, शराबबंदी के लगभग दस वर्षों में पुलिस ने करीब 3.16 करोड़ लीटर शराब जब्त की और शराब से जुड़े मामलों में लगभग 7.15 लाख गिरफ्तारियां कीं।
हालांकि, रिपोर्ट में पुलिस अधिकारियों और डॉक्टरों के हवाले से बताया गया है कि शराब की उपलब्धता कम होने के बावजूद नशे की मांग पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। इसी बीच नशीले पदार्थों के एक अलग बाजार के विस्तार की चिंता सामने आई है।एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, अवैध शराब की ऊंची कीमतों की तुलना में कुछ नशीले पदार्थ कम मात्रा में बेचे जाते हैं और उनका प्रभाव अधिक समय तक रह सकता है। हालांकि, नशे के अलग-अलग पदार्थों की कीमत, प्रभाव और जोखिम अलग होते हैं।यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उपलब्ध आंकड़े अपने आप यह साबित नहीं करते कि शराबबंदी ही नशीले पदार्थों के बढ़ते कारोबार का एकमात्र कारण है।
कोरोना काल के बाद ग्रामीण इलाकों तक पहुंचने की चिंता
रिपोर्ट में पुलिस अधिकारियों और डॉक्टरों ने कोरोना महामारी के दौरान हुए रिवर्स माइग्रेशन को भी नशे के बाजार में बदलाव से जोड़कर देखा है।महामारी के दौरान पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-NCR, मुंबई और गुजरात जैसे क्षेत्रों से कई मजदूर और औद्योगिक कर्मचारी अपने घर लौटे थे। अधिकारियों के अनुसार, कुछ लोग दूसरे राज्यों में रहते हुए नशीले पदार्थों के संपर्क में आए थे और उनके साथ कुछ संपर्क तथा आदतें भी वापस आईं।रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि गांजा और अफीम जैसे पदार्थों के साथ अब अर्ध-सिंथेटिक और सिंथेटिक ड्रग्स को लेकर भी चिंता बढ़ी है।
हालांकि, इस बदलाव की वास्तविक सीमा समझने के लिए विस्तृत सर्वेक्षण और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों की जरूरत है।
2026 में STF ने जब्त किए करोड़ों रुपये के ड्रग्स
बिहार पुलिस ने नशीले पदार्थों की तस्करी से निपटने के लिए विशेष कार्रवाई भी शुरू की है। रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) में अप्रैल 2025 में नारकोटिक्स सेल गठित किया गया था।इस सेल ने 10 अक्टूबर तक करीब 52.32 करोड़ रुपये मूल्य के नशीले पदार्थ जब्त किए और 315 लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें से 25.58 करोड़ रुपये मूल्य के पदार्थों की जब्ती 2026 में हुई बताई गई है।
इसके अलावा, सितंबर 2025 में राज्य सरकार ने Prohibition and State Narcotics Control Bureau की स्थापना की। इसमें एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स (ANTF) और पुलिस के मौजूदा मद्यनिषेध विभाग को मिलाया गया।इन कदमों का उद्देश्य नशीले पदार्थों की तस्करी के नेटवर्क पर कार्रवाई और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बेहतर करना है।
नशे की लत से जूझ रहे लोगों की संख्या भी बढ़ी
इस संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू नशे की लत का इलाज है। रिपोर्ट में संसद में 10 मार्च 2026 को दिए गए एक जवाब का हवाला देते हुए बताया गया है कि बिहार में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से सहायता प्राप्त नशामुक्ति केंद्रों में इलाज या सहायता लेने वाले लाभार्थियों की संख्या 2022-23 में 1,487 थी, जो 2024-25 में बढ़कर 29,429 हो गई।यह लगभग 20 गुना वृद्धि है। हालांकि, यह आंकड़ा संबंधित केंद्रों के लाभार्थियों का है; इसे बिहार में नशे की लत से प्रभावित सभी लोगों की कुल संख्या नहीं माना जा सकता।
पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) के मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. राजेश कुमार ने रिपोर्ट में कहा कि मरीजों में नशे के इस्तेमाल का स्वरूप भी बदल रहा है। उनके मुताबिक, पहले गांजा और अन्य वनस्पति आधारित पदार्थों पर निर्भरता अधिक देखने को मिलती थी, जबकि अब हेरोइन और दूसरे अर्ध-सिंथेटिक तथा सिंथेटिक पदार्थों से जुड़ी समस्याएं भी सामने आ रही हैं।
किशोरों में नशे और अपराध को लेकर चिंता
रिपोर्ट में दिए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2016 से 2023 के बीच NDPS Act के तहत 11 किशोरों को हिरासत में लिया गया था। वहीं, 2024 में यह संख्या 50 दर्ज की गई।इस आंकड़े को लेकर पुलिस को चिंता है कि नशीले पदार्थों की उपलब्धता किशोरों को भी प्रभावित कर सकती है। हालांकि, केवल हिरासत के आंकड़ों के आधार पर किशोरों में नशे की लत या अपराध की पूरी तस्वीर नहीं मिलती।इस चुनौती से निपटने के लिए कानून लागू करने के साथ-साथ परिवारों, स्कूलों, स्थानीय समुदायों और स्वास्थ्य सेवाओं की भागीदारी भी जरूरी है।
नशे के खिलाफ सिर्फ पुलिस कार्रवाई काफी नहीं
बिहार पुलिस की स्पेशल ब्रांच और ऑपरेशंस के महानिदेशक कुंदन कृष्णन ने रिपोर्ट में कहा कि नशीले पदार्थों के खिलाफ केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। उनके मुताबिक, समाज और समुदाय की भागीदारी के साथ ही नशे के खिलाफ प्रभावी प्रतिरोध तैयार किया जा सकता है।नशे की समस्या से निपटने के लिए तस्करी पर कार्रवाई के साथ सुलभ नशामुक्ति केंद्र, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं, जागरूकता अभियान और प्रभावित परिवारों को सहायता उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार के नशा मुक्त भारत अभियान के तहत 2029 को लक्ष्य वर्ष मानकर अभियान चलाने की घोषणा भी की गई है।
कुल मिलाकर, बिहार में बढ़ती नशीले पदार्थों की जब्ती, NDPS मामलों में वृद्धि और नशामुक्ति केंद्रों के बढ़ते लाभार्थी एक गंभीर सार्वजनिक चुनौती की ओर संकेत करते हैं। इसका प्रभावी समाधान तस्करी रोकने, सीमापार और अंतरराज्यीय नेटवर्क पर कार्रवाई करने, युवाओं को जागरूक बनाने और नशे की लत से जूझ रहे लोगों को इलाज उपलब्ध कराने के संयुक्त प्रयासों से ही संभव होगा।