बिहार की सियासत का बड़ा सवाल: क्या तेजस्वी यादव बिहार की राजनीति के नए ‘पप्पू’ बनने की राह पर हैं?

BiharNewsAuthor
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BNT Desk: भारतीय राजनीति में किसी भी नेता के करियर को खत्म करने का सबसे अचूक और घातक हथियार है—उसकी छवि को ‘अपरिपक्व’ या ‘पप्पू’ के रूप में पेश कर देना। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक हमला होता है जो नेता की नीतियों पर नहीं, बल्कि उसकी योग्यता (Credibility) पर सवाल खड़ा करता है।

2014 के बाद हमने देखा कि कैसे एक सुनियोजित अभियान के तहत राहुल गांधी के नाम के साथ ‘पप्पू’ शब्द चिपकाया गया। आज ठीक वही पैटर्न, वही स्क्रिप्ट और वही सियासी बिसात बिहार में तेजस्वी यादव के लिए बिछाई जा रही है। क्या तेजस्वी भी उसी जाल में फंस गए हैं? चलिए, तथ्यों के आईने में इसका विश्लेषण करते हैं।

विरासत, विदेश दौरे और ‘पार्ट-टाइम’ पॉलिटिक्स का ठप्पा

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के राजनीतिक सफर में कई हैरान करने वाली समानताएं हैं। दोनों को राजनीति ‘चांदी की चम्मच’ के साथ विरासत में मिली। दोनों युवा हैं और दोनों ही बीजेपी की ’24×7 सक्रिय राजनीति’ के निशाने पर रहते हैं।

राहुल गांधी की तरह तेजस्वी पर भी ‘पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स’ का आरोप लग रहा है। अक्सर देखा गया है कि जब बिहार में कोई बड़ा राजनीतिक संकट आता है या पार्टी को जमीन पर उनके नेतृत्व की जरूरत होती है, तेजस्वी रहस्यमयी तरीके से ‘गायब’ हो जाते हैं। बाद में पता चलता है कि वह विदेश में छुट्टियां मना रहे थे। बीजेपी इसी बात को मुद्दा बनाती है—”जो नेता जनता के दुख-दर्द में साथ न खड़ा हो, वो बिहार का भविष्य कैसे बदलेगा?”

नैरेटिव को मिलती सबसे बड़ी ‘खाद’

राजनीति में कोई भी नैरेटिव तब तक सच नहीं माना जाता, जब तक उसे चुनावी हार का साथ न मिले। राहुल गांधी की छवि भी तब तक नहीं सुधरी, जब तक उन्होंने जीत का स्वाद नहीं चखा। तेजस्वी के साथ भी यही हो रहा है।

2020 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री की कुर्सी के करीब पहुँचने वाले तेजस्वी के लिए 2025 का साल एक बुरे सपने जैसा रहा। राजद (RJD) का महज़ 25 सीटों पर सिमट जाना पार्टी के इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन है। जब आंकड़े गिरते हैं, तो नेता का कद अपने आप छोटा होने लगता है।

‘पनौती’ या ‘अनलकी चार्म’ का नया टैग?

तेजस्वी की साख को सबसे ज्यादा चोट उनकी हालिया चुनावी सक्रियता से पहुँची है। वह पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में विपक्षी गठबंधन (ममता बनर्जी, एम.के. स्टालिन और वाम दलों) के लिए प्रचार करने गए थे। विडंबना देखिए कि जिन राज्यों में तेजस्वी प्रचार करने पहुँचे, वहां उनकी सहयोगी पार्टियों को हार का सामना करना पड़ा।

सोशल मीडिया पर अब उन्हें ‘अनलकी चार्म’ कहा जा रहा है। विरोधियों का तंज सीधा है—”जो खुद अपनी नैया नहीं बचा पा रहा, वो दूसरों की कश्ती पार लगाने चला था।”

बीजेपी का सोशल मीडिया प्रहार और ‘पप्पू’ का सांचा

बीजेपी ने तेजस्वी की इस कमजोरी को भांप लिया है। सोशल मीडिया पर एक जबरदस्त कैंपेन चलाया जा रहा है ताकि तेजस्वी को ‘पप्पू’ के सांचे में फिट किया जा सके। बीजेपी बिहार के हालिया पोस्ट इसका प्रमाण हैं, जिसमें लिखा गया—‘मंजिल की तलाश में निकले थे हमसफर बनकर, मगर जहाँ-जहाँ गए, वहां की कश्ती ही डुबो आए’

यह केवल एक पोस्टर नहीं, बल्कि तेजस्वी की गंभीरता पर किया गया प्रहार है। बीजेपी का लक्ष्य यह संदेश देना है कि तेजस्वी के पास न तो अपने पिता लालू यादव जैसी सांगठनिक क्षमता है और न ही जनता से जुड़ाव।

ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स बनाम जमीनी संघर्ष

लालू प्रसाद यादव ने ज़मीन पर संघर्ष करके, धूल फांककर राजद को खड़ा किया था। उनके पास जनता की नब्ज पहचानने की कला थी। इसके विपरीत, तेजस्वी पर ‘ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स’ करने के आरोप लग रहे हैं। पुराने कार्यकर्ता भी अब दबी जुबान में कहने लगे हैं कि तेजस्वी आम जनता और कार्यकर्ताओं से कटे-कटे रहते हैं।

यदि तेजस्वी ने अपनी कार्यशैली और चुनावी स्ट्राइक रेट में जल्द सुधार नहीं किया, तो ‘पप्पू’ का यह टैग उनके राजनीतिक करियर पर हमेशा के लिए चिपक जाएगा। बिहार की जनता बदलाव तो चाहती है, लेकिन क्या वह अपना भविष्य एक ऐसे नेता को सौंपेगी जिसकी अपनी कश्ती डगमगा रही है?

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