Jantar Mantar History: जंतर-मंतर अब बना इतिहास का हिस्सा? किसान आंदोलन से अन्ना हजारे के अनशन तक, जानें पूरी कहानी

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History of Jantar Mantar: Has Jantar Mantar now become a part of history? From the farmers' protest to Anna Hazare's hunger strike—know the full story.

BNT Desk : दिल्ली का जंतर-मंतर लंबे समय तक देश में विरोध प्रदर्शनों की पहचान रहा है। यहां किसानों ने अपनी मांगें उठाईं, अन्ना हजारे के आंदोलन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी बहस छेड़ी और पहलवानों ने न्याय की मांग को लेकर धरना दिया। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध से लेकर हालिया राजनीतिक प्रदर्शनों तक, इस जगह ने कई महत्वपूर्ण घटनाएं देखीं। अब इसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने की खबर ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जंतर-मंतर विरोध की आवाज का इतना बड़ा केंद्र कैसे बना और यहां किन आंदोलनों ने देश का ध्यान खींचा?

बोट क्लब से जंतर-मंतर तक कैसे पहुंची विरोध की आवाज?

दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों का इतिहास जंतर-मंतर से पहले भी रहा है। वर्ष 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बड़ी संख्या में किसानों ने दिल्ली के बोट क्लब इलाके में प्रदर्शन किया था। इस आंदोलन में किसानों की मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बना और प्रदर्शन स्थल के इस्तेमाल को लेकर नई बहस शुरू हुई।इसके बाद बोट क्लब क्षेत्र में बड़े प्रदर्शनों पर सख्ती बढ़ने के साथ ही प्रदर्शनकारियों को वैकल्पिक जगहों की जरूरत महसूस हुई। संसद और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालयों के नजदीक स्थित जंतर-मंतर धीरे-धीरे धरने, भूख हड़ताल और जन आंदोलनों का अहम केंद्र बन गया।

18वीं सदी में खगोलीय गणनाओं के लिए हुआ था निर्माण

जंतर-मंतर का मूल उद्देश्य राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि खगोलीय अध्ययन था। जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 18वीं सदी में खगोलीय गणनाओं और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए इसका निर्माण कराया था। समय के साथ इस ऐतिहासिक परिसर के आसपास का क्षेत्र सार्वजनिक विरोध और राजनीतिक गतिविधियों के लिए पहचाना जाने लगा। संसद और सरकारी संस्थानों के नजदीक होने के कारण यहां प्रदर्शन करने वालों को अपनी मांगें सरकार और मीडिया तक पहुंचाने का अवसर मिलता था। इसी वजह से जंतर-मंतर ने धीरे-धीरे देश के प्रमुख धरना स्थलों में अपनी जगह बना ली।

अन्ना हजारे के आंदोलन से मिली राष्ट्रीय पहचान

जंतर-मंतर के इतिहास में 5 अप्रैल 2011 का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ और जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर यहां भूख हड़ताल शुरू की थी। धीरे-धीरे इस आंदोलन को देशभर में समर्थन मिलने लगा और भ्रष्टाचार का मुद्दा राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया। इस आंदोलन से अरविंद केजरीवाल समेत कई सामाजिक कार्यकर्ता जुड़े। आगे चलकर इस आंदोलन से निकले राजनीतिक घटनाक्रम ने आम आदमी पार्टी के गठन का रास्ता भी तैयार किया। जंतर-मंतर की पहचान एक ऐसे स्थल के रूप में मजबूत हुई, जहां से उठी आवाज देशव्यापी आंदोलन का रूप ले सकती थी।

निर्भया कांड से CAA विरोध तक, कई मुद्दों पर उठी आवाज

जंतर-मंतर केवल राजनीतिक दलों के प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रहा। दिसंबर 2012 में दिल्ली में निर्भया सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद यहां न्याय और महिला सुरक्षा की मांग को लेकर प्रदर्शन हुए। वर्ष 2014 में अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया की मौत के बाद भी यहां विरोध दर्ज कराया गया। इन घटनाओं ने महिला सुरक्षा, नस्लीय भेदभाव और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर देश का ध्यान खींचा।मार्च और अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने कर्ज माफी, सूखा राहत और कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग को लेकर लगभग 40 दिनों तक धरना दिया। किसानों ने अपनी समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए अनोखे तरीके अपनाए, जिनकी देशभर में चर्चा हुई।

दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ भी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुए। इस तरह यह जगह अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर विरोध दर्ज कराने का महत्वपूर्ण केंद्र बनी रही।

पहलवानों के धरने ने फिर खींचा देश का ध्यान

अप्रैल 2023 में जंतर-मंतर पर भारतीय कुश्ती जगत से जुड़े बड़े प्रदर्शन ने देशभर में सुर्खियां बटोरीं। ओलंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक, विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया समेत कई पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर धरना दिया था।पहलवानों ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। इस प्रदर्शन ने खेल प्रशासन, खिलाड़ियों की सुरक्षा और शिकायतों पर कार्रवाई जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।

2026 में कॉकक्रोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े प्रदर्शनों के कारण भी जंतर-मंतर चर्चा में रहा। पार्टी ने परीक्षा संबंधी कथित अनियमितताओं को लेकर प्रदर्शन किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई। बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के विरोध में भी प्रदर्शन की कोशिश हुई। इन मामलों में लगाए गए आरोपों को संबंधित पक्षों के बयानों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर समझना जरूरी है।

अब दिल्ली में कहां कर सकेंगे प्रदर्शन?

दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया। दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार की ओर से जारी आदेश के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर अब तीन अन्य स्थानों को प्रदर्शन के लिए निर्धारित किया गया है। क्या जंतर-मंतर की कहानी यहीं खत्म हो गई?जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने का अर्थ यह है कि अब वहां पहले की तरह आधिकारिक रूप से निर्धारित स्थल पर प्रदर्शन आयोजित नहीं किए जा सकेंगे। हालांकि, इस फैसले के बाद भी जंतर-मंतर का ऐतिहासिक महत्व बना रहेगा।

करीब तीन दशकों तक यह जगह किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, खिलाड़ियों और राजनीतिक संगठनों की आवाज का प्रमुख केंद्र रही। अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो या पहलवानों का धरना, जंतर-मंतर ने ऐसे कई प्रदर्शनों को जगह दी जिन्होंने देश की राजनीति और समाज में व्यापक चर्चा पैदा की।

अब प्रदर्शन के लिए नए स्थान निर्धारित किए गए हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई व्यवस्था के तहत प्रदर्शनकारियों को अपनी मांगें उठाने के कितने अवसर मिलते हैं और इन स्थलों पर अनुमति तथा आयोजन से जुड़े नियम किस तरह लागू होते हैं।

जंतर-मंतर की पहचान केवल एक प्रदर्शन स्थल की नहीं रही, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक भी बना जिसमें लोग अपनी मांगों और असहमति को सार्वजनिक रूप से सामने रखते हैं। इसकी भूमिका में बदलाव जरूर आया है, लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व कायम रहेगा।

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