बांकीपुर विधानसभा: बिहार की वह सीट जिसने दिए दो मुख्यमंत्री, 30 साल से भाजपा का गढ़, अब प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी परीक्षा

BiharNewsAuthor
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बांकीपुर विधानसभा बिहार की सबसे चर्चित सीटों में से एक मानी जाती है। यह वही विधानसभा है जिसने बिहार को दो-दो मुख्यमंत्री दिए हैं। यह वही सीट है जहां कायस्थ (लाला) समाज का सबसे अधिक प्रभाव माना जाता है और यह वही सीट है जिस पर वर्ष 1995 से लेकर 2025 तक लगातार भाजपा का कब्जा रहा है।लेकिन अब इस सीट की तस्वीर बदल चुकी है। भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन के राज्यसभा जाने और पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह सीट खाली हो गई है। अब यहां उपचुनाव होना है और इसी वजह से बांकीपुर बिहार की सबसे हॉट सीट बन चुकी है इस चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है जन सुराज के सूत्रधार और कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने। प्रशांत किशोर ने इसी सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा का 30 साल पुराना किला टूटेगा या फिर एक बार फिर कमल खिलेगा?

आइए जानते हैं बांकीपुर विधानसभा का इतिहास, राजनीतिक सफर और जातीय समीकरण।

आज जिस सीट को बांकीपुर विधानसभा के नाम से जाना जाता है, उसे पहले पटना पश्चिमी (पटना वेस्ट) विधानसभा कहा जाता था। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद इसका नाम बदलकर बांकीपुर विधानसभा कर दिया गया आजादी के बाद पटना पश्चिमी के नाम से यहां 14 विधानसभा चुनाव हुए, जबकि परिसीमन के बाद बांकीपुर के नाम से अब तक 4 विधानसभा चुनाव कराए जा चुके हैं।जब यह सीट पटना पश्चिमी थी, तब यहां कांग्रेस तीन बार, वामपंथी दल दो बार, जनक्रांति दल एक बार, जनता दल एक बार और एक बार निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीत चुके हैं। भाजपा ने पटना पश्चिमी रहते हुए पांच बार जीत दर्ज की थी।वहीं परिसीमन के बाद जब यह सीट बांकीपुर बनी, तब से भाजपा लगातार चार चुनाव जीत चुकी है। यानी कुल मिलाकर भाजपा अब तक इस सीट पर 9 बार जीत दर्ज कर चुकी है।

वर्ष 1995 से लेकर 2025 तक इस सीट पर एक ही परिवार का दबदबा रहा।

1995, 2000, फरवरी 2005 और अक्टूबर 2005 के चुनाव में नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा विधायक बने। वर्ष 2006 में उनके निधन के बाद उपचुनाव हुआ और उनके बेटे नितिन नवीन पहली बार विधायक बने। इसके बाद 2010, 2015, 2020 और 2025 में लगातार जीतकर उन्होंने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया।नितिन नवीन को पहली बार चुनाव लड़वाने में सुशील कुमार मोदी और नीतीश कुमार की अहम भूमिका मानी जाती है। बताया जाता है कि उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के दोनों नेताओं से बेहद करीबी संबंध थे। इसी कारण उनके निधन के बाद नितिन नवीन को चुनाव मैदान में उतारने में दोनों नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में नितिन नवीन नीतीश सरकार में मंत्री भी बने।

साल 2022 में विधानसभा के भीतर नीतीश कुमार और नितिन नवीन के बीच तीखी बहस भी हुई थी। उस दौरान नीतीश कुमार ने कहा था कि जब तुम्हारे पिता की मृत्यु हुई थी, तब पटना में केवल 18 प्रतिशत मतदान हुआ था। उस समय हम लोगों ने तुम्हारे लिए काम किया था। तुम्हारे पिताजी से हमारा बहुत पुराना और आत्मीय संबंध था।बांकीपुर विधानसभा की सबसे बड़ी पहचान यह भी है कि इस सीट ने बिहार को दो मुख्यमंत्री दिए हैं। पहला नाम कृष्ण बल्लभ सहाय का है, जबकि दूसरे मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा इसी सीट से चुनकर आए थे। इसके अलावा जनसंघ के वरिष्ठ नेता ठाकुर प्रसाद भी इसी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में नितिन नवीन लगभग 50 हजार वोटों के बड़े अंतर से चुनाव जीते थे। बाद में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया और फिर राज्यसभा भेजा गया, जिसके बाद यह सीट रिक्त हो गई। अब इसी सीट पर उपचुनाव हो रहा है।

