साल था 1998-99। बिहार की राजनीति में झारखंड आंदोलन अपने चरम पर था। दक्षिण बिहार के जिले अलग राज्य की मांग को लेकर सड़कों पर थे। उसी दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने एक ऐसा बयान दिया, जो आज भी बिहार की राजनीति में याद किया जाता है —
“झारखंड बनेगा… तो मेरी लाश पर!”
पूरे देश में यह बयान चर्चा का विषय बन गया। किसी ने इसे लालू जी की जिद कहा, तो किसी ने बिहार के प्रति उनकी वफादारी। लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि अगस्त 2000 में संसद ने बिहार पुनर्गठन विधेयक पास कर दिया। और 15 नवंबर 2000 को — आदिवासी नायक बिरसा मुंडा की जन्मतिथि पर — झारखंड भारत का 28वां राज्य बन गया। लालू जी की जिद नहीं चली, इतिहास बन गया। बिहार का नक्शा हमेशा के लिए बदल गया — 18 जिले अलग हो गए, कोयला-लोहे की खदानें अलग हो गईं, और साथ ही अलग हो गईं संसद और विधानसभा की सीटें भी।
अब 26 साल बाद, बिहार और झारखंड एक बार फिर उसी बंटवारे वाली चर्चा के केंद्र में हैं — लेकिन इस बार जमीन का बंटवारा नहीं, बल्कि सीटों का नया गणित। और दिलचस्प बात यह है कि जो सीटें कभी लालू जी के विरोध के बावजूद बंटी थीं, आज वही सीटें फिर से बंटने जा रही हैं — इस बार परिसीमन के जरिए।
क्या है नया मामला
दैनिक भास्कर की आज की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने परिसीमन को लेकर एक नया वर्किंग पेपर तैयार किया है। इस ड्राफ्ट में बिहार की 10 बड़ी लोकसभा सीटों — पटना साहिब, पाटलिपुत्र, आरा, बेगूसराय, सारण, दरभंगा, मधुबनी, झंझारपुर और महाराजगंज जैसी सीटों — को तीन-तीन हिस्सों में बांटने की सिफारिश की गई है।
अगर यह मॉडल लागू होता है, तो बिहार की मौजूदा 40 लोकसभा सीटें बढ़कर 60 हो जाएंगी — यानी सीधे 20 सांसदों की बढ़ोतरी। और झारखंड की बात करें, तो वहां की राजमहल सीट को दो हिस्सों में, जबकि गिरिडीह, लोहरदगा और गोड्डा सीटों को तीन-तीन टुकड़ों में बांटा जाएगा। इससे झारखंड में 7 नई सीटें जुड़ेंगी और कुल सीटें 14 से बढ़कर 21 हो जाएंगी।
यह सिर्फ बिहार-झारखंड तक सीमित नहीं है। पूरे देश में 111 लोकसभा सीटों को तीन हिस्सों में बांटने का मॉडल तैयार किया गया है, जिससे देश में कुल 281 नई सीटें बढ़ेंगी — और लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर 824 हो जाएंगी।
अब सवाल उठता है कि आखिर यह पूरा मॉडल तैयार किसने और कैसे किया?
रिपोर्ट के मुताबिक, यह सिर्फ आबादी के आधार पर सीटें नहीं बांटी जा रहीं। इस मॉडल को बनाने के लिए 2009 से 2024 तक के लोकसभा चुनावों के मतदान प्रतिशत, सामाजिक समीकरणों और क्षेत्रीय भाषाई समूहों के रुझानों की बारीकी से स्टडी की गई है — ताकि परिसीमन के बाद किसी भी वर्ग की राजनीतिक हिस्सेदारी घटने का असंतोष न रहे। यानी सिर्फ जनसंख्या घनत्व ही नहीं, बल्कि संसदीय क्षेत्र का भौगोलिक आकार, शहरी आबादी का घनत्व, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या, भाषाई विविधता और मतदान केंद्रों की संख्या को भी आधार बनाया गया है।
और एक दिलचस्प बात — इस मॉडल को डिज़ाइन करने के पीछे मकसद उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर चल रहे विवाद को कम करना भी बताया जा रहा है, ताकि इसे सर्वसम्मति से सुलझाया जा सके।
एक और नाम जो इस रिपोर्ट में सामने आया है — आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य शमिका रवि। दिलचस्प यह है कि उनका सीधा जुड़ाव बिहार से है — उनके पिता का गांव बिहार के बेतिया जिले में है, जबकि उनके पिता अरुण रवि वर्तमान में पश्चिम बंगाल से राज्यसभा सांसद हैं।
अब आगे क्या
फिलहाल यह सिर्फ एक वर्किंग पेपर और ड्राफ्ट मॉडल है — संसद में अभी इस पर आम सहमति नहीं बन पाई है। लेकिन तकनीकी और गणितीय हल निकालने वाली परिषद की सक्रियता बता रही है कि आने वाले संसद के मानसून सत्र में इसे एक संशोधित विधेयक के रूप में सदन के पटल पर रखे जाने की पूरी संभावना है।
अगर ऐसा होता है, तो यह आज़ाद भारत के इतिहास में सबसे बड़ा परिसीमन बदलाव साबित हो सकता है — क्योंकि पिछली बार 1976 में परिसीमन पर रोक लगाई गई थी, ठीक इसलिए कि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को सीटों में नुकसान न हो। अब लगभग 50 साल बाद एक बार फिर सीटों के बंटवारे की तस्वीर बदलने वाली है — और संयोग देखिए, इस बदलाव के केंद्र में एक बार फिर बिहार और झारखंड हैं, वही दो राज्य जो 26 साल पहले खुद एक बड़े बंटवारे से गुजर चुके हैं।
तो एक तरफ 2000 में लालू जी की “मेरी लाश पर” वाली जिद के बावजूद बिहार का भूगोल बंटा था, तो आज 2026 में उसी बिहार और झारखंड की सियास ताकत यानी लोकसभा सीटें एक बार फिर बंटने की तैयारी में हैं। फर्क बस इतना है — इस बार जमीन नहीं बंटेगी, बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी बढ़ेगी। बिहार को 20 और झारखंड को 7 नए सांसद मिलने की उम्मीद है।