BNT Desk: बिहार के जमुई में मड़वा पहाड़ के पास 19 सितंबर की शाम नाबालिग छात्रा और उसके सहपाठी के साथ हुई घटना ने महिला सुरक्षा के साथ-साथ इलाके की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्र-छात्रा स्कूटी से लौट रहे थे, तभी कुछ युवकों ने उन्हें रास्ते में रोक लिया। आरोप है कि युवकों ने छात्र के साथ मारपीट की और नाबालिग छात्रा के साथ अश्लील हरकतें कीं। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला तेजी से चर्चा में आया। वीडियो में एक आरोपी द्वारा छात्रा को झाड़ियों की तरफ ले जाने की कोशिश किए जाने की बात सामने आई। इसी दौरान वहां से गुजर रहे कुछ ग्रामीणों ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने आरोपियों को ललकारते हुए छात्रा को छोड़ने और वहां से जाने के लिए कहा। ग्रामीणों के विरोध के बाद आरोपी छात्र-छात्रा को छोड़कर भाग गए। घटना के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की। मामला पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत दर्ज किया गया और जांच के लिए एसआईटी गठित की गई। लेकिन घटना ने एक दूसरा सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या मड़वा पहाड़ और उसके आसपास का इलाका पहले से ही ऐसी गतिविधियों के कारण संवेदनशील था?
मड़वा पहाड़ की सुनसान लोकेशन पर उठे सवाल
मड़वा पहाड़ जमुई-लखीसराय मुख्य मार्ग के आसपास का इलाका है। यहां आबादी अपेक्षाकृत कम है और शाम के बाद आवाजाही भी कम हो जाती है। ऐसे स्थानों पर पुलिस गश्त और निगरानी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी इलाके को लेकर स्थानीय स्तर पर अवैध बालू और शराब कारोबार से जुड़े लोगों की गतिविधियों की चर्चा पहले भी होती रही है। हालांकि इन दावों को इस घटना का कारण मानना अभी संभव नहीं है। 19 सितंबर की घटना के बाद पुलिस ने वायरल वीडियो और दूसरे साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान शुरू की। जांच का दायरा अब केवल वीडियो में दिखाई दे रही घटना तक सीमित नहीं है। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि घटना में शामिल लोगों की पृष्ठभूमि क्या है और उनके बीच किस तरह के संपर्क हैं।
घटना के बाद एसआईटी ने संभाली जांच
नाबालिग से जुड़ी इस घटना में पुलिस ने पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। जांच के लिए एसआईटी बनाई गई है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए बिहार पुलिस से कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है। इससे साफ है कि घटना सिर्फ स्थानीय स्तर का मामला नहीं रही, बल्कि महिला और बाल सुरक्षा को लेकर भी इस पर ध्यान गया है। हालांकि कार्रवाई घटना के बाद शुरू हुई, लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि घटना से पहले उस इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी। क्या वहां नियमित पुलिस गश्त होती थी? क्या संवेदनशील स्थानों को पहले से चिन्हित किया गया था? और अगर इलाके में अवैध गतिविधियों को लेकर पहले से शिकायतें थीं, तो वहां निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी? इन सवालों के जवाब जांच से ही सामने आ सकते हैं।
2021 में प्रशासनिक काफिले पर हमले की घटना
मड़वा और आसपास के इलाके की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठने की एक वजह वहां की पुरानी घटनाएं भी हैं। 13 मई 2021 को इसी इलाके के आसपास तत्कालीन एसडीएम प्रतिभा रानी के काफिले पर बालू तस्करों द्वारा हमला किए जाने की खबर सामने आई थी। रिपोर्टों के मुताबिक काफिले में पुलिस अधिकारी और जवान भी मौजूद थे। हमले के दौरान फायरिंग की बात सामने आई थी और पुलिसकर्मियों के घायल होने की भी जानकारी दी गई थी। इस घटना से यह संकेत जरूर मिलता है कि उस समय भी इलाके में अवैध बालू कारोबार से जुड़े लोगों की गतिविधियां प्रशासन के लिए चुनौती बनी हुई थीं। हालांकि 2021 की इस घटना और 2026 की मड़वा घटना के बीच सीधा संबंध होने की बात अभी साबित नहीं हुई है।
2022 में पुलिस और मजिस्ट्रेट की टीम पर हमला
