BNT Desk: सोचिए, अगर देश के किसी बड़े महानगर में 48 लाख लोग बाढ़ के पानी में फंसे होते, तो तस्वीर कैसी होती? न्यूज चैनलों पर घंटों लाइव कवरेज चलती, हेलिकॉप्टर से एरियल शॉट दिखाए जाते, बड़े एंकर मौके पर पहुंचते और सोशल मीडिया पर देश की बड़ी हस्तियां लगातार पोस्ट करतीं। लेकिन जब यही संकट बिहार में सामने आता है तो राष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई देती है?
बिहार में इस समय करीब 48 लाख लोग बाढ़ की चपेट में बताए जा रहे हैं। कई इलाकों में घर डूब गए हैं, फसलें बर्बाद हुई हैं और हजारों परिवारों को सड़कों, बांधों और ऊंचे स्थानों पर शरण लेनी पड़ी है। ऐसे में सवाल सिर्फ बाढ़ से हुए नुकसान का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या बिहार की इस आपदा को राष्ट्रीय बहस में उतनी जगह मिल रही है, जितनी एक बड़ी मानवीय त्रासदी को मिलनी चाहिए।
15 जिलों के 48 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित
प्रभात खबर की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के 15 जिलों में करीब 48 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं। सितंबर में अब तक 108.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है, जो सामान्य से करीब 20 फीसदी अधिक बताई गई है। आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, शुरुआत में 11 जिलों के 50 प्रखंडों की 201 पंचायतों में करीब 10.26 लाख लोग प्रभावित थे। बाद में यह संख्या बढ़कर 14 जिलों के 82 प्रखंडों की 491 ग्राम पंचायतों में 35.89 लाख तक पहुंची। अब प्रभावित आबादी का आंकड़ा करीब 48 लाख तक पहुंच गया है। गंगा, गंडक, कोसी, सोन और पुनपुन जैसी प्रमुख नदियों के जलस्तर में बढ़ोतरी ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बनाया। कई इलाकों में लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हुआ है और आवागमन के लिए नावों पर निर्भरता बढ़ी है।
सरकार का दावा- राहत और बचाव का काम जारी
बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए सरकार की ओर से राहत और बचाव अभियान चलाए जाने की जानकारी दी गई है। आंकड़ों के मुताबिक 8 लाख 27 हजार 472 प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में DBT के माध्यम से 579.23 करोड़ रुपये की आनुग्रहिक राहत राशि भेजी जा चुकी है। राज्य में 1,200 से अधिक सामुदायिक रसोई चलाए जाने की बात कही गई है। इनके माध्यम से अब तक करीब 1.28 करोड़ थालियां परोसे जाने का दावा है। राहत और बचाव अभियान में NDRF और SDRF की 21 टीमें लगी हुई हैं। राहत शिविरों में प्रभावित लोगों के लिए भोजन, रहने और इलाज की व्यवस्था की गई है। बच्चों के लिए दूध और महिलाओं के लिए सैनिटरी किट उपलब्ध कराने की भी बात कही गई है। यानी सरकारी आंकड़ों में राहत अभियान बड़े स्तर पर चलता दिखाई देता है। लेकिन बाढ़ प्रभावित इलाकों से सामने आने वाली तस्वीरें यह सवाल भी खड़ा करती हैं कि जमीन पर इन व्यवस्थाओं का असर हर जरूरतमंद तक कितना पहुंच रहा है।
हर साल राहत, लेकिन स्थायी समाधान कब?
बिहार में बाढ़ कोई नई समस्या नहीं है। हर साल मानसून के दौरान कई जिले प्रभावित होते हैं। राहत सामग्री बांटने, सामुदायिक रसोई चलाने और प्रभावित लोगों को आर्थिक सहायता देने की व्यवस्था की जाती है। लेकिन इसके साथ ही एक पुराना सवाल भी कायम है- बिहार में बाढ़ का स्थायी समाधान कब होगा? नदियों में गाद की सफाई, तटबंधों की मजबूती, जल निकासी की बेहतर व्यवस्था और नेपाल से आने वाले पानी को लेकर समन्वय जैसे मुद्दे हर साल चर्चा में आते हैं। इसके बावजूद अगले मानसून में कई इलाकों में फिर बाढ़ की स्थिति बन जाती है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ओर से बाढ़ से हुए नुकसान का गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ आकलन करने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के दौरे की भी चर्चा रही है। अब लोगों की नजर इस बात पर है कि राहत के साथ दीर्घकालिक समाधान के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
खेसारी लाल यादव ने भी उठाया मीडिया कवरेज का सवाल
बिहार की बाढ़ को लेकर मीडिया कवरेज का मुद्दा सोशल मीडिया पर भी चर्चा में है। भोजपुरी अभिनेता खेसारी लाल यादव ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर बिहार की बाढ़ का मुद्दा उठाया और कहा कि बिहार की बाढ़ खबरों में कम है। उन्होंने बाढ़ पीड़ितों के लिए मदद की अपील भी की। हालांकि, उनके पोस्ट पर सोशल मीडिया यूजर्स की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। कुछ लोगों ने सवाल किया कि सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट करने के बजाय उन्हें खुद बाढ़ प्रभावित इलाकों में जाकर लोगों की मदद करनी चाहिए। इससे यह बहस भी सामने आई कि संकट के समय सेलिब्रिटीज की भूमिका सिर्फ सोशल मीडिया संदेश तक सीमित रहनी चाहिए या उन्हें जमीनी स्तर पर भी मदद के लिए आगे आना चाहिए।
