पटना हाईकोर्ट ने बस गोलीबारी मामले में दोषी को किया बरी, कहा- Common Intention व्यक्तिगत भागीदारी का सबूत नहीं

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BNT Desk: पटना हाईकोर्ट ने बस में गोलीबारी के मामले में दोषी ठहराए गए रंजीत महतो को बरी कर दिया। जस्टिस संजय कुमार सिंह और जस्टिस अंसुल की खंडपीठ ने कहा कि केवल सामूहिक आपराधिक मंशा यानी Common Intention के सिद्धांत के आधार पर किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती। इसके लिए आरोपी की व्यक्तिगत भागीदारी का भरोसेमंद और ठोस साक्ष्य होना जरूरी है। इस मामले में गोलीबारी के दौरान दो लोगों की मौत हुई थी, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए थे।

 

अरुणा देवी के बयान पर आधारित था अभियोजन का मामला

यह मामला मुख्य रूप से सूचक अरुणा देवी के बयान पर आधारित था। उन्होंने खुद को घटना की प्रत्यक्षदर्शी बताते हुए गोली चलाने वाले लोगों में रंजीत महतो की पहचान की थी। अभियोजन की ओर से उनकी गवाही को आरोपी के खिलाफ महत्वपूर्ण साक्ष्य के तौर पर पेश किया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने उनके बयान की बारीकी से जांच की और घटना के समय बस में उनकी मौजूदगी तथा हमलावरों को पहचानने के उनके अवसर को लेकर महत्वपूर्ण असंगतियां पाईं।

 

घायल प्रत्यक्षदर्शियों ने नहीं की आरोपी की पहचान

मामले में घायल हुए दो अन्य प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही भी कोर्ट के सामने रखी गई। इन दोनों गवाहों ने रंजीत महतो की पहचान गोली चलाने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं की। इनमें से एक घायल गवाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि गोली चलाने वाले व्यक्ति वे नहीं थे, जो कोर्ट में अभियुक्त के रूप में खड़े थे। इस गवाही से अभियोजन की ओर से की गई आरोपी की पहचान पर गंभीर सवाल खड़े हुए।

 

स्वतंत्र गवाहों से भी नहीं मिली पुष्टि

हाईकोर्ट ने पाया कि स्वतंत्र गवाहों से भी अभियोजन के मामले को जरूरी पुष्टि नहीं मिली। कोर्ट ने कहा कि जब मुख्य पहचानकर्ता गवाह का बयान इतना मजबूत नहीं हो कि उसके आधार पर सुरक्षित रूप से दोषसिद्धि की जा सके, तो आरोपी की पहचान के महत्वपूर्ण सवाल पर स्वतंत्र साक्ष्य से पुष्टि जरूरी हो जाती है। इस मामले में ऐसी पर्याप्त स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली।

 

धारा 34 के इस्तेमाल पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के इस्तेमाल को लेकर भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामूहिक आपराधिक मंशा का सिद्धांत किसी आरोपी की व्यक्तिगत भागीदारी के प्रमाण का विकल्प नहीं हो सकता। केवल यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि कई लोगों की एक जैसी आपराधिक मंशा थी।

 

साक्ष्य की कमी को पूरा नहीं कर सकती धारा 34

कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 34 का इस्तेमाल साक्ष्य में मौजूद कमी को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता। धारा 34 लागू करने से पहले अभियोजन को विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए यह स्थापित करना जरूरी है कि संबंधित आरोपी ने स्वयं आपराधिक कृत्य में भाग लिया था। व्यक्तिगत भूमिका साबित किए बिना केवल Common Intention के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

 

जांच में भी सामने आईं कई कमियां

हाईकोर्ट ने मामले की विवेचना में सामने आई कमियों पर भी विचार किया। कोर्ट ने पाया कि हत्या में इस्तेमाल किया गया हथियार बरामद नहीं हुआ था। इसके अलावा आरोपियों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए कोई Test Identification Parade यानी पहचान परेड भी नहीं कराई गई थी। ये कमियां भी मामले में आरोपी की पहचान और अभियोजन के दावे की जांच के दौरान महत्वपूर्ण रहीं।

 

पोस्टमार्टम के दौरान भी पहचान से जुड़ी कमी

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक के सामने मृतकों में से एक की पहचान स्थापित नहीं की गई थी। हाईकोर्ट ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि जांच में कमी होना अपने आप में किसी आरोपी को बरी करने का आधार नहीं होता। लेकिन जब जांच की कमियां अभियोजन के मामले को जोड़ने वाली जरूरी कड़ियों को स्थापित करने में बाधा बनती हैं, तब उनका महत्व बढ़ जाता है।

 

मुख्य प्रत्यक्षदर्शी की गवाही नहीं बनी सुरक्षित आधार

समस्त साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि मुख्य प्रत्यक्षदर्शी का बयान स्वतंत्र पुष्टि के अभाव में दोषसिद्धि का सुरक्षित आधार नहीं बन सकता। आरोपी की पहचान को लेकर गवाही में मौजूद असंगतियां, अन्य घायल गवाहों की ओर से पहचान नहीं किया जाना और स्वतंत्र साक्ष्य से पर्याप्त पुष्टि नहीं मिलना अभियोजन के मामले के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

 

दोषसिद्धि और सजा रद्द, आरोपी बरी

मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद पटना हाईकोर्ट ने रंजीत महतो की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया और उसे बरी कर दिया। कोर्ट ने दोहराया कि किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए उसकी व्यक्तिगत आपराधिक भागीदारी को विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना जरूरी है। केवल सामूहिक आपराधिक मंशा के सिद्धांत का सहारा लेकर अभियोजन के मामले में मौजूद महत्वपूर्ण कमियों को दूर नहीं किया जा सकता।

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