इसके बाद 4 नवंबर 2022 को जमुई के छट्ठू धनामा इलाके में अवैध बालू कारोबारियों द्वारा पुलिस और दंडाधिकारी की टीम पर हमला किए जाने की खबर सामने आई थी। इस घटना में पुलिसकर्मियों और मजिस्ट्रेट के घायल होने की बात कही गई थी। पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए आरोपियों की गिरफ्तारी भी की थी। लगातार सामने आई ऐसी घटनाओं के कारण अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जिले के कुछ बालू प्रभावित इलाकों में प्रशासनिक और पुलिस निगरानी को और मजबूत किए जाने की जरूरत थी। लेकिन यह कहना कि पुरानी घटनाओं के कारण ही 19 सितंबर की घटना हुई, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जल्दबाजी होगी।
पुलिस और बालू कारोबार की कथित मिलीभगत पर भी सवाल
जमुई में अवैध बालू कारोबार और पुलिसकर्मियों के बीच कथित मिलीभगत के आरोप भी अलग-अलग समय पर सामने आते रहे हैं। 2025 की एक रिपोर्ट में एक स्थानीय ट्रैक्टर मालिक के हवाले से आरोप लगाया गया था कि बालू की हर खेप पर पुलिस को 2 से 2.5 हजार रुपये तक दिए जाते थे। यह एक व्यक्ति द्वारा लगाया गया आरोप था, इसे पूरे पुलिस विभाग पर लागू होने वाले आधिकारिक निष्कर्ष के तौर पर नहीं देखा जा सकता। इसी तरह 2023 में सिकंदरा थाना क्षेत्र में जब्त बालू लदे ट्रैक्टर को 60 हजार रुपये लेकर छोड़ने का आरोप सामने आया था। रिपोर्ट में एक सहायक अवर निरीक्षक की कथित भूमिका की बात कही गई थी और मामले की जांच की जानकारी सामने आई थी।
2026 में भी जमुई जिले में बालू कारोबार से जुड़ी कथित अवैध वसूली के मामले में पुलिसकर्मी पर निगरानी कार्रवाई की खबर सामने आई। झाझा क्षेत्र में अवैध बालू उठाव के बदले कथित वसूली के मामले में एक सरकारी चालक सिपाही की गिरफ्तारी और तत्कालीन थानाध्यक्ष के खिलाफ केस दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। इन घटनाओं से इतना जरूर पता चलता है कि अवैध बालू कारोबार को लेकर पुलिसकर्मियों पर आरोप और कुछ मामलों में कार्रवाई पहले भी हुई है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि मड़वा की घटना में भी पुलिस की मिलीभगत थी।
क्या आरोपी बालू और शराब कारोबार से जुड़े थे?
मड़वा मामले में गिरफ्तार आरोपियों की पृष्ठभूमि भी जांच का हिस्सा बन गई है। पुलिस के मुताबिक मुख्य आरोपी नंदन यादव और हरेराम यादव प्रतापपुर गांव के रहने वाले हैं। दोनों के ट्रैक्टर चलाने और बालू ढुलाई से जुड़े होने की जानकारी सामने आई है। पुलिस की ओर से उनके कथित अवैध बालू और शराब कारोबार से संबंधों की भी जांच किए जाने की बात सामने आई है। इसी पहलू को लेकर जांच अब और महत्वपूर्ण हो जाती है। पुलिस को यह पता करना होगा कि आरोपी सिर्फ इस घटना में शामिल युवक थे या उनका किसी बड़े अवैध नेटवर्क से भी संपर्क था। उनके मोबाइल फोन, संपर्कों, आर्थिक गतिविधियों और पुराने मामलों की जांच से इस बारे में ज्यादा जानकारी सामने आ सकती है।
जेल जाने और फिर लौटने के दावों की भी जांच जरूरी
सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया जा रहा है कि इलाके में अवैध कारोबार से जुड़े कई लोग पहले जेल जा चुके हैं और बाद में बाहर आने के बाद दोबारा ऐसी गतिविधियों में शामिल हो गए। हालांकि इस दावे को लेकर सावधानी जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टों में जमुई में बालू कारोबार से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी और जेल भेजे जाने की घटनाएं जरूर सामने आती हैं, लेकिन मड़वा मामले में शामिल हर आरोपी के बारे में यह कहना कि वह पहले जेल जा चुका था और फिर उसी गतिविधि में लौट आया, अलग-अलग केस रिकॉर्ड के आधार पर ही साबित किया जा सकता है। इसलिए आरोप और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
नंदन यादव के घायल होने के बाद जांच और तेज
मामले में मुख्य आरोपी बताए जा रहे नंदन यादव को पुलिस मुठभेड़ के दौरान पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तार किए जाने की जानकारी सामने आई है। पुलिस का कहना है कि गिरफ्तारी के दौरान आरोपी ने पुलिस पर फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में वह घायल हुआ। इस दावे से जुड़ी कानूनी और जांच प्रक्रिया अलग विषय है और उसकी पुष्टि संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होगी। हरेराम यादव को भी गिरफ्तार किया गया है। अब पुलिस के सामने चुनौती यह पता लगाने की है कि घटना में कुल कितने लोग शामिल थे और किसकी क्या भूमिका थी।
