सोनपुर और पटना के आसपास के इलाकों में जमीन के नाम पर चल रहा एक बहुत बड़ा सिंडिकेट अब बेनकाब होने के कगार पर है। जिस खतरे को लेकर हम पिछले काफी समय से आगाह कर रहे थे, वह अब हकीकत बनकर हजारों निवेशकों के सामने खड़ा है। कथित ‘टाउनशिप’ और ‘स्मार्ट सिटी’ के नाम पर निवेश करने वाले लोग अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। न तो उन्हें जमीन का कब्जा मिल रहा है और न ही बिल्डर उनके पैसे वापस करने को तैयार हैं।
पड़ताल में चौंकाने वाला खुलासा: बिना नक्शा, बिना RERA सब ‘हवा’ में
हमारी पड़ताल में यह बात सामने आई कि सोनपुर के आसपास खेतों को काटकर जो बड़ी-बड़ी साइट्स बनाई गई हैं, उनमें से अधिकांश के पास RERA (Real Estate Regulatory Authority) का रजिस्ट्रेशन तक नहीं है। नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए, बिना किसी मास्टर प्लान या सरकारी अनुमति के, भू-माफियाओं ने किसानों से एग्रीमेंट किया और सीधे आम लोगों को प्लॉट बेचना शुरू कर दिया।
हैरानी की बात यह है कि इन प्रोजेक्ट्स के पास न तो ड्रेनेज की सुविधा है, न बिजली-पानी का कोई वैध प्लान। बस एक भव्य ‘प्रवेश द्वार’ (Main Gate) और कुछ सौ मीटर की कच्ची सड़क बनाकर यह आभास दिया गया कि यहाँ कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर की सिटी बसने वाली है।
एयरपोर्ट और फोरलेन का ‘मायाजाल’
इस पूरे फ्रॉड को हवा देने के लिए दो बड़े हथियारों का इस्तेमाल किया गया—पटना-छपरा फोरलेन और प्रस्तावित सोनपुर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट। बिल्डरों ने मार्केटिंग के दौरान दावे किए कि “यहीं पर एयरपोर्ट का टर्मिनल बनेगा” और “यहाँ से पटना मात्र 10 मिनट की दूरी पर होगा”।
शीतल ग्रीन सिटी, साई ग्रीन सिटी, द साई ग्रीन और ग्रीन पार्क जैसे आकर्षक नामों के पोस्टर टांग दिए गए। निवेशकों को यह सपना दिखाया गया कि आज वे जिस जमीन को कौड़ियों के भाव खरीद रहे हैं, एयरपोर्ट बनते ही उसकी कीमत सोने के समान हो जाएगी। लेकिन हकीकत यह है कि एक ही प्लॉट को कई ग्राहकों को दिखाकर उनसे पैसे ऐंठ लिए गए।
सरकार का ‘सैटेलाइट सिटी’ प्रोजेक्ट: खेल में आया नया मोड़
इस कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट दो दिन पहले आया, जब बिहार सरकार ने सोनपुर के 33 हजार एकड़ इलाके में एक भव्य सैटेलाइट सिटी बनाने की योजना का ऐलान किया। सरकार ने इस पूरे क्षेत्र को ‘Proposed Special Area’ घोषित कर दिया है।
अब सवाल यह उठता है कि जब सरकार ने अभी मास्टर प्लान तैयार किया ही नहीं है, तो निजी बिल्डरों ने किस आधार पर यहाँ टाउनशिप का नक्शा पास करने का दावा किया? सरकार के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि निजी बिल्डरों द्वारा बेचे जा रहे प्लॉट पूरी तरह से अनधिकृत हैं। सरकार की योजना आने के बाद अब यह पूरी जमीन ‘प्लानिंग जोन’ में है, जहाँ बिना सरकार की अनुमति के एक ईंट भी रखना गैरकानूनी होगा।
फंस गई जनता: गाढ़ी कमाई पर मंडराता संकट
जिन लोगों ने अपने जीवन की जमापूंजी, रिटायरमेंट का पैसा या गहने गिरवी रखकर यहाँ जमीन ली थी, उनकी स्थिति अब अत्यंत दयनीय है। सरकार ने इस क्षेत्र में वर्ष 2027 तक किसी भी प्रकार के निजी निर्माण और रजिस्ट्री पर लगभग रोक लगा दी है। ऐसे में निवेशकों के पास तीन बहुत ही मुश्किल रास्ते बचे हैं:
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लैंड पूलिंग और अनिश्चितता: अगर सरकार सैटेलाइट सिटी के लिए लैंड पूलिंग करती है, तो बिल्डर द्वारा दिया गया आपका प्लॉट गायब हो सकता है। सरकार आपको उस इलाके में कहीं और जमीन देगी, जो आपके खरीदे गए प्लॉट से छोटा या अलग लोकेशन पर हो सकता है।
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कानूनी पेचीदगियां: अधिकांश बिल्डर अब अपने दफ्तर बंद कर रहे हैं या फोन उठाना बंद कर चुके हैं। बिना RERA अप्रूवल वाले प्रोजेक्ट में कानूनी लड़ाई लड़ना एक अंतहीन प्रक्रिया है, जिसमें पैसा और समय दोनों बर्बाद होंगे।
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बुलडोजर का डर: यदि किसी ने अवैध रूप से निर्माण करने की कोशिश की, तो सरकार उसे कभी भी ढहा सकती है। चूंकि यह इलाका अब ‘स्पेशल एरिया’ है, यहाँ बिजली और पानी का कनेक्शन मिलना भी अब नामुमकिन होगा।
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सावधान रहने की जरूरत
सोनपुर में आज जो स्थिति है, वह एक बड़े रियल एस्टेट स्कैम की ओर इशारा कर रही है। यहाँ जमीन नहीं, बल्कि ‘हवाई सपने’ बेचे गए हैं। निवेशकों के लिए सबक यह है कि किसी भी चमक-धमक वाले गेट को देखकर निवेश न करें। कागजों की जांच, RERA अप्रूवल और सरकारी मास्टर प्लान की पुष्टि किए बिना पैसा लगाना अपनी मेहनत की कमाई को आग लगाने जैसा है।
सोनपुर की सच्चाई यही है—बेचने वाला मुनाफा कमाकर गायब है, और आम आदमी कानूनी भंवर में फंस चुका है।
रिपोर्ट: परमबीर सिंह