बिहार: डेडबॉडी सुरक्षित रखने वाले केमिकल से चमकाया जा रहा मशरूम! बिहार में सफेदी और ताजगी के नाम पर बड़ा खेल?

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BNT Desk: जिस मशरूम को आप प्रोटीन का अच्छा स्रोत मानकर अपनी डाइट में शामिल करते हैं, जिसे मांस और पनीर के विकल्प के तौर पर खाते हैं, क्या वही मशरूम आपकी सेहत के लिए खतरा बन सकता है? क्या आपने कभी सोचा है कि बाजार में मिलने वाला एकदम सफेद, चमकदार और कई दिनों तक ताजा दिखाई देने वाला मशरूम आखिर इतना आकर्षक कैसे रहता है? क्या इसकी सफेदी और ताजगी के पीछे किसी केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है?

बिहार में दैनिक भास्कर की एक पड़ताल में मशरूम के कारोबार से जुड़ा ऐसा ही गंभीर मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ कारोबारियों ने मशरूम को ज्यादा सफेद और लंबे समय तक ताजा दिखाने के लिए Formalin और Potassium Metabisulfite जैसे केमिकल के इस्तेमाल की बात कही। Formalin का इस्तेमाल जैविक नमूनों और शवों को संरक्षित रखने में भी किया जाता है। ऐसे में मशरूम की धुलाई में इसके इस्तेमाल का दावा खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

यानी जिस मशरूम को लोग सेहत बनाने के लिए खरीदते हैं, उसकी सफेदी और ताजगी के पीछे केमिकल इस्तेमाल होने की बात सामने आई है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि और मशरूम के नमूनों की प्रयोगशाला जांच के नतीजे सामने आना जरूरी है।

 

गया की मशरूम मंडी में पहुंची पड़ताल करने वाली टीम

इस पूरे मामले की पड़ताल के लिए दैनिक भास्कर की टीम बिहार की प्रमुख मशरूम मंडियों में शामिल गया पहुंची। गया से बिहार के अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल तक मशरूम की सप्लाई होती है। ऐसे में यहां मशरूम की गुणवत्ता और उसकी सफाई से जुड़ी जानकारी हासिल करना महत्वपूर्ण था।

रिपोर्ट के मुताबिक, टीम ने व्यापारी बनकर एक कारोबारी से संपर्क किया। उससे रोजाना तीन क्विंटल मशरूम की मांग की गई। इस पर कारोबारी ने बताया कि उसके पास दो तरह के मशरूम उपलब्ध हैं। एक सामान्य मशरूम और दूसरा बिल्कुल सफेद दिखाई देने वाला मशरूम।

कारोबारी ने दावा किया कि एकदम सफेद मशरूम को केमिकल की मदद से तैयार किया जाता है। उसके मुताबिक, केमिकल लगाने के बाद मशरूम दो से तीन दिनों तक खराब नहीं होता और सामान्य मशरूम की तुलना में ज्यादा समय तक ताजा दिखाई देता है।

 

Formalin और Potassium Metabisulfite का लिया नाम

कारोबारी ने बातचीत के दौरान Formalin और Potassium Metabisulfite का नाम लिया। उसने दावा किया कि इन केमिकल का इस्तेमाल मशरूम को सफेद और लंबे समय तक ताजा दिखाने के लिए किया जाता है। उसका कहना था कि बिना केमिकल वाला मशरूम जल्दी खराब हो जाता है, जबकि केमिकल से तैयार मशरूम कई दिनों तक अपनी चमक बनाए रखता है।

रिपोर्ट के अनुसार, कारोबारी ने टीम को केमिकल उपलब्ध कराने और दूसरे सप्लायर से संपर्क कराने की भी बात कही। इस बातचीत से यह सवाल उठता है कि क्या मशरूम के कारोबार में कुछ लोग प्राकृतिक गुणवत्ता के बजाय केमिकल के इस्तेमाल से उत्पाद को आकर्षक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, किसी कारोबारी का दावा अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि बाजार में बिकने वाले सभी सफेद मशरूम में ऐसे केमिकल का इस्तेमाल होता है। इसकी पुष्टि के लिए नमूनों की वैज्ञानिक जांच और संबंधित विभाग की कार्रवाई जरूरी है।

 

केमिकल से मशरूम धोने की प्रक्रिया भी दिखाई गई

इसके बाद टीम एक ऐसे होलसेल कारोबारी के पास पहुंची, जहां कथित तौर पर केमिकल से मशरूम साफ करने की प्रक्रिया दिखाई गई। रिपोर्ट के मुताबिक, कारोबारी टीम को रोमी नाम के व्यक्ति के पास लेकर गया।

