BNT Desk: बिहार की राजनीति और लोकतंत्र के इतिहास में 7 फरवरी की तारीख खास मानी जाती रही है। इसी दिन 1921 में बिहार की विधायी यात्रा की औपचारिक शुरुआत हुई थी। इसी ऐतिहासिक विरासत को याद करते हुए बिहार विधानसभा ने अपना 105वां स्थापना दिवस मनाया। सजावट के लिए कोलकाता से विशेष फूल मंगाए गए थे, जिससे पूरा परिसर आकर्षक दिख रहा था। यह दिन सिर्फ एक समारोह नहीं था, बल्कि लोकतंत्र, बहस की परंपरा और संविधान की ताकत का प्रतीक रहा।
पटना में भव्य समारोह आयोजित किया गया
पटना में इस मौके पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया था। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार की अगुवाई में समारोह की तैयारियां पहले ही पूरी कर ली गई थीं। कार्यक्रम में कई बड़े नेता शामिल हुए थे। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे थे। उनके साथ राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री और कई अन्य नेता भी शामिल हुए थे। सुरक्षा को लेकर प्रशासन ने कड़े इंतजाम किए थे।
1921 में शुरू हुई थी विधायी परंपरा
बिहार-ओडिशा प्रांत बनने के बाद अलग विधायी व्यवस्था की जरूरत महसूस की गई थी। वर्ष 1920 में विधानसभा भवन बनकर तैयार हुआ था। इसके बाद 7 फरवरी 1921 को इसी भवन में पहली बैठक आयोजित की गई थी। उस समय सर वाल्टर मोरे की अध्यक्षता में निर्वाचित प्रांतीय परिषद की पहली बैठक हुई थी। तभी से यह तारीख बिहार की लोकतांत्रिक पहचान के रूप में जानी जाने लगी।
डिजिटल पहल की भी हुई शुरुआत
इस स्थापना दिवस को आधुनिक रूप भी दिया गया था। ‘नेवा सेवा केंद्र’ की शुरुआत की गई थी, जिससे विधायकों को डिजिटल कामकाज में सुविधा मिलने की बात कही गई थी। साथ ही लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर विशेष व्याख्यान भी आयोजित किया गया था।
लोकतंत्र के सम्मान का दिन रहा
बजट सत्र के बीच मनाया गया यह स्थापना दिवस उत्सव और जिम्मेदारी दोनों का प्रतीक रहा। विधानसभा अध्यक्ष ने सभी दलों से अपील की थी कि इस दिन को राजनीति से ऊपर उठकर मनाया जाए, क्योंकि यह पूरे बिहार के लोकतंत्र का उत्सव माना गया था।