प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद मुकाबला बेहद रोचक हो गया है। भाजपा ने यहां से अभिषेक उर्फ बंटी को उम्मीदवार बनाया है, जिन्हें लंबे समय से नितिन नवीन का करीबी माना जाता है।वहीं राष्ट्रीय जनता दल ने एक बार फिर रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है। जनशक्ति जनता दल ने सामाजिक कार्यकर्ता वीणा मानवी को मैदान में उतारा है। इस सीट पर 30 जुलाई को मतदान होगा जबकि 3 अगस्त को मतगणना होगी।

अगर जातीय समीकरण की बात करें तो बांकीपुर विधानसभा लंबे समय से कायस्थ बहुल सीट मानी जाती है।

उपलब्ध चुनावी आकलनों के अनुसार यहां कायस्थ मतदाता लगभग 14 से 15 प्रतिशत हैं। यादव करीब 12 प्रतिशत, मुस्लिम 9 से 10 प्रतिशत, चंद्रवंशी और वैश्य लगभग 9-9 प्रतिशत, दलित और महादलित करीब 8 प्रतिशत, भूमिहार 7 से 8 प्रतिशत, ब्राह्मण 7 प्रतिशत, राजपूत 5 प्रतिशत, कुर्मी 5 प्रतिशत तथा कुशवाहा करीब 3 प्रतिशत मतदाता माने जाते हैं।यदि सवर्ण मतदाताओं की बात करें तो कायस्थ, ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत मिलाकर इनकी हिस्सेदारी लगभग 33 प्रतिशत मानी जाती है। वहीं गैर-यादव ओबीसी और दलित वर्ग का बड़ा हिस्सा भी परंपरागत रूप से एनडीए के साथ जुड़ा रहा है। यही सामाजिक समीकरण इस सीट को भाजपा का मजबूत गढ़ बनाता रहा है।

बांकीपुर विधानसभा पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है।

इस सीट से जनसंघ के वरिष्ठ नेता ठाकुर प्रसाद वर्ष 1977 में विधायक बने थे। इससे पहले 1963 में कृष्ण बल्लभ सहाय यहां से जीतकर मुख्यमंत्री बने थे। वर्ष 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा भी इसी सीट से जीतकर मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1972 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सचिव सुनील मुखर्जी भी इसी सीट से विधानसभा पहुंचे थे।

वर्ष 1995 में पहली बार भाजपा ने यहां जीत दर्ज की और उसके बाद से यह सीट लगातार भाजपा के कब्जे में बनी हुई है।

वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद इस सीट में कुर्मी, कोईरी और यादव मतदाताओं की संख्या बढ़ी, लेकिन सबसे बड़ा सामाजिक समूह आज भी कायस्थ समाज ही माना जाता है। यही कारण है कि इस सीट की राजनीतिक दिशा तय करने में कायस्थ समाज की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है।अगर पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2006 के उपचुनाव में केवल 18 प्रतिशत मतदान हुआ था। नितिन नवीन ने 82.31 प्रतिशत वोट हासिल कर कांग्रेस के अजय कुमार सिंह को हराया था

2010 के चुनाव में नितिन नवीन को 72.06 प्रतिशत वोट मिले और राजद के बिनोद श्रीवास्तव दूसरे स्थान पर रहे।

2015 में महागठबंधन होने के बावजूद नितिन नवीन ने 60.19 प्रतिशत वोट हासिल कर कांग्रेस के कुमार आशीष को हराया।

2020 में उन्हें 59.05 प्रतिशत वोट मिले जबकि कांग्रेस उम्मीदवार लव सिन्हा 31.3 प्रतिशत वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे।

2025 के विधानसभा चुनाव में नितिन नवीन को 63.24 प्रतिशत वोट मिले। राजद की रेखा कुमारी 30 प्रतिशत से कम वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहीं, जबकि जन सुराज की वंदना कुमारी लगभग 5 प्रतिशत वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।

2005 से लेकर 2025 तक हुए सभी विधानसभा चुनावों और उपचुनावों में भाजपा लगातार जीत दर्ज करती रही है। हालांकि राजद का लगभग 30 प्रतिशत का स्थायी वोट बैंक इस सीट पर माना जाता है, जिसमें मुस्लिम और यादव मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

अब पहली बार प्रशांत किशोर स्वयं चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। ऐसे में बांकीपुर का उपचुनाव भाजपा, राजद और जन सुराज के बीच त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प मुकाबला बन चुका है। आने वाले दिनों में यह चुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रहेगा, बल्कि इसे बिहार की भविष्य की राजनीति और विपक्ष की संभावनाओं की सबसे बड़ी परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।

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