शराबबंदी के 10 साल: तेजस्वी का नीतीश सरकार पर हमला, पूछा- 40 हजार करोड़ की अवैध अर्थव्यवस्था का दोषी कौन?

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BNT Desk: बिहार में अप्रैल 2016 में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू किया गया था। आज इस कानून को लागू हुए पूरे 10 साल बीत चुके हैं, लेकिन जमीन पर हकीकत दावों से कोसों दूर नजर आती है। हाल ही में मोतिहारी में जहरीली शराब से हुई 9 लोगों की मौत ने इस कानून की प्रभावशीलता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। इसी कड़ी में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया के जरिए नीतीश सरकार की घेराबंदी करते हुए इसे बिहार के इतिहास का सबसे बड़ा ‘सांस्थानिक भ्रष्टाचार’ बताया है।

“शराबबंदी नहीं, यह 40 हजार करोड़ का काला खेल है”

तेजस्वी यादव ने सीधे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सवाल पूछा है कि आखिर शराबबंदी की विफलता का असली दोषी कौन है? उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून ने बिहार में 40,000 करोड़ रुपये की एक अवैध समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है। तेजस्वी के अनुसार, शासन-प्रशासन और शराब माफिया के बीच एक ऐसा नापाक गठजोड़ बन चुका है, जिसने कानून के उद्देश्यों को पूरी तरह विफल कर दिया है।

“शराबबंदी नीतीश कुमार का सबसे बड़ा सांस्थानिक भ्रष्टाचार है। गृह विभाग और मद्य निषेध विभाग उन्हीं के पास रहे हैं, फिर भी शराब की तस्करी बेधड़क जारी है।” — तेजस्वी यादव (नेता प्रतिपक्ष)

आंकड़ों की जुबानी: 11 लाख केस और 16 लाख गिरफ्तारियां

शराबबंदी की सख्ती का अंदाजा सरकार द्वारा जारी आंकड़ों से लगाया जा सकता है, जिसे तेजस्वी ने ‘दिखावटी’ बताया है।

  • मुकदमे: पिछले 10 वर्षों में 11 लाख से अधिक केस दर्ज हुए।

  • गिरफ्तारियां: करीब 16 लाख लोगों को जेल भेजा गया।

  • जब्ती: अब तक 5 करोड़ लीटर से अधिक शराब बरामद की गई है।

  • 2026 का औसत: आंकड़ों के अनुसार, 2026 में प्रतिदिन औसतन 12,356 लीटर अवैध शराब पकड़ी जा रही है।

तेजस्वी का दावा है कि यह तो सिर्फ बरामदगी है, जबकि बिहार में प्रतिदिन शराब की वास्तविक खपत 1.70 लाख लीटर से भी अधिक है। बरामदगी में 18% का उछाल यह साबित करता है कि कानून के बावजूद शराब की आवक बढ़ रही है।

बिहार में नशे का बदलता स्वरूप: 40% बढ़ा अन्य नशा

शराबबंदी की विफलता का एक काला पहलू यह भी है कि राज्य में अन्य नशीले पदार्थों का कारोबार 40 प्रतिशत तक बढ़ गया है। तेजस्वी ने चिंता जताई कि शराब उपलब्ध न होने या महंगी होने के कारण राज्य का युवा वर्ग गांजा, ब्राउन शुगर और नशीली दवाओं की चपेट में आ रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर राज्य की सीमाएं सील हैं, तो करोड़ों लीटर शराब पैराशूट से तो नहीं गिरती? यह अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है।

ऐतिहासिक तुलना: 58 साल बनाम नीतीश के 10 साल

तेजस्वी यादव ने एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश करते हुए कहा कि 1947 से 2005 (58 वर्षों) के बीच बिहार में केवल 3000 शराब की दुकानें थीं। लेकिन नीतीश कुमार के 2005 से 2015 के शासनकाल में यह संख्या दोगुनी होकर 6000 के पार पहुँच गई। उन्होंने आरोप लगाया कि नीतीश कुमार ने पंचायतों और गांवों में दुकानें खुलवाकर पहले घर-घर शराब पहुँचाई और अब ‘सुधारक’ बनने का नाटक कर रहे हैं।

“गरीबों पर गाज, रसूखदारों को संरक्षण”

शराबबंदी कानून के कार्यान्वयन पर सबसे गंभीर आरोप यह लगा है कि इसकी मार केवल गरीबों, दलितों और पिछड़ों पर पड़ रही है।

  1. गरीबों का उत्पीड़न: 16 लाख गिरफ्तार लोगों में अधिकांश अति पिछड़े और दलित वर्ग के हैं।

  2. अफसरशाही पर नकेल नहीं: तेजस्वी ने सवाल किया कि इतने बड़े पैमाने पर तस्करी के बावजूद किसी बड़े SP या DSP पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

  3. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि पुलिस के कारण ही तस्करी बढ़ रही है और यह कानून भ्रष्टाचार का जरिया बन गया है।

क्या महज चुनावी मुद्दा है शराबबंदी?

बिहार में शराबबंदी कानून अब एक जटिल भूलभुलैया बन चुका है। जहाँ एक ओर सरकार इसे महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार का जरिया बताती है, वहीं विपक्ष इसे उगाही और भ्रष्टाचार का टूल बता रहा है। तेजस्वी यादव के इन तीखे सवालों ने आगामी चुनाव से पहले शराबबंदी को एक बार फिर से मुख्य राजनीतिक विमर्श में ला खड़ा किया है।

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