वहां दो अलग-अलग टब में मशरूम रखे हुए थे। एक टब में मशरूम बिल्कुल सफेद दिखाई दे रहा था, जबकि दूसरे टब में रखे मशरूम पर काले धब्बे नजर आ रहे थे। रोमी ने दावा किया कि सफेद मशरूम को केमिकल से धोया गया है, जबकि काले धब्बों वाला मशरूम सीधे फार्म से आया है। जब टीम ने उससे केमिकल से मशरूम साफ करने की प्रक्रिया दिखाने को कहा, तो शुरुआत में उसने इनकार कर दिया। लेकिन बाद में उसने केमिकल मिले पानी में मशरूम डालकर प्रक्रिया दिखाई।

रिपोर्ट के मुताबिक, मशरूम को कुछ देर तक उस पानी में रखने के बाद दूसरे टब में डाला गया। करीब दो मिनट के इंतजार के बाद जब उसे बाहर निकाला गया, तो वह पहले की तुलना में ज्यादा सफेद और चमकदार दिखाई दे रहा था। इस प्रदर्शन ने मशरूम की सफेदी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। हालांकि, केवल रंग और चमक में बदलाव देखकर इस्तेमाल किए गए केमिकल की मात्रा, उसकी पहचान या मशरूम की वास्तविक सुरक्षा के बारे में अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए प्रयोगशाला जांच जरूरी है।

 

विक्रेता ने बताया धुले और बिना धुले मशरूम का अंतर

पड़ताल के दौरान टीम ने शंकर प्रसाद नाम के एक विक्रेता से भी मशरूम की गुणवत्ता और सफेदी के बारे में सवाल किए। उसने बताया कि बाजार में दो तरह के मशरूम मिलते हैं। एक धुला हुआ और दूसरा बिना धुला हुआ। उसके मुताबिक, धुले हुए मशरूम की कीमत सामान्य मशरूम से ज्यादा होती है। विक्रेता ने दावा किया कि धुलाई के बाद मशरूम में चमक आती है और वह लंबे समय तक खराब नहीं होता। उसने यह भी कहा कि धुलाई की प्रक्रिया से मशरूम का वजन बढ़ जाता है।

जब टीम ने उससे पूछा कि मशरूम को किस केमिकल से धोया जाता है, तो शुरुआत में उसने पानी से धोने की बात कही। लेकिन बातचीत आगे बढ़ने पर उसने केमिकल की कीमत 168 रुपये प्रति 500 मिलीलीटर बताई। इस बातचीत से यह सवाल भी सामने आया कि मशरूम की धुलाई में इस्तेमाल होने वाले पदार्थों की जानकारी ग्राहकों को दी जाती है या नहीं। अगर किसी खाद्य पदार्थ को केमिकल से साफ किया जा रहा है, तो उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा की जांच करना खाद्य सुरक्षा विभाग की जिम्मेदारी बनती है।

 

SN Mushroom Center में 170 रुपये किलो बताया गया दाम

इसके बाद टीम SN Mushroom Center पहुंची। रिपोर्ट के मुताबिक, यहां दुकानदार ने 170 रुपये प्रति किलो की दर से धुला हुआ मशरूम देने की बात कही। इस पूरी पड़ताल में अलग-अलग कारोबारियों की ओर से धुले और बिना धुले मशरूम के बीच अंतर बताया गया। कुछ कारोबारियों ने केमिकल के इस्तेमाल का दावा किया, तो कुछ ने धुले हुए मशरूम की अधिक कीमत और लंबे समय तक ताजा रहने की बात कही। इन दावों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मशरूम को आकर्षक बनाने के लिए खाद्य सुरक्षा मानकों के खिलाफ किसी पदार्थ का इस्तेमाल किया जा रहा है? अगर ऐसा है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी और बाजार में बिक रहे मशरूम की जांच कौन करेगा?

 

गया में बड़े पैमाने पर होता है मशरूम का उत्पादन

रिपोर्ट में गया में मशरूम के बड़े कारोबार का भी जिक्र किया गया है। यहां वजीरगंज, कोंच, मानपुर, बोधगया और इमामगंज जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मशरूम की खेती होती है। यहां बटन, ऑयस्टर और पिंक ऑयस्टर जैसी किस्मों का उत्पादन किया जाता है। जिला उद्यान पदाधिकारी तबस्सुम परवीन के मुताबिक, गया में उत्पादित मशरूम की सप्लाई बिहार के अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के बाजारों में भी होती है। इसके अतिरिक्त दिल्ली से भी मशरूम का कारोबार जुड़ा हुआ है। इससे समझा जा सकता है कि गया के मशरूम कारोबार का दायरा केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है। यहां से दूसरे राज्यों तक उत्पाद पहुंचता है। ऐसे में अगर केमिकल से मशरूम साफ करने के दावे जांच में सही साबित होते हैं, तो इसका असर व्यापक हो सकता है।

 

Formalin आखिर कितना खतरनाक हो सकता है?

