पहली बार भारत ने दूसरे देश के साथ भेजा संयुक्त प्रस्ताव
संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, भारत ने पहली बार किसी दूसरे देश के साथ मिलकर बहुराष्ट्रीय नामांकन प्रस्तुत किया है। भारत और मॉरीशस ने छठ महापर्व को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कराने के लिए दिसंबर में संयुक्त प्रस्ताव भेजा था। जरूरी दस्तावेज पूरे होने के बाद मार्च में यूनेस्को सचिवालय ने इसे स्वीकार कर लिया। इससे पहले भारत की ओर से दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कराया गया था। हालांकि, पिछले नामांकन चक्र में भारत के प्रस्ताव पर विचार हो चुका है। ऐसे में नियमों के तहत इस बार छठ महापर्व के प्रस्ताव पर फैसला नहीं हो सकेगा। इसे अगले साल दिसंबर में होने वाली बैठक में विचार के लिए रखा जा सकता है।
छठ की परंपरा और प्रकृति से जुड़ा संदेश
छठ महापर्व भगवान सूर्य और छठी मइया की उपासना का पर्व है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में इसकी विशेष महत्ता है। इस पर्व में श्रद्धालु सूर्य को अर्घ्य देकर प्रकृति, जल और जीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। इसकी परंपराओं में स्वच्छता, अनुशासन और सामूहिक भागीदारी का विशेष महत्व है। भारत के अलावा मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, संयुक्त अरब अमीरात और नीदरलैंड जैसे देशों में भी भारतीय मूल के लोग छठ श्रद्धा के साथ मनाते हैं। विदेशों में बसे भारतीय समुदायों के लिए यह पर्व अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं से जुड़े रहने का माध्यम भी है। छठ की एक खास पहचान इसका प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ाव है। पर्व के दौरान जल, सूर्य और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान का संदेश दिया जाता है। इसकी परंपरा जाति, धर्म और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर सामूहिक भागीदारी और समानता की भावना को मजबूत करती है।
मॉरीशस से भारत का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ता
छठ महापर्व को लेकर भारत और मॉरीशस का संयुक्त प्रस्ताव दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी दर्शाता है। मॉरीशस की आबादी में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी हिस्सेदारी है। ब्रिटिश शासन के दौरान 1834 से 20वीं सदी की शुरुआत तक करीब पांच लाख भारतीय मजदूरों को गिरमिटिया श्रमिकों के रूप में मॉरीशस ले जाया गया था। इन श्रमिकों के साथ भारतीय परंपराएं, रीति-रिवाज और त्योहार भी मॉरीशस पहुंचे। समय के साथ छठ महापर्व वहां भारतीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। आज भी वहां श्रद्धालु पारंपरिक तरीके से छठ मनाते हैं। भारत और मॉरीशस का संयुक्त नामांकन इस बात को भी रेखांकित करता है कि छठ केवल एक क्षेत्र या देश तक सीमित परंपरा नहीं है, बल्कि प्रवासी भारतीय समुदायों के जरिए कई देशों में जीवित सांस्कृतिक विरासत है।
भारत की 16 अमूर्त सांस्कृतिक विरासतें सूची में शामिल
यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में अब तक भारत की 16 परंपराओं को जगह मिल चुकी है। इनमें कुंभ मेला, कोलकाता की दुर्गा पूजा, गरबा, योग, रामलीला, नवरोज और लद्दाख का बौद्ध मंत्रोच्चार जैसी सांस्कृतिक परंपराएं शामिल हैं। अगर छठ महापर्व को भी इस सूची में शामिल किया जाता है, तो यह बिहार की सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ भारत की विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। इससे छठ की परंपराओं, सामाजिक एकता और पर्यावरण के प्रति उसके संदेश को दुनिया के सामने रखने का अवसर मिलेगा। फिलहाल यूनेस्को सचिवालय द्वारा संयुक्त प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बाद अब अगले साल दिसंबर में होने वाली बैठक पर नजर है। छठ महापर्व को सूची में शामिल किए जाने पर अंतिम निर्णय उसी प्रक्रिया के तहत लिया जाएगा।