बिहार: विश्वविद्यालय और कॉलेज कर्मचारियों का कैडर एक करने का प्रस्ताव, 25 हजार कर्मियों के प्रमोशन और ट्रांसफर पर पड़ेगा असर

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BNT Desk: बिहार में विश्वविद्यालयों और सरकारी कॉलेजों के शिक्षकेतर कर्मचारियों की सेवा व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी की जा रही है। प्रस्ताव के तहत विश्वविद्यालय मुख्यालय और सरकारी कॉलेजों में कार्यरत कर्मचारियों के कैडर को एक करने की योजना है। इस बदलाव से राज्य के करीब 25 हजार कर्मचारियों के प्रमोशन और ट्रांसफर की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इस प्रस्ताव को लेकर कर्मचारियों की सेवा शर्तों, वरिष्ठता, पदोन्नति और आरक्षण रोस्टर से जुड़े कई सवाल भी सामने आ रहे हैं।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, लोकभवन की ओर से बिहार के विश्वविद्यालयों और सरकारी महाविद्यालयों के शिक्षकेतर कर्मचारियों के कैडर को एक करने से संबंधित निर्देश भेजा गया है। इसके लिए पद सोपान से जुड़े परिनियम की धारा 10 में बदलाव की तैयारी की बात कही गई है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो विश्वविद्यालय मुख्यालय और पंजी विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों का तबादला कॉलेजों में तथा कॉलेजों में कार्यरत कर्मचारियों का तबादला विश्वविद्यालयों में किया जा सकेगा।

फिलहाल विश्वविद्यालय और कॉलेज कर्मचारियों की सेवा व्यवस्था अलग-अलग ढांचे के तहत संचालित होती है। ऐसे में दोनों कैडरों को एक करने के प्रस्ताव से प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव की संभावना है। हालांकि, इस प्रक्रिया को लागू करने से पहले वरिष्ठता, पदोन्नति और कर्मचारियों की मौजूदा सेवा शर्तों से जुड़े विषयों का समाधान करना महत्वपूर्ण होगा।

 

ट्रांसफर की व्यवस्था में हो सकता है बदलाव

प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने के बाद विश्वविद्यालय मुख्यालय और कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकेतर कर्मचारियों की तैनाती में अधिक बदलाव संभव हो सकता है। वर्तमान व्यवस्था में विश्वविद्यालय और कॉलेज कर्मचारियों के कार्यक्षेत्र तथा सेवा संरचना में अंतर है। कैडर एक होने की स्थिति में कर्मचारियों को जरूरत के अनुसार एक संस्थान से दूसरे संस्थान में स्थानांतरित करने की व्यवस्था बनाई जा सकती है।

इसका असर उन कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है, जो लंबे समय से एक ही संस्थान या विभाग में कार्यरत हैं। हालांकि, ट्रांसफर किस आधार पर होगा, कर्मचारियों की सहमति की क्या भूमिका होगी और उनकी वरिष्ठता किस प्रकार निर्धारित की जाएगी, इन सवालों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जरूरी होंगे। प्रस्ताव के समर्थक प्रशासनिक स्तर पर एक समान व्यवस्था की संभावना देख सकते हैं, लेकिन कर्मचारियों के लिए सेवा शर्तों की समानता सुनिश्चित करना इस प्रक्रिया की महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

 

प्रमोशन की व्यवस्था में सबसे बड़ी चुनौती

विश्वविद्यालय और कॉलेज कर्मचारियों के कैडर को एक करने के प्रस्ताव में पदोन्नति का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालयों में लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) के पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक बताई गई है, जबकि कॉलेजों में इसी पद के लिए इंटरमीडिएट की योग्यता का प्रावधान है। ऐसी स्थिति में दोनों कैडरों को एक करने पर समान पदों के लिए अलग-अलग शैक्षणिक योग्यताओं और सेवा शर्तों का अंतर दूर करना होगा। इसके साथ ही समान सेवा अवधि के बावजूद कर्मचारियों के वेतन और पदोन्नति के अवसरों में अंतर होने से भी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।

कॉलेजों में कर्मचारियों की अंतिम पदोन्नति सामान्य तौर पर हेड क्लर्क के पद तक होने की बात कही गई है। वहीं, विश्वविद्यालय कैडर में LDC से पदोन्नति के बाद कर्मचारी उप कुलसचिव तक पहुंच सकता है। ऐसे में दोनों व्यवस्थाओं को एक करने के बाद पदोन्नति की नई सीढ़ी निर्धारित करना प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

यदि विश्वविद्यालय कैडर के किसी कर्मचारी का तबादला कॉलेज में किया जाता है, तो उसकी पदोन्नति पर क्या असर पड़ेगा, यह भी एक अहम सवाल है। इसी तरह कॉलेज के कर्मचारियों को विश्वविद्यालय कैडर में शामिल किए जाने पर उनके लिए आगे बढ़ने के अवसर किस प्रकार तय होंगे, इस पर स्पष्ट नियम बनाने की जरूरत होगी।

