समस्तीपुर: माँ की तपस्या, पिता का त्याग; छोटे से कस्बे से निकलकर कैसे ‘The Universal Baby Boss’ बना वैभव सूर्यवंशी

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BNT Desk: क्रिकेट की दुनिया में जब कोई नया सितारा चमकता है, तो उसके पीछे केवल उसकी मेहनत नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार का बरसों का खून-पसीना और त्याग होता है। बिहार के समस्तीपुर जिले के एक बेहद छोटे से कस्बे ताजपुर से निकलकर विश्व क्रिकेट पटल पर अपनी धाक जमाने वाले युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आज दुनिया उन्हें ‘The Universal Baby Boss’ के नाम से जानती है, लेकिन इस शानदार मुकाम तक पहुंचने का रास्ता बेहद कटीला और संघर्षों से भरा था। यह कहानी है एक माँ की अटूट तपस्या की और एक पिता के उस बड़े त्याग की, जिसने अपने बेटे के सपनों को पंख देने के लिए अपनी विरासत तक दांव पर लगा दी।

ताजपुर की गलियों से शुरू हुआ क्रिकेट का सफर

वैभव सूर्यवंशी का जन्म बिहार के समस्तीपुर जिले के एक साधारण और छोटे से कस्बे ताजपुर में हुआ था। वैभव को बचपन से ही खिलौनों से ज्यादा क्रिकेट के बल्ले और गेंद से प्यार था। ताजपुर की तंग गलियों और धूल भरे मैदानों में वैभव ने पहली बार बल्ला थामा था। किसे पता था कि स्थानीय मैदानों पर टेनिस बॉल से लंबे-लंबे शॉट खेलने वाला यह छोटा सा बच्चा एक दिन दुनिया के बड़े-बड़े गेंदबाजों के छक्के छुड़ाएगा। वैभव के भीतर क्रिकेट को लेकर जो जुनून था, वह बचपन से ही दिखने लगा था।

पिता ने बेच दी पुश्तैनी जमीन: जब बेटे के टैलेंट पर जताया भरोसा

एक आम भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार में खेल को करियर के रूप में चुनना बहुत बड़ा जोखिम माना जाता है, खासकर तब जब क्रिकेट जैसी महंगी ट्रेनिंग की बात हो। वैभव जब महज 4 साल के थे, तभी उनके पिता संजीव सूर्यवंशी ने अपने बेटे के असाधारण टैलेंट और क्रिकेट के प्रति उसकी दीवानगी को पहचान लिया था।

वैभव को एक प्रोफेशनल क्रिकेटर बनाने के लिए महंगी क्रिकेट किट, अच्छे गियर और प्रोफेशनल कोचिंग की सख्त जरूरत थी। आर्थिक तंगी आड़े आ रही थी, लेकिन संजीव सूर्यवंशी ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपने बेटे के भविष्य के लिए एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपनी पुश्तैनी खेती की जमीन का एक हिस्सा बेच दिया, ताकि वैभव की ट्रेनिंग और स्पोर्ट्स किट्स के खर्च में कभी कोई कमी न आए। एक पिता का अपनी जमीन बेचना इस बात का सबूत था कि उन्हें अपने बेटे की काबिलियत पर पूरा भरोसा था।

8 साल की उम्र में 100 किलोमीटर का संघर्षपूर्ण सफर

समस्तीपुर के छोटे से कस्बे में आधुनिक क्रिकेट ट्रेनिंग की सुविधाएं बेहद सीमित थीं। वैभव को अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनाने के लिए बेहतर और प्रोफेशनल एकेडमी में भेजना जरूरी था। इसके लिए बिहार की राजधानी पटना को चुना गया।

जब वैभव महज 8 साल के थे—जिस उम्र में बच्चे ठीक से अपने स्कूल का बैग भी नहीं संभाल पाते—तब वह हर दूसरे दिन समस्तीपुर से पटना का सफर तय करते थे। करीब 100 किलोमीटर की यह दूरी तय करना बेहद थका देने वाला होता था। भारी-भरकम क्रिकेट किट बैग कंधे पर टांगे, ट्रेनों और बसों के धक्के खाते हुए वैभव हर दूसरे दिन ट्रेनिंग के लिए पटना पहुंचते थे और शाम को वापस लौटते थे। इस कम उम्र के संघर्ष ने वैभव को मानसिक रूप से बेहद मजबूत बना दिया।

मां की सुबह 3 बजे की तपस्या

वैभव की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे उनकी मां का मौन और सबसे बड़ा योगदान रहा है। बेटे का सपना सिर्फ वैभव का नहीं, बल्कि उसकी मां का भी बन चुका था। वैभव की ट्रेनिंग और कड़े शेड्यूल को बनाए रखने के लिए उनकी मां हर रोज सुबह 3 बजे उठ जाती थीं।

जब पूरी दुनिया सो रही होती थी, तब मां रसोई में जाकर वैभव के लिए एक एथलीट के हिसाब से जरूरी हाई-प्रोटीन डाइट, पौष्टिक खाना और टिफिन तैयार करती थीं। सुबह की कड़कड़ाती ठंड हो या गर्मी, मां की यह तपस्या बिना एक दिन रुके सालों तक चलती रही। मां के हाथों के उसी पौष्टिक खाने और उनके आशीर्वाद ने वैभव को मैदान पर घंटों पसीना बहाने की ताकत दी।

आंगन में बना ‘होम-पिच’ और आक्रामक बल्लेबाजी की नींव

पटना में ट्रेनिंग के साथ-साथ यह भी जरूरी था कि वैभव घर पर भी अपनी प्रैक्टिस को कम न होने दें। यात्रा के समय को बचाने और चौबीसों घंटे अभ्यास की सुविधा के लिए उनके पिता ने एक और अनोखा कदम उठाया। ताजपुर स्थित उनके पुश्तैनी घर के पीछे खाली पड़े हिस्से में एक कस्टम प्रैक्टिस नेट (होम-पिच) तैयार कराया गया।

घर के इस आंगन नुमा हिस्से में बने ‘होम-पिच’ पर वैभव ने दिन-रात एक कर दिया। तेज धूप हो या बारिश, वैभव घंटों वहां पसीना बहाते थे। यहीं पर लगातार लेदर बॉल से अभ्यास करते-करते वैभव ने अपनी उस आक्रामक और बेखौफ बल्लेबाजी की मजबूत नींव रखी, जिसने आगे चलकर बड़े-बड़े टूर्नामेंट्स में विरोधियों के होश उड़ा दिए। आज जब वैभव मैदान पर चौके-छक्कों की बरसात करते हैं, तो उसके पीछे इसी घरेलू पिच पर बहाया गया सालों का पसीना बोलता है।

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