हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी: "पद स्वीकृत नहीं" का तर्क देकर कर्मचारियों का हक नहीं मार सकती सरकार, क्लर्क-सह-पुस्तकालयाध्यक्ष के पक्ष में सुनाया फैसला

पटना हाईकोर्ट ने दशकों की सेवा के बाद क्लर्क-सह-पुस्तकालयाध्यक्ष को नियमित करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने सरकार के 'गैर-स्वीकृत पद' वाले तर्क को तकनीकी आधार बताकर खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिग्रहण के समय कार्यरत कर्मियों को लाभ मिलना चाहिए और तीन माह में बकाया वेतन व पेंशन देने का निर्देश दिया।

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BNT Desk: पटना हाईकोर्ट ने हाल ही में कर्मचारी अधिकारों की रक्षा करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि दशकों तक सेवा लेने के बाद सरकार तकनीकी आधारों पर किसी कर्मचारी को नियमित करने से मना नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति अजीत कुमार की एकलपीठ ने क्लर्क-सह-पुस्तकालयाध्यक्ष सुनील कुमार की सेवा को नियमित करने का आदेश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि: 1982 से दे रहे थे सेवा

याचिकाकर्ता सुनील कुमार की नियुक्ति वर्ष 1982 में विधिवत तरीके से हुई थी। तब से वे लगातार अपने पद पर कार्य कर रहे थे। महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 31 मार्च 1991 को उनके विद्यालय का सरकारी अधिग्रहण (Takeover) किया गया। 15 मार्च 1997 की एक आधिकारिक निरीक्षण रिपोर्ट ने भी पुष्टि की थी कि अधिग्रहण के समय वे कार्यरत थे।

कानूनी तर्क: टेकओवर एक्ट और समानता का अधिकार

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ललन कुमार ने दलील दी कि ‘बिहार गैर-सरकारी माध्यमिक विद्यालय (नियंत्रण ग्रहण) अधिनियम, 1981’ के तहत, अधिग्रहण की तिथि पर कार्यरत सभी कर्मचारियों की सेवाएं स्वतः राज्य सरकार में समाहित मानी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब समान परिस्थितियों वाले अन्य कर्मचारियों को नियमित किया गया, तो सुनील कुमार को छोड़ना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।

सरकार का पक्ष: ‘गैर-स्वीकृत पद’ की दलील

राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि “क्लर्क-सह-पुस्तकालयाध्यक्ष” का पद सरकार की स्वीकृत सूची में नहीं था। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि यह नियुक्ति 1980 के सरकारी प्रतिबंध के बाद की गई थी, इसलिए इसे कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट की टिप्पणी: सेवा ली है तो अधिकार भी दें

अदालत ने सरकार के तर्कों को खारिज करते हुए बेहद अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा:

  1. दशकों की सेवा: यदि किसी कर्मचारी से दशकों तक काम लिया गया है, तो बाद में “पद स्वीकृत न होने” का तर्क केवल एक तकनीकी बहाना है।
  2. अधिकारों का संरक्षण: टेकओवर एक्ट का उद्देश्य कर्मचारियों को उनकी योग्यता के आधार पर समाहित करना है।
  3. वेतन का सिद्धांत: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कर्मचारी को कार्य करने से गलत तरीके से रोका गया हो, तो वहां ‘नो वर्क, नो पे’ (काम नहीं तो वेतन नहीं) का सिद्धांत लागू नहीं होगा।

अदालत का फैसला और निर्देश

पटना हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की सेवा को नियमित मानने और 29 अक्टूबर 2012 तक का बकाया वेतन (Arrears) और सभी पेंशन लाभ अगले तीन महीनों के भीतर देने का आदेश दिया है।

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