BNT Desk: बिहार की राजनीति में मोकामा के JDU विधायक अनंत सिंह के एक बयान को लेकर चर्चा तेज हो गई है। ‘छोटे सरकार’ के नाम से चर्चित अनंत सिंह ने दावा किया कि उन्होंने नीतीश कुमार के लिए अपने नौ लोगों की कुर्बानी दी थी। बयान सामने आने के बाद इसे लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। इसके बाद अनंत सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपने बयान का अर्थ स्पष्ट करने की कोशिश की।
अब इस बयान के साथ वर्ष 2004 में पटना जिले के बाढ़ अनुमंडल के लदमा गांव में हुई पुलिस मुठभेड़ का जिक्र भी सामने आ रहा है। उस मुठभेड़ में अनंत सिंह गिरोह के आठ सदस्य मारे गए थे। वहीं, मुठभेड़ के दौरान गोली लगने से एक एसटीएफ जवान की भी मौत हो गई थी। इस तरह उस घटना में कुल नौ लोगों की जान गई थी। हालांकि, पुलिस की ओर से मारे गए आठ लोगों की पहचान गिरोह के सदस्यों के रूप में की गई थी। अनंत सिंह के मौजूदा दावे और उस समय की पुलिस कार्रवाई के बीच संबंध को समझने के लिए उस घटना के घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है।
2 अगस्त 2004 को लदमा गांव में हुई थी मुठभेड़
घटना 2 अगस्त 2004 की है। उस दिन पटना जिले के बाढ़ अनुमंडल के लदमा गांव में एसटीएफ और पटना पुलिस की संयुक्त टीम की हथियारबंद अपराधियों से मुठभेड़ हुई थी। उस समय सामने आई पुलिस की जानकारी के मुताबिक, गांव में अपराधियों के किसी बड़ी वारदात की साजिश रचने की सूचना मिली थी। इसी सूचना के आधार पर पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त टीम ने इलाके में कार्रवाई की। बताया गया था कि पुलिस टीम के पहुंचने पर अपराधियों ने फायरिंग शुरू कर दी। इसके बाद पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की। दोनों पक्षों के बीच करीब छह घंटे तक मुठभेड़ चली। उस दौरान पुलिस की ओर से 50 से अधिक राउंड गोलियां चलाए जाने की जानकारी भी सामने आई थी।
मुठभेड़ समाप्त होने के बाद मौके से आठ अपराधियों के शव बरामद किए गए। पुलिस ने उनकी पहचान भीम सिंह, डेनी, चिंटू कुमार, गणेश कुमार, बाल्मीकि सिंह, सुनील कुमार, रजनीश और सुरेंद्र कहार उर्फ बिठ्ठल के रूप में की थी। उस समय पुलिस के अनुसार, इनमें से भीम सिंह, डेनी, चिंटू कुमार, गणेश कुमार और बाल्मीकि सिंह बाढ़ अनुमंडल के रहने वाले थे। सुनील कुमार और रजनीश लदमा गांव के निवासी थे, जबकि सुरेंद्र कहार उर्फ बिठ्ठल पटना का रहने वाला था। पुलिस ने बताया था कि इन लोगों के खिलाफ हत्या, अपहरण, डकैती, लूट और रंगदारी समेत कई आपराधिक मामले दर्ज थे।
मुठभेड़ में एसटीएफ जवान रघुवंश प्रताप सिंह की भी मौत
इस कार्रवाई के दौरान एसटीएफ के जवान रघुवंश प्रताप सिंह को भी गोली लगी थी। वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें इलाज के लिए पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।
एसटीएफ के तत्कालीन एसपी जेएस गंगवार ने उस समय बताया था कि रघुवंश प्रताप सिंह वैशाली जिले के बिदुपुर थाना क्षेत्र के खड़िका गांव के रहने वाले थे। इस घटना में उनकी मौत को पुलिस महकमे के लिए बड़ी क्षति माना गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय सरकार ने शहीद जवान के परिवार को 10 लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा की थी। इसके अलावा नियमानुसार अन्य मुआवजा और उनकी पत्नी को सरकारी नौकरी देने की बात भी कही गई थी।
छापेमारी में हथियार और कारतूस बरामद होने का दावा
मुठभेड़ के बाद पुलिस ने लदमा गांव में तलाशी अभियान चलाया था। उस समय एसटीएफ के तत्कालीन डीआईजी विनय कुमार सिंह ने बताया था कि अपराधी किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की तैयारी में थे। पुलिस ने इलाके में छापेमारी के दौरान पांच लोगों को गिरफ्तार भी किया था। उनकी पहचान बिमल महतो, गुड्डू राम, कुमार भैरव, नंदन कुमार और सुनील राम के रूप में बताई गई थी। पुलिस की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, तलाशी अभियान के दौरान चार सेमी ऑटोमेटिक राइफल, दो डबल बैरल बंदूक, दो देसी पिस्तौल, 70 खोखे और 25 जिंदा कारतूस बरामद किए गए थे।
इसी कार्रवाई के दौरान अनंत सिंह के दो मंजिला मकान में भी छापेमारी की गई थी। उस समय पुलिस ने मकान में एक सुरंग होने की बात कही थी। पुलिस के अनुसार, सुरंग में दो अपराधियों को पकड़ा गया था और वहां से हथियार भी बरामद किए गए थे। तत्कालीन एसटीएफ एसपी जेएस गंगवार ने दावा किया था कि मकान विशेष रूप से बनवाया गया था और अपराधी हथियार तथा गोला-बारूद छिपाने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे। पुलिस के मुताबिक, सुरंग आगे एक तालाब तक जाती थी।
उस समय पुलिस ने यह भी बताया था कि अनंत सिंह न्यायिक हिरासत में थे और उनके खिलाफ हत्या, अपहरण तथा लूट समेत कई आपराधिक मामले दर्ज थे। हालांकि, उस समय की पुलिस कार्रवाई और अधिकारियों के बयानों को उनके तत्कालीन दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
अनंत सिंह के बयान से फिर चर्चा में आई पुरानी घटना
अब अनंत सिंह के इस दावे के बाद 2004 की मुठभेड़ का घटनाक्रम फिर चर्चा में है कि उन्होंने नीतीश कुमार के लिए अपने नौ लोगों की कुर्बानी दी थी। उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार, उस मुठभेड़ में गिरोह के आठ सदस्य और एसटीएफ का एक जवान मारा गया था। यानी घटना में कुल नौ लोगों की मौत हुई थी, लेकिन पुलिस ने आठ मृतकों की पहचान अपराधियों के रूप में की थी और नौवें व्यक्ति की पहचान एसटीएफ जवान रघुवंश प्रताप सिंह के रूप में हुई थी।
उस समय बिहार में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं। नीतीश कुमार को लेकर अनंत सिंह ने अपने बयान में जो दावा किया है, उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनके कहे शब्दों का सही संदर्भ अलग विषय है। केवल उस मुठभेड़ में नौ लोगों की मौत होने से यह अपने आप साबित नहीं होता कि सभी नौ लोग अनंत सिंह के लोग थे या उनकी मौत नीतीश कुमार के लिए हुई थी। फिलहाल, अनंत सिंह के बयान और वर्ष 2004 की घटना के बीच संबंध को लेकर राजनीतिक चर्चा जारी है। इस मामले में उनके दावे और उस समय पुलिस की ओर से दर्ज घटनाक्रम को अलग-अलग समझना जरूरी है।