BNT Desk: बिहार से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित उत्तर प्रदेश में प्रकृति ने ऐसा तांडव मचाया कि आंधी और भीषण तूफान के कारण 94 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। सबसे ज्यादा तबाही प्रयागराज (इलाहाबाद) और अयोध्या (फैजाबाद) में देखने को मिली। सोशल मीडिया पर दिल दहला देने वाले वीडियो सामने आए, जिसमें उड़ते हुए होर्डिंग्स के साथ इंसान कई फीट दूर खेतों में गिरते दिखे।
हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी के बाद भी चारों तरफ एक अजीब सी खामोशी है। न कोई बड़ा राजनीतिक हंगामा है, न ही किसी की जवाबदेही तय की जा रही है। क्या हम एक ऐसे समाज में तब्दील हो चुके हैं जहाँ इंसानी जान की कीमत अब कौड़ियों के भाव रह गई है?
80% भारत हीटवेव की चपेट में और नेताओं के खोखले दावे
आंधी के इस कहर के बाद उत्तर प्रदेश के 30 से अधिक जिलों सहित देश का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा भीषण लू (Heatwave) की चपेट में है। पूरा बिहार, यूपी, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्य सूरज की तपिश से त्राहिमाम कर रहे हैं। प्रशासन केवल ‘खुद को बचाने’ की एडवायजरी जारी कर अपना पल्ला झाड़ रहा है।
दूसरी तरफ, जनता को दिलासा देने के लिए जिम्मेदार पदों पर बैठे केंद्रीय मंत्रियों द्वारा अजीबोगरीब और जमीनी हकीकत से दूर बयान दिए जाते हैं। जेब से प्याज निकालकर एसी न होने का दावा करना जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। क्या हमारे वीआईपी नेता अपने महलों और वातानुकूलित दफ्तरों को छोड़कर आम जनता की तरह इस चिलचिलाती धूप का सामना कर सकते हैं?
अधिकारों को भूलकर ‘भीड़’ में तब्दील होता समाज
आज देश में धर्म, अध्यात्म, प्रसाद और आस्था के नाम पर जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों से भटकाया जा रहा है। इसका सबसे बुरा नतीजा यह हुआ है कि हम नागरिक के तौर पर अपने मौलिक अधिकारों की मांग करना ही भूल गए हैं।
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एक सम्मानजनक जीवन हमारा अधिकार है।
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बेहतर और सस्ती शिक्षा हमारा अधिकार है।
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इलाज के लिए अच्छी और मुफ्त दवाइयाँ हमारा अधिकार है।
लेकिन हकीकत यह है कि कुंभ के मेले में मची भगदड़ में लोग कुचल कर मर जाएं, दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हादसा हो जाए, या मध्य प्रदेश की पटाखा फैक्ट्रियों में मजदूर जिंदा जल जाएं—देश का नागरिक अब इन मौतों पर सवाल उठाना भूल चुका है। हम धीरे-धीरे ‘नागरिक’ से एक ऐसी ‘भीड़’ बनते जा रहे हैं, जिसे सरकारें जिस तरफ चाहें हांक सकती हैं।
जवाबदेही और नैतिकता के पुराने दिन
एक दौर वह भी था जब देश में कोई भी बड़ी दुर्घटना होने पर नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी या मनमोहन सिंह की सरकारों की सीधी जवाबदेही तय होती थी। मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफे दे दिया करते थे। लेकिन इस ‘न्यू इंडिया’ में सरकारों से नैतिकता या जिम्मेदारी की उम्मीद करना बेमानी साबित हो रहा है। राष्ट्रवाद और राजनीति के नए खांचों ने सत्ता को हर गलती से जैसे मुक्त कर दिया है।
इंसान से ‘जॉम्बी’ बनने का खतरा
हम खुद को कागजों पर संविधानवादी, लोकतंत्रवादी और समतावादी कहते नहीं थकते, लेकिन व्यावहारिक रूप से हमारे भीतर से न्याय, बंधुत्व और संवेदनशीलता की भावना खत्म हो रही है। जब समाज के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्टों या आम मजदूरों की आवाज को कुचला जाता है, तो हम चुप रहते हैं। हमें दूसरों की मौत और दुखों से फर्क पड़ना बंद हो गया है। हम इंसानों से ‘जॉम्बी’ या जीवित प्रेत बनते जा रहे हैं, जिनके भीतर कोई संवेदना बाकी नहीं है।
समय आ गया है कि हम खुद से यह तीखा सवाल पूछें—इस बदहाली और संवेदनहीनता के कसूरवार क्या सिर्फ हुक्मरान हैं, या कहीं न कहीं हम खुद भी इसके जिम्मेदार हैं?