Formalin, Formaldehyde का जलीय घोल होता है। इसका इस्तेमाल प्रयोगशालाओं और शवों को संरक्षित रखने जैसी प्रक्रियाओं में किया जाता है। Formaldehyde के संपर्क में आने से आंखों, त्वचा और श्वसन तंत्र में जलन हो सकती है। अधिक या लंबे समय तक संपर्क स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। इसी वजह से खाद्य पदार्थों में इसके अनधिकृत इस्तेमाल को हल्के में नहीं लिया जा सकता। किसी भी खाद्य पदार्थ में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ की सुरक्षा, मात्रा और अनुमति संबंधित खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार तय होती है। दूसरी ओर, Potassium Metabisulfite का इस्तेमाल कुछ खाद्य प्रक्रियाओं में संरक्षक के रूप में निर्धारित शर्तों और सीमाओं के तहत किया जाता है। इसका इस्तेमाल हर परिस्थिति में प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन किसी खाद्य पदार्थ में इसकी मौजूदगी, मात्रा और उपयोग की अनुमति की जांच जरूरी है। इसलिए Formalin और Potassium Metabisulfite को एक ही श्रेणी में रखकर देखना सही नहीं होगा। दोनों के इस्तेमाल से जुड़े नियम अलग हैं और किसी मशरूम के नमूने में इनकी मौजूदगी तथा मात्रा की पुष्टि प्रयोगशाला जांच से ही हो सकती है।

 

खाद्य सुरक्षा विभाग के सामने कई बड़े सवाल

इस पड़ताल के बाद खाद्य सुरक्षा विभाग और जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सबसे पहले यह जांचना जरूरी है कि गया की मंडियों में बिकने वाले मशरूम की सफाई किस तरीके से की जा रही है। क्या कारोबारी वास्तव में Formalin या अन्य केमिकल का इस्तेमाल कर रहे हैं? अगर ऐसा हो रहा है, तो किन कारोबारियों के यहां यह प्रक्रिया अपनाई जा रही है? इसके साथ ही मंडियों, दुकानों और होलसेल कारोबारियों के यहां से मशरूम के नमूने लेकर उनकी प्रयोगशाला जांच कराई जानी चाहिए। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि मशरूम में कौन-से रसायन मौजूद हैं और उनकी मात्रा खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप है या नहीं। अगर किसी कारोबारी की ओर से प्रतिबंधित या अनधिकृत केमिकल का इस्तेमाल साबित होता है, तो नियमानुसार कार्रवाई भी जरूरी होगी। साथ ही, आम लोगों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि बाजार में बिकने वाले मशरूम की गुणवत्ता की जांच किस तरह की जा रही है।

 

आम ग्राहक कैसे रहें सावधान?

मशरूम खरीदते समय उसकी सफेदी या चमक को ही गुणवत्ता का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। बहुत ज्यादा चमकदार दिखने वाला मशरूम अपने आप में केमिकल से तैयार होने का प्रमाण नहीं है। इसी तरह हल्के दाग या प्राकृतिक रंग वाला मशरूम भी अपने आप में खराब होने का संकेत नहीं है। ग्राहकों को मशरूम खरीदते समय उसकी ताजगी, गंध और भंडारण की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। खराब गंध, चिपचिपाहट या सड़न के लक्षण वाले मशरूम को नहीं खरीदना चाहिए। विश्वसनीय विक्रेता से खरीदारी करना और उसे सही तरीके से ठंडे स्थान पर रखना भी जरूरी है। हालांकि, केवल देखकर यह पता लगाना संभव नहीं है कि किसी मशरूम में Formalin या कोई अन्य केमिकल मौजूद है या नहीं। इसके लिए वैज्ञानिक जांच ही भरोसेमंद तरीका है।

 

अब जांच के नतीजों पर टिकी निगाहें

दैनिक भास्कर की इस पड़ताल ने बिहार में मशरूम के कारोबार और उसकी गुणवत्ता को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गया जैसे बड़े उत्पादन और सप्लाई केंद्र से दूसरे राज्यों तक मशरूम पहुंचता है। ऐसे में कारोबारियों की ओर से किए गए केमिकल इस्तेमाल के दावों की गंभीरता से जांच होना जरूरी है। सबसे बड़ा सवाल खाद्य सुरक्षा विभाग से है कि क्या बाजार में बिक रहे मशरूम की नियमित जांच हो रही है? क्या केमिकल से धुलाई करने वाले कारोबारियों की पहचान की जाएगी? क्या मशरूम के नमूनों की जांच कर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी? और क्या आम लोगों को यह भरोसा मिल पाएगा कि उनकी थाली तक पहुंचने वाला मशरूम सुरक्षित है? फिलहाल इस पड़ताल में सामने आए दावों की स्वतंत्र पुष्टि और प्रयोगशाला जांच के नतीजों का इंतजार है। जरूरत है कि खाद्य सुरक्षा विभाग और जिला प्रशासन इस मामले की जांच करें, ताकि मशरूम के कारोबार में पारदर्शिता बनी रहे और लोगों की थाली तक सुरक्षित खाद्य पदार्थ पहुंच सके।

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