Supreme Court Verdict: इस्लाम अपनाने से अपने आप नहीं मिलेगा मुस्लिम आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

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Supreme Court Verdict: Converting to Islam does not automatically grant eligibility for Muslim reservation; Supreme Court delivers a major ruling.

BNT Desk : सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में मुस्लिम आरक्षण से जुड़े एक अहम मामले में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने मात्र से कोई व्यक्ति राज्य की अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम (Backward Class Muslim) श्रेणी में अपने आप शामिल नहीं हो जाता। इसके लिए संबंधित मुस्लिम समुदाय की सदस्यता निर्धारित नियमों के अनुसार साबित करनी होगी। इस फैसले से तमिलनाडु सरकार को झटका लगा है, क्योंकि राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

यह मामला उन लोगों से जुड़ा था, जिन्होंने हिंदू धर्म की पिछड़ी जातियों या अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाया और इसके बाद तमिलनाडु की पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ लेने की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के 25 जून 2026 के फैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसके तहत पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदाय (DNC) और अनुसूचित जाति (SC) से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को निर्धारित मुस्लिम समुदायों की श्रेणी में प्रमाणपत्र प्राप्त कर आरक्षण का लाभ लेने की अनुमति देने का प्रयास किया गया था।

अदालत के फैसले का मुख्य आधार यह है कि केवल धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति को राज्य की अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग श्रेणी की सदस्यता स्वतः नहीं मिल जाती। संबंधित समुदाय की सदस्यता और आरक्षण की पात्रता लागू नियमों के अनुसार तय होगी।

तमिलनाडु में मुस्लिम आरक्षण की व्यवस्था क्या है?

तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदायों के लिए राज्य की आरक्षण व्यवस्था के तहत अलग से 3.5 प्रतिशत उप-कोटा निर्धारित है। यह व्यवस्था सात अधिसूचित मुस्लिम समुदायों पर लागू होती है।

इन समुदायों में अंसार, डेक्कनी मुस्लिम, दुबेकुला, लब्बाई (रोथर और मरकयार सहित), मापिला, शेख और सैयद शामिल हैं।

इस मामले में विवाद इस बात पर था कि क्या किसी हिंदू पिछड़ी जाति या अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को केवल उसकी पूर्व जातिगत पहचान के आधार पर इन अधिसूचित मुस्लिम समुदायों में शामिल माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन अपने आप किसी विशिष्ट अधिसूचित मुस्लिम समुदाय की सदस्यता का प्रमाण नहीं है।

तमिलनाडु सरकार ने क्या तर्क दिया था?

तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक सरकारी आदेश जारी किया था। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित होने से बचाना बताया गया था, जो पहले पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय या अनुसूचित जाति से संबंधित थे और बाद में इस्लाम अपना चुके थे।

सरकार का तर्क था कि धर्म परिवर्तन के कारण पहले से आरक्षण के पात्र रहे लोगों को मिलने वाले लाभ समाप्त नहीं होने चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्हें सात अधिसूचित मुस्लिम समुदायों में से किसी एक के तहत सामुदायिक प्रमाणपत्र प्राप्त करने की अनुमति देने का प्रावधान किया गया था।

हालांकि, मद्रास हाई कोर्ट ने इस व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। अदालत का मानना था कि सरकार केवल कार्यकारी आदेश के माध्यम से सामुदायिक सदस्यता और आरक्षण से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों को बदल नहीं सकती। इसके बाद राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

कैसे शुरू हुआ था यह पूरा मामला?

यह विवाद समीर अहमद की याचिका से शुरू हुआ था, जिन्हें पहले परमासिवम के नाम से जाना जाता था। उन्होंने 2015 में इस्लाम अपनाया था। इसके बाद उन्होंने आरक्षण का लाभ लेने के लिए खुद को मुस्लिम लब्बाई समुदाय का सदस्य बताते हुए सामुदायिक प्रमाणपत्र मांगा।

राजस्व अधिकारियों ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया। मामले की सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार का 2024 का आदेश भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया।

हाई कोर्ट ने अंततः सरकारी आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा गया।

धर्म परिवर्तन और आरक्षण पर क्या असर पड़ेगा?

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि तमिलनाडु की अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में आरक्षण पाने के लिए केवल इस्लाम अपनाना पर्याप्त नहीं है। संबंधित व्यक्ति को निर्धारित समुदाय की सदस्यता और लागू पात्रता संबंधी शर्तों को पूरा करना होगा।

हालांकि, इस फैसले को सभी राज्यों की आरक्षण व्यवस्था पर एक समान नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आरक्षण की पात्रता संबंधित राज्य के कानूनों, अधिसूचनाओं और लागू संवैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करती है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने से तमिलनाडु सरकार के 2024 के आदेश के तहत धर्म परिवर्तन करने वालों को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग श्रेणी में शामिल करने का रास्ता सीमित हो गया है। इस मामले ने एक बार फिर धर्म परिवर्तन, सामुदायिक पहचान और आरक्षण की कानूनी पात्रता को लेकर बहस को केंद्र में ला दिया है।

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