BNT Desk: बिहार का प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) इन दिनों अपनी चिकित्सा सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि एक गहरे प्रशासनिक और शैक्षणिक संकट के लिए सुर्खियों में है। एमबीबीएस (MBBS) और पीजी (PG) परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधली के गंभीर आरोपों ने संस्थान की साख पर बट्टा लगा दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जांच रिपोर्ट आने के बावजूद सच्चाई को सार्वजनिक करने के बजाय उसे ‘दफन’ करने की कोशिश क्यों हो रही है?
बंद लिफाफे में बंद है ‘सच’: रिपोर्ट सार्वजनिक करने से परहेज
परीक्षा में धांधली की शिकायतों के बाद शैक्षणिक संकाय के अध्यक्ष डॉ. ओम कुमार की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय जांच कमेटी बनाई गई थी। सूत्रों के अनुसार, कमेटी ने अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट संस्थान के निदेशक डॉ. बिंदे को सौंप दी है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इस रिपोर्ट को अब तक गोपनीय रखा गया है।
अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि रिपोर्ट में कई रसूखदार चेहरों और परीक्षा विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के संकेत मिले हैं। यही कारण है कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बजाय फाइलों में कैद है। क्या प्रशासन किसी बड़े ‘सिंडिकेट’ को बचाने की कोशिश कर रहा है?
परीक्षा रद्द होने के पीछे का ‘गड़बड़झाला’
जब संस्थान यह दावा कर रहा है कि सब कुछ सामान्य था, तो फिर 2nd Professional MBBS Exam 2023(H) को रद्द करने की नौबत क्यों आई?
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आरोप: परीक्षा के दौरान गोपनीयता की धज्जियां उड़ाई गईं।
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साजिश: कुछ चुनिंदा छात्रों को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए पेपर सिंडिकेट ने सिस्टम में सेंधमारी की।
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परिणाम: धांधली इतनी बड़े स्तर पर थी कि प्रशासन को फजीहत से बचने के लिए पूरी परीक्षा ही रद्द करनी पड़ी।
प्रशासनिक टीम में दरार: जिम्मेदारी लेने से कतरा रहे अधिकारी
IGIMS का संकट तब और गहरा गया जब नई डीन डॉ. नीरू गोयल ने प्रभार लेने के तुरंत बाद छुट्टी पर जाने का फैसला किया। उन्होंने मीडिया के किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया। वहीं, मीडिया प्रभारी डॉ. विभूति रंजन का फोन न उठाना प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी पर मुहर लगा रहा है।
दूसरी ओर, डॉ. प्रकाश दुबे के इस्तीफे के बाद बनी नई टीम में भी सामंजस्य की कमी दिख रही है। हालांकि, नई सब-डीन डॉ. अंजू सिंह ने यह जरूर कहा है कि वे निदेशक के आदेशानुसार पदभार ग्रहण करेंगी, लेकिन तनाव साफ देखा जा सकता है।
कुर्सी-हिलाओ अभियान: ट्रांसफर की तैयारी
जांच रिपोर्ट के आने के बाद अब परीक्षा विभाग में बड़े बदलाव की चर्चा है। खबर है कि कई क्लर्क और अफसरों को इधर से उधर किया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि यह ‘कुर्सी-हिलाओ अभियान’ केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए है, ताकि मूल मुद्दे यानी ‘पेपर लीक के असली मास्टरमाइंड’ से ध्यान भटकाया जा सके।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से हस्तक्षेप की मांग
संस्थान की हालत यह है कि खुद निदेशक भी कथित तौर पर एक अन्य जांच के घेरे में बताए जा रहे हैं। ऐसे में संस्थान की आंतरिक जांच कितनी निष्पक्ष होगी, इस पर सवाल उठना लाजिमी है। अब सबकी निगाहें बिहार के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य विभाग की कमान संभाल रहे सम्राट चौधरी पर टिकी हैं।
छात्रों और चिकित्सा जगत के जानकारों का कहना है कि अगर इस मेडिकल स्कैंडल की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो आने वाले समय में डॉक्टरों की योग्यता और मरीजों की जान, दोनों खतरे में पड़ सकते हैं।
निष्कर्ष: सिस्टम पर उठते तीखे सवाल
IGIMS में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ एक परीक्षा रद्द होने का मामला नहीं है। यह बिहार की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में गहरे तक पैठ बना चुके भ्रष्टाचार का संकेत है। आखिर वह कौन सी ताकत है जो रिपोर्ट को बाहर नहीं आने दे रही? क्या रसूखदार चेहरों को बचाने के लिए हजारों योग्य छात्रों के भविष्य से समझौता किया जाएगा? सन्नाटा जितना गहरा है, राज उतने ही बड़े लग रहे हैं।