सोनू सूद का संदेश और नेपाल में राहत अभियान
अभिनेता सोनू सूद ने भी बिहार के बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए हौसला बढ़ाने वाला संदेश दिया। वहीं, इसी दौरान उनकी सूद चैरिटी फाउंडेशन की टीम नेपाल में बाढ़ प्रभावित लोगों के बीच राहत कार्य करती नजर आई। काठमांडू और त्रिशूली बाजार में उनकी टीम की ओर से भोजन और कंबल बांटने की जानकारी सामने आई। बिहार के लिए सोशल मीडिया संदेश और नेपाल में जमीनी राहत अभियान की यह तुलना सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी। हालांकि, इससे बिहार के लिए राहत कार्यों पर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठता है कि बड़ी आपदाओं के दौरान सेलिब्रिटीज की प्राथमिकताएं और उनकी मौजूदगी किस तरह तय होती है।
‘बाढ़ मुक्त बिहार’ के पुराने वादे की भी चर्चा
बिहार की मौजूदा बाढ़ के बीच 7 नवंबर 2025 का एक राजनीतिक बयान भी चर्चा में है। उस समय केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के आधिकारिक हैंडल से कहा गया था कि बिहार में NDA की सरकार बनने पर राज्य को बाढ़ मुक्त करने की दिशा में काम किया जाएगा और गंगा, गंडक तथा कोसी के पानी को किसानों के खेतों तक पहुंचाने की समुचित व्यवस्था की जाएगी। अब जब बिहार में NDA की सरकार है और राज्य में बाढ़ की स्थिति बनी हुई है, तो उस पुराने वादे को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, किसी राज्य को बाढ़ मुक्त करना एक दीर्घकालिक और जटिल जल प्रबंधन प्रक्रिया है, जिसे केवल एक मानसून के आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता।
तेजस्वी यादव ने केंद्र पर लगाया सौतेले व्यवहार का आरोप
बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने 13 सितंबर को बाढ़ के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है और बाढ़ के समय केंद्र की प्रतिक्रिया दूसरे राज्यों की तुलना में अलग रहती है। तेजस्वी यादव ने गुजरात में बाढ़ के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से मुख्यमंत्री से बातचीत और राहत के निर्देश दिए जाने का उदाहरण देते हुए बिहार के लिए भी इसी तरह की सक्रियता की मांग की। ये तेजस्वी यादव के राजनीतिक आरोप हैं। केंद्र और राज्य सरकार का पक्ष इन आरोपों से अलग हो सकता है। ऐसे में बाढ़ राहत, केंद्रीय सहायता और स्थायी समाधान से जुड़े दावों का आकलन आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी स्थिति के आधार पर किया जाना जरूरी है।
आपदा के समय पारदर्शिता भी जरूरी
बाढ़ राहत के दौरान सोशल मीडिया पर नवगछिया से एक पुलिसकर्मी द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर QR कोड जारी कर आर्थिक मदद मांगने की बात भी सामने आई। इस पोस्ट को लेकर अनुमति और जमा राशि के हिसाब-किताब पर सवाल उठे। हालांकि, इस वायरल दावे की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। फिर भी आपदा के समय राहत अभियान में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण होती है। लोगों से जुटाई गई किसी भी सहायता राशि का इस्तेमाल और उसका हिसाब स्पष्ट होना जरूरी है।
सवाल सिर्फ मीडिया कवरेज का नहीं
बिहार की बाढ़ पर सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि राष्ट्रीय मीडिया ने कितनी कवरेज दी। असली सवाल यह भी है कि हर साल लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित होने के बावजूद स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पाया। 48 लाख लोगों का प्रभावित होना एक बड़ा मानवीय और प्रशासनिक संकट है। राहत राशि, सामुदायिक रसोई और बचाव दल तत्काल जरूरतों को पूरा कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय के समाधान के लिए नदी प्रबंधन, तटबंध, जल निकासी और अंतरराज्यीय व अंतरराष्ट्रीय समन्वय पर लगातार काम करना होगा। बिहार के बाढ़ प्रभावित लोगों की मांग किसी विशेष राजनीतिक दल के पक्ष में नहीं, बल्कि राहत, सुरक्षा, पारदर्शिता और स्थायी समाधान से जुड़ी है। सवाल यह है कि क्या इस बार बाढ़ की तस्वीरें मानसून खत्म होने के साथ गायब हो जाएंगी या फिर सरकार, मीडिया और समाज मिलकर उस स्थायी समाधान पर गंभीर चर्चा करेंगे, जिसकी जरूरत बिहार को हर साल पड़ती है।