BNT Desk: बिहार की सियासत में ‘सम्राट युग’ की औपचारिक शुरुआत हो गई है। बीते शुक्रवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली नई सरकार ने विधानसभा में अपना बहुमत (Floor Test) साबित कर दिया। हालांकि, सदन के भीतर सरकार ने जितनी आसानी से जीत हासिल की, सदन के बाहर चुनावी रणनीतिकार और ‘जन सुराज’ के सूत्रधार प्रशांत किशोर (PK) ने उतनी ही तीखी आलोचना की है। पीके ने इस जीत को लोकतंत्र की हार और “पिछले दरवाजे से हासिल किया गया बहुमत” करार दिया है।
विधानसभा में क्या हुआ?
बिहार विधानसभा के एकदिवसीय विशेष सत्र में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी मंत्रिपरिषद के लिए विश्वास मत का प्रस्ताव पेश किया। सदन की कार्यवाही काफी संक्षिप्त और स्पष्ट रही:
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एक पंक्ति का प्रस्ताव: सम्राट चौधरी ने सदन के पटल पर रखा— “यह सभा वर्तमान राज्य मंत्रिपरिषद में विश्वास व्यक्त करती है।”
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मतदान की नहीं आई नौबत: करीब 100 मिनट तक चली लंबी चर्चा के बाद, विपक्ष ने ‘मत विभाजन’ (Division of Votes) की मांग नहीं की। इसके चलते विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित होने की घोषणा की।
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सरकार की जीत: ध्वनिमत से प्रस्ताव स्वीकृत होने का मतलब है कि सदन में मौजूद अधिकांश सदस्यों ने आवाज के जरिए सरकार का समर्थन किया और सरकार ने कानूनी तौर पर अपनी मजबूती साबित कर दी।
प्रशांत किशोर का बड़ा प्रहार:
खगड़िया में मीडिया से बातचीत करते हुए प्रशांत किशोर ने सरकार की इस जीत पर पानी फेरते हुए इसे “खरीदा हुआ बहुमत” बताया। उन्होंने कहा कि सम्राट चौधरी को मिला यह समर्थन जनता का समर्थन नहीं है।
पीके का तीखा बयान: “यह 202 विधायकों का वास्तविक बहुमत नहीं, बल्कि 10 हजार रुपये में खरीदा गया और चुनाव आयोग की मदद से हासिल किया गया बहुमत है। सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर ‘बैक डोर’ (पिछले दरवाजे) से इसे हासिल किया गया है।”
प्रशांत किशोर ने आगे तर्क दिया कि यदि यह वास्तविक जनसमर्थन होता, तो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने की नौबत नहीं आती। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन शक्तियों ने नीतीश कुमार को रास्ते से हटाया, उन्हीं ने अपनी पसंद के व्यक्ति को कुर्सी पर बिठाया है।
सम्राट चौधरी के ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ पर सवाल
प्रशांत किशोर ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के अतीत को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सम्राट चौधरी को लेकर जो धारणा बनाई जा रही है, वह हकीकत से परे है।
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अदालती राहत पर सवाल: पीके ने कहा कि सम्राट चौधरी को किसी अदालत ने बेगुनाह मानकर बरी नहीं किया था, बल्कि अपराध के समय ‘नाबालिग’ होने के कारण उन्हें कानूनी राहत मिली थी।
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नेतृत्व क्षमता पर तंज: उन्होंने दावा किया कि सम्राट चौधरी अपने दम पर या अपनी लोकप्रियता के आधार पर मुख्यमंत्री नहीं बने हैं। उन्हें दिल्ली के आकाओं (नरेंद्र मोदी और अमित शाह) के समर्थन से यह कुर्सी मिली है। पीके के अनुसार, सम्राट चौधरी का “चाल-चरित्र” जनता के सामने स्पष्ट है और वे केवल एक ‘रिमोट कंट्रोल’ की तरह काम कर रहे हैं।
बिहार की भविष्य की राजनीति और ‘जन सुराज’
प्रशांत किशोर लगातार बिहार में पदयात्रा कर रहे हैं और उनका मुख्य निशाना राज्य की वर्तमान सत्ता संरचना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिहार में जो खेल चल रहा है, उसमें जनता कहीं नहीं है। उनके अनुसार, जिस बहुमत का जश्न मनाया जा रहा है, वह असल में सत्ता का दुरुपयोग है।
सम्राट सरकार के सामने चुनौतियां:
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विपक्ष के सवाल: सदन में तो जीत मिल गई, लेकिन पीके जैसे आलोचकों के सवालों का जवाब जनता के बीच देना होगा।
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विकास का एजेंडा: क्या सम्राट चौधरी वाकई बिहार को उस ‘जंगलराज’ से बाहर निकाल पाएंगे जिसका वे जिक्र करते रहे हैं?
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2026 का लक्ष्य: बहुमत साबित करने के बाद अब सरकार का पूरा ध्यान 2026 के विधानसभा चुनावों पर होगा।
बहुमत की जीत या लोकतंत्र की चिंता?
बिहार विधानसभा में सम्राट चौधरी की जीत ने सरकार को स्थिरता तो दे दी है, लेकिन प्रशांत किशोर के आरोपों ने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या वाकई यह बहुमत ‘मैनेज’ किया गया है? या फिर यह बिहार में एक नए नेतृत्व की वास्तविक शुरुआत है? इसका फैसला आने वाले समय में जनता ही करेगी।