वीडियो बनाने वाले और बाकी आरोपियों की पहचान भी जरूरी
जांच में कई सवालों के जवाब तलाशे जाने हैं। छात्र-छात्रा को किसने रोका? छात्र के साथ मारपीट किसने की? छात्रा के साथ अश्लील हरकत करने में कौन-कौन शामिल था? वीडियो किसने बनाया? छात्रा को झाड़ियों की तरफ ले जाने की कोशिश किसने की? क्या वीडियो में दिखाई दे रहे सभी लोगों की पहचान हो चुकी है? इसके अलावा पुलिस को यह भी देखना होगा कि क्या आरोपियों के खिलाफ पहले से कोई शिकायत या मामला दर्ज था। अगर जांच में अवैध बालू या शराब कारोबार से जुड़े किसी नेटवर्क का संबंध सामने आता है, तो उस पहलू की भी अलग से जांच की जरूरत होगी।
ग्रामीणों ने समय पर हस्तक्षेप कर बचाई स्थिति
इस पूरी घटना में वहां मौजूद ग्रामीणों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। जब आरोपियों ने छात्र-छात्रा को घेरा हुआ था, तब 4-5 ग्रामीण वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने घटना देखकर आवाज उठाई और आरोपियों को लड़की को छोड़ने के लिए कहा। ग्रामीणों के विरोध के बाद आरोपी वहां से भाग गए। अगर उस समय ग्रामीण वहां नहीं पहुंचते तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी। यही कारण है कि घटना ने सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा और स्थानीय लोगों की सतर्कता का सवाल भी सामने रखा है। हालांकि किसी भी इलाके में नागरिकों की सुरक्षा केवल राहगीरों के हस्तक्षेप पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। संवेदनशील और सुनसान क्षेत्रों में नियमित पुलिस गश्त और निगरानी की व्यवस्था भी जरूरी है।
अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल
मड़वा मामले को केवल एक आपराधिक घटना के तौर पर देखना या इसे अवैध बालू कारोबार से सीधे जोड़ देना—दोनों ही जल्दबाजी हो सकती है। लेकिन 2021 में प्रशासनिक काफिले पर हमला, 2022 में पुलिस और मजिस्ट्रेट की टीम पर हमला, इसके बाद बालू कारोबार को लेकर सामने आते रहे विवाद और पुलिसकर्मियों पर लगे कथित अवैध वसूली के आरोप इस बात की ओर जरूर ध्यान खींचते हैं कि जिले में अवैध बालू कारोबार की समस्या लंबे समय से प्रशासन के लिए चुनौती रही है। अब जांच एजेंसियों के सामने दो स्तर की जिम्मेदारी है। पहली, 19 सितंबर की घटना में शामिल सभी लोगों की पहचान कर उनकी भूमिका स्पष्ट करना। दूसरी, अगर जांच में अवैध बालू या शराब कारोबार का कोई नेटवर्क सामने आता है तो उसकी पूरी कड़ी की जांच करना। अगर किसी सरकारी कर्मचारी या पुलिसकर्मी की भूमिका भी प्रमाण के साथ सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी होगा।
मड़वा की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर उठाए कई सवाल
19 सितंबर की घटना ने सिर्फ एक नाबालिग छात्रा की सुरक्षा का सवाल नहीं उठाया है। इसने यह सवाल भी सामने रखा है कि सुनसान और संवेदनशील इलाकों में पुलिस की निगरानी कितनी प्रभावी है। फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि मड़वा की घटना अवैध बालू या शराब कारोबार से जुड़ी हुई थी। इसका जवाब पुलिस जांच से ही मिलेगा। लेकिन अगर जांच में दोनों के बीच कोई संबंध सामने आता है, तो मामला केवल छेड़छाड़ या मारपीट तक सीमित नहीं रहेगा। तब अवैध कारोबार, स्थानीय नेटवर्क, आर्थिक लेन-देन और संभावित संरक्षण की भी जांच करनी होगी। आखिरकार किसी भी इलाके में कानून का असर केवल अपराध होने के बाद गिरफ्तारी से नहीं दिखता। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि अपराधियों को पहले से यह भरोसा हो कि कानून से बचना आसान नहीं है। मड़वा मामले में अब नजर इस बात पर रहेगी कि पुलिस जांच कितनी आगे बढ़ती है, कितने आरोपियों की पहचान होती है और क्या अवैध बालू या शराब कारोबार से जुड़े दावों की पुष्टि जांच में होती है। फिलहाल इन सवालों का अंतिम जवाब जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।