 

आरक्षण रोस्टर को लेकर भी उठ सकते हैं सवाल

कैडर विलय की प्रक्रिया में आरक्षण रोस्टर का विषय भी महत्वपूर्ण है। वर्तमान व्यवस्था में विश्वविद्यालय मुख्यालय और प्रत्येक कॉलेज का आरक्षण रोस्टर अलग-अलग तैयार किया जाता है। दोनों कैडरों के एकीकरण के बाद एक संयुक्त आरक्षण रोस्टर तैयार करना कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर जटिल हो सकता है। ऐसे में यह तय करना होगा कि कर्मचारियों की नियुक्ति, पदोन्नति और वरिष्ठता के निर्धारण में मौजूदा आरक्षण रोस्टर की क्या भूमिका होगी। अलग-अलग संस्थानों में पहले से स्वीकृत पदों और रिक्तियों को किस प्रकार समायोजित किया जाएगा, इस पर भी स्पष्टता आवश्यक होगी। यदि एकीकृत व्यवस्था लागू होती है, तो आरक्षण से संबंधित नियमों के अनुरूप रोस्टर तैयार करना और कर्मचारियों के मौजूदा अधिकारों को ध्यान में रखना जरूरी होगा। इन पहलुओं पर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं होने की स्थिति में कर्मचारियों के बीच असमंजस पैदा हो सकता है।

 

किन विश्वविद्यालयों पर लागू नहीं होगा नया नियम?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था बिहार के सभी विश्वविद्यालयों पर लागू नहीं होगी। बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, नालंदा खुला विश्वविद्यालय और आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय को इस व्यवस्था से बाहर रखने की बात कही गई है। अन्य विश्वविद्यालयों में इस प्रस्ताव के लागू होने की स्थिति में शिक्षकेतर कर्मचारियों की सेवा व्यवस्था में बदलाव हो सकता है।

फिलहाल विश्वविद्यालयों के कर्मचारियों की व्यवस्था राज्य सचिवालय की तर्ज पर, जबकि कॉलेज कर्मचारियों की व्यवस्था कलेक्ट्रेट की तर्ज पर संचालित होने की बात कही गई है। दोनों व्यवस्थाओं का ढांचा अलग होने के कारण कैडर विलय के बाद एक समान सेवा संरचना तैयार करना महत्वपूर्ण होगा।

प्रस्ताव के तहत कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची भी एकीकृत किए जाने की बात सामने आई है। ऐसी स्थिति में यह तय करना होगा कि अलग-अलग संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों की सेवा अवधि और वर्तमान पद को किस आधार पर वरिष्ठता में शामिल किया जाएगा। साथ ही, पदोन्नति के लिए आवश्यक योग्यता और अनुभव के नियमों को भी स्पष्ट करना होगा।

 

कर्मचारी महासंघ ने जताया विरोध

कैडर एक करने के प्रस्ताव को लेकर कर्मचारी संगठनों की ओर से भी आपत्ति सामने आई है। बिहार राज्य विश्वविद्यालय कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष शंकर यादव ने इस पहल का विरोध करते हुए इसे कर्मचारियों को उलझाने की कोशिश बताया है। उन्होंने इस प्रस्ताव के खिलाफ कड़ा विरोध करने की बात कही है।

कर्मचारी संगठनों की मुख्य चिंता सेवा शर्तों, पदोन्नति के अवसरों, वरिष्ठता और ट्रांसफर की व्यवस्था को लेकर है। यदि दोनों कैडरों का विलय किया जाता है, तो कर्मचारियों के मौजूदा अधिकारों और भविष्य में मिलने वाले पदोन्नति के अवसरों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह महत्वपूर्ण विषय होगा। फिलहाल प्रस्ताव से संबंधित सभी नियमों और उसके कार्यान्वयन की विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है। ऐसे में कर्मचारियों की नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार और संबंधित प्रशासनिक अधिकारी कैडर विलय की प्रक्रिया को किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं।

 

करीब 25 हजार कर्मचारियों पर पड़ सकता है असर

विश्वविद्यालयों और सरकारी कॉलेजों के शिक्षकेतर कर्मचारियों का कैडर एक करने का प्रस्ताव लागू होने पर करीब 25 हजार कर्मचारियों की सेवा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसमें ट्रांसफर, पदोन्नति, वरिष्ठता और आरक्षण रोस्टर जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। इस बदलाव को लागू करने के लिए मौजूदा नियमों में संशोधन और दोनों कैडरों के बीच मौजूद अंतर को दूर करना आवश्यक होगा। फिलहाल प्रस्ताव के सामने आने के बाद प्रशासनिक स्तर पर इसकी प्रक्रिया और कर्मचारी संगठनों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण बनी